- 150 वर्ष पूरे होने और नए कानूनी प्रावधान के बीच राष्ट्रगीत पर बहस तेज है, केरल में सरकारी समारोह से अनुपस्थिति, तमिलनाडु में तमिल पहचान की प्राथमिकता और नागालैंड में चर्च-छात्र संगठनों के विरोध ने धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता को बहस के केंद्र में ला दिया
भारत 19 डेस्क
कानपुर। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर देश में छिड़ी बहस अब केवल राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रही है। 15 अगस्त के आयोजनों के बाद सामने आए घटनाक्रमों ने इसके साथ राष्ट्रीयता, धार्मिक आस्था और क्षेत्रीय पहचान के टकराव को भी सामने ला दिया है। दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय पर गायन को लेकर विवाद हो या केरल में सरकारी समारोह में वंदे मातरम् का न होना, तमिलनाडु में तमिल गीत को प्राथमिकता देने की मांग हो या नागालैंड में चर्च का विरोध, इन घटनाओं में सवाल उठता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और धार्मिक मान्यताओं में संतुलन कैसे हो।
यह बहस इसलिए भी अहम है क्योंकि केंद्र के नए प्रोटोकॉल में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन को सरकारी आयोजनों में निर्धारित किया गया है और संसद से पारित संशोधित कानून में जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकने या उसमें व्यवधान डालने पर दंड का प्रावधान किया गया है। हालांकि कानून का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का गीत न गाना अपने आप अपराध है; दंड का प्रावधान जानबूझकर गायन रोकने या व्यवधान डालने की स्थिति में लागू होता है।
15 अगस्त को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के दौरान सामने आए वीडियो को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर हमलावर है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने राष्ट्रगीत का अपमान किया। कांग्रेस ने इसे खारिज करते हुए कहती है कि वंदे मातरम् पूरा गाया गया और किसी तरह का व्यवधान नहीं हुआ। विवाद अब इसलिए अहम है कि संसद द्वारा संशोधित राष्ट्रीय गौरव अपमान-निवारण कानून, 2026 में राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने को दंडनीय बनाया गया है। ऐसे में 15 अगस्त के किसी समारोह में व्यवधान का आरोप केवल राजनीतिक आरोप नहीं रह जाता, बल्कि कानून के संदर्भ में भी देखा जाने लगा है।
केरल में धार्मिक आपत्ति के बीच सरकारी समारोह पर सवाल
केरल में 15 अगस्त के आधिकारिक समारोह में वंदे मातरम् नहीं गाए जाने से विवाद और गहरा गया। राज्य सरकार का तर्क है कि स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान अनिवार्य है, जबकि वंदे मातरम् के गायन को लेकर ऐसा अनिवार्य निर्देश नहीं था। राज्य के स्कूलों के लिए जारी स्वतंत्रता दिवस दिशा-निर्देशों में भी राष्ट्रगान का निर्देश दिया गया, लेकिन वंदे मातरम् अनिवार्य नहीं किया गया। भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत की उपेक्षा बताते हुए इसे सरकार का मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण बताया। केरल का विवाद केवल राजनीतिक नहीं है।
वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-रूपक को लेकर देश के मुस्लिम संगठनों ने पहले आपत्ति जताई थी। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र के छह अंतरों को अनिवार्य करने वाले निर्देश को धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया था। यही धार्मिक संवेदनशीलता केरल में बहस का अहम हिस्सा बन गई है। हालांकि इसे पूरे मुस्लिम या ईसाई समुदाय की एक समान राय कहना सही नहीं होगा, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अनिवार्यता पर आपत्ति अब विवाद का प्रमुख पक्ष है।
तमिलनाडु में राष्ट्रीय गीत के साथ तमिल अस्मिता
तमिलनाडु में बहस का स्वर अलग है। विधानसभा ने राज्य के सरकारी कार्यक्रमों में ‘तमिल थाई वाज्थु’ को पहला गीत` बनाने का फैसला किया है। इसके बाद वंदे मातरम् और राष्ट्रगान का स्थान रहेगा। यह फैसला तमिल भाषा और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को प्राथमिकता देने के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल तमिलनाडु में यह विवाद पहले भी सामने आ चुका है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के शपथ ग्रहण समारोह में वंदे मातरम् और राष्ट्रगान के बाद तमिल थाई वाज्थु गाए जाने पर राजनीतिक विवाद हुआ था। सीपीआई सहित कई दलों ने कहा था कि तमिल गीत को राज्य के सरकारी समारोहों में पारंपरिक रूप से पहला स्थान मिलता रहा है। तमिलनाडु में धार्मिक आपत्ति का एक अलग पहलू भी सामने आया है। वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण में राष्ट्र को देवी के रूप में चित्रित करने वाले अंश से मुस्लिमों वह ईसाई संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना से जोड़ते हुए विरोध किया है। तमिलनाडु में विरोध को केवल वंदे मातरम्-विरोध कहना सही नहीं होगा। यहां तमिल अस्मिता और धार्मिक संवेदनशीलता बहस को प्रभावित कर रहे हैं।
नागालैंड में चर्च का कड़ा विरोध
पूर्वोत्तर में नागालैंड ने इस बहस को सबसे स्पष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक रूप दिया है। नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन ने वंदे मातरम् के अनिवार्य गायन का विरोध करते हुए स्वतंत्रता दिवस समारोहों के बहिष्कार का आह्वान किया। संगठन ने साफ कहा कि उसका विरोध नागा धार्मिक विश्वासों से टकराव के कारण है। इससे भी अहम ये कि नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल ने भी अनिवार्य गायन का विरोध किया है। छात्र संगठनों ने भी धार्मिक विश्वास और व्यक्तिगत अंतरात्मा का हवाला देते हुए वंदे मातरम् के अनिवार्य गायन का विरोध किया। नागालैंड की स्थिति इसलिए बाकी राज्यों से अलग दिखती है क्योंकि यहां छात्र संगठन और चर्च के प्रभाव के कारण आम लोगों की आपत्ति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं।
पूरे पूर्वोत्तर का एक सुर नहीं
नागालैंड की प्रतिक्रिया को पूरे पूर्वोत्तर का रुख मानना सही नहीं होगा। पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता दिवस के आयोजनों का हिस्सा बनाया गया है। मणिपुर और त्रिपुरा में इसके पक्ष में कार्यक्रम हुए हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश में भी राष्ट्रवादी आयोजनों में वंदे मातरम् प्रमुखता से शामिल रहा है। पूर्वोत्तर की तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है, नागालैंड में धार्मिक-सांस्कृतिक आपत्ति और बाकी कई राज्यों में राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में सहज स्वीकार्यता।


