- सुनील आंबेकर बोले, डिजिटल दुनिया ने गांव के युवाओं के लिए खोले नए अवसर, सीएसजेएमयू के युवा संवाद में करियर, संस्कृति और भविष्य पर खुलकर हुई चर्चा
भारत 19
कानपुर। सफलता का रास्ता अब न तो किसी बड़े शहर से होकर गुजरता है और न ही अंग्रेजी भाषा की चौखट से। गांव-कस्बों के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि खुद को सीमित मान लेने की सोच है। डिजिटल टेक्नोलॉजी ने इस दूरी को काफी हद तक खत्म कर दिया है। अब गांव में बैठा छात्र भी ऑनलाइन लाइब्रेरी, अंतरराष्ट्रीय जर्नल, किताबों और ट्रांसलेशन टूल्स के जरिए दुनिया भर के ज्ञान और संसाधनों तक पहुंच बना सकता है।
गांव में बैठकर भी दुनिया भर के ज्ञान तक पहुंच
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित ‘युवा संवाद’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और विचारक सुनील आंबेकर ने युवाओं की बदलती दुनिया को लेकर कहा कि सफलता के लिए बड़े शहर में रहना या अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना जरूरी नहीं है। अंग्रेजी संवाद की भाषा हो सकती है, लेकिन ज्ञान का पैमाना नहीं। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों ने शिक्षा और ज्ञान तक ग्रामीण छात्रों की पहुंच आसान की है। ऐसे में युवाओं को यह धारणा बदलनी होगी कि बेहतर अवसर केवल महानगरों में ही मिल सकते हैं। जरूरत उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और लगातार खुद को अपडेट रखने की है।

स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और सामाजिक संतुलन
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा बनने लगे। भारतीय सांस्कृतिक मूल्य स्वतंत्रता पर रोक लगाने के बजाय सभी के सम्मान और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की सीख देते हैं। आपसी सम्मान, संबंधों की समझ, त्याग, समर्पण और सेवा जैसे मूल्य समाज में सामंजस्य की भूमिका निभाते हैं।
सिर्फ नौकरी नहीं, उद्यमिता की ओर भी बढ़ें युवा
शिक्षा और रोजगार क्षमता बढ़ाने में सामाजिक संगठनों की भूमिका पर आंबेकर ने कहा कि शिक्षा, सेवा और रोजगार से जुड़े कई प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। जहां स्कूलों की पहुंच सीमित है, वहां एकल विद्यालय जैसे प्रयासों के माध्यम से शिक्षा पहुंचाने की कोशिश की गई है। इसके साथ ही युवाओं को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, उद्यमिता और उद्योगों से जोड़ने की दिशा में भी काम हो रहा है। भविष्य की तैयारी कर रहे कॉलेज छात्रों को कहा कि केवल डिग्री अब पर्याप्त नहीं है। अपने विषय की पढ़ाई के साथ कंप्यूटर का ज्ञान और रुचि के अनुसार कौशल विकास समय की जरूरत बन चुका है। बदलती तकनीक और रोजगार की दुनिया में वही युवा आगे बढ़ेगा, जो सीखना जारी रखेगा और खुद को नए अवसरों के अनुरूप ढालेगा।
बदलते भारत में युवाओं की भूमिका पर जोर
युवाओं को संबोधित करते हुए आंबेकर ने कहा कि भारत प्रगति की ओर बढ़ रहा है और दुनिया उसे नए नजरिए से देख रही है। ऐसे समय में युवाओं की जिम्मेदारी केवल अपने करियर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें देश को अधिक समृद्ध, सशक्त और स्वाभिमानी बनाने में भी अपनी भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि देश की ताकत केवल राजनीतिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि उसकी एकता, संस्कृति और सभ्यतागत मूल्यों में भी निहित है। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों को उसकी बड़ी शक्ति बताते हुए उन्होंने युवाओं से इन मूल्यों को आधुनिक जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखने का आह्वान किया।
कॉलेजों में डिक्टेशन नहीं, संवाद की जरूरत
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने भी शिक्षण संस्थानों की कार्यशैली में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों को केवल डिक्टेशन देने की संस्कृति से आगे बढ़ना होगा। युवाओं के साथ संवाद और सार्थक चर्चा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि निर्णय प्रक्रिया में उनकी सोच और भागीदारी भी शामिल हो सके।


