- बदलती जीवनशैली, डिजिटल दुनिया में सिमटते खेल और मानसून के बिगड़ते चक्र ने बच्चों को प्रकृति और सावन की पुरानी परंपराओं से दूर किया
भारत 19
विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। “वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी…” कभी यह केवल एक लोकप्रिय गीत नहीं, बल्कि हर बच्चे के बचपन का जीवंत सच हुआ करता था। आसमान में बादल घिरते ही पुरानी कॉपियों और अखबारों से नावें बनने लगती थीं। गली में बहता पानी बच्चों के लिए नदियां बन जाता और नावों की रेस में उनकी कल्पनाएं तैरने लगती थीं। आज बारिश तो होती है, लेकिन वह बचपन कहीं पीछे छूट गया है। पहली बूंद गिरते ही अब बच्चों की नजरें खिड़की से बाहर नहीं, बल्कि मोबाइल और टैबलेट की स्क्रीन पर टिक जाती हैं।
डिजिटल दुनिया और सिमटता संयुक्त परिवार
एक दौर था जब नाव तैराने का यह खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों के जुड़ाव का माध्यम था। संयुक्त परिवारों में बच्चे दादा-दादी के पास जाकर नाव बनवाते थे। न किसी महंगे खिलौने की जरूरत थी, न किसी स्क्रीन की—बस कागज, पानी और कल्पना ही काफी थी। आचार्य नरेंद्र देव डिग्री कॉलेज की समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. नीलम चौहान के अनुसार, छोटे परिवार, कामकाजी माता-पिता और व्यस्त जीवनशैली ने उस सामूहिक बचपन को बदल दिया है। ऑनलाइन गेम्स ने बच्चों को बना-बनाया ढांचा तो दिया है, लेकिन उनसे रचनात्मकता और प्रकृति का जुड़ाव छीन लिया है।

बदलता मौसम और सुरक्षा की चिंताएं
कागज की कश्ती के गायब होने की वजह केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानसून के पैटर्न में आया बदलाव भी है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण अब सावन की वह पारंपरिक रिमझिम झड़ी कम ही देखने को मिलती है; अब कम समय में अचानक तेज बारिश होती है या लंबा सूखा रहता है। इसके अलावा, शहरों में जलभराव, गंदे पानी और संक्रमण के खतरे के कारण अभिभावक भी बच्चों को बाहर भेजने से झिझकते हैं। पहले जो बारिश बच्चों को बाहर बुलाती थी, वही अब उन्हें घरों के भीतर कैद कर देती है।
परंपराओं और कल्पनाशीलता को सहेजने की जरूरत
कागज की नाव का खोना सिर्फ एक खेल का अंत नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़े एक पूरे सांस्कृतिक अनुभव का गायब होना है। इसे वापस लाने के लिए किसी बड़े प्रयास की जरूरत नहीं है—बस बच्चों को फिर से बारिश महसूस करने और अपनी कल्पना से खेलने का मौका देने की दरकार है। बारिश हर साल लौटती है और कागज भी हर घर में मौजूद है, जरूरत है तो बस उस बचपन को फिर से जगाने की जो पहली बूंद के साथ गलियों में उतर आता था।


