- माओवादी उग्रवाद के लगभग खत्म होने के मोदी ने दावे को अमेरिकी मीडिया ने बनाया प्रमुख खबर, सुरक्षा और विकास रणनीति को बताया बदलाव की अहम वजह
कानपुर। कभी देश के बड़े हिस्से में सुरक्षा और विकास के लिए चुनौती बना नक्सलवाद अब भारत की बदलती तस्वीर का प्रतीक बन रहा है। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से माओवादी उग्रवाद के लगभग खत्म होने का दावा किया तो इसकी गूंज अमेरिकी मीडिया तक भी पहुंची। अमेरिका के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने मोदी के भाषण में नक्सलवाद को प्रमुखता दी। दोनों की रिपोर्टों में दशकों पुराने माओवादी विद्रोह के कमजोर पड़ने को प्रमुख खबर बनाया गया।
भारत के लिए खास बात यह है कि अमेरिकी मीडिया ने स्वतंत्रता दिवस के पूरे भाषण में से जिस हिस्से को अंतरराष्ट्रीय खबर के लिए चुना, वह भारत की एक ऐसी आंतरिक सुरक्षा चुनौती के कमजोर पड़ने से जुड़ा है, जिसने दशकों तक देश के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की। यानी जिस नक्सलवाद को कभी भारत की बड़ी सुरक्षा समस्या के रूप में दुनिया देखती थी, आज उसकी कहानी उसके अंत की ओर बढ़ते प्रभाव के रूप में सामने आ रही है।
बंदूक की ताकत कमजोर, बदल गई नक्सलवाद की तस्वीर
Associated Press ने अपनी रिपोर्ट में मोदी के इस संदेश को प्रमुखता दी कि भारत का दशकों पुराना माओवादी विद्रोह अब समाप्ति की ओर है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री ने माओवादी हिंसा में कमी को सरकार की सुरक्षा और विकास रणनीतियों से जोड़ा। Washington Post ने भी स्वतंत्रता दिवस की अपनी रिपोर्ट में यही प्रमुख कोण चुना कि सशस्त्र माओवादी विद्रोह कमजोर पड़ रहा है, लेकिन उससे जुड़ी वैचारिक चुनौती अभी बनी हुई है। यही वह बदलाव है जिसे भारत के नजरिये से बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
दशकों की हिंसा के बाद आई बड़ी राहत
नक्सलवाद की जड़ें 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन तक जाती हैं। इसके बाद माओवादी हिंसा ने देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों में लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा। इस संघर्ष में सुरक्षा बलों, आम नागरिकों और माओवादी कार्यकर्ताओं समेत हजारों लोगों की जान गई। इसलिए प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं है। यह उन इलाकों की बदली हुई तस्वीर का संकेत भी है, जहां कभी हिंसा के कारण सामान्य जीवन और विकास दोनों प्रभावित होते थे। AP ने भी अपनी रिपोर्ट में माओवादी आंदोलन के दशकों लंबे हिंसक इतिहास और उसके कारण हुई मौतों का उल्लेख किया है।
सुरक्षा के साथ विकास ने बदली जमीन
नक्सलवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई को केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई के नजरिये से देखना अधूरा होगा। प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ सड़क, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने की कोशिशों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही वजह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राज्य की मौजूदगी पहले की तुलना में मजबूत हुई है। जिन इलाकों में कभी प्रशासन की पहुंच सीमित थी, वहां अब सड़क और मोबाइल नेटवर्क से लेकर बैंकिंग और सरकारी योजनाओं तक की पहुंच बढ़ी है। प्रधानमंत्री के भाषण और AP की रिपोर्ट में सुरक्षा तथा विकास को साथ लेकर चलने वाली रणनीति का संदर्भ इसी बदलाव को रेखांकित करता है।
अब मोदी ने चेताया—खतरा बंदूक से विचारधारा तक
प्रधानमंत्री ने हालांकि केवल उपलब्धि की बात नहीं की। उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र करते हुए कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद के कमजोर होने के बाद वैचारिक स्तर पर मौजूद चुनौती से भी सतर्क रहना होगा। यही हिस्सा अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टिंग का दूसरा प्रमुख पहलू बना। AP ने मोदी की इस चेतावनी को प्रमुखता से रिपोर्ट किया और साथ ही आलोचकों की यह आपत्ति भी दर्ज की कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल वैध असहमति को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। भारत के नजरिये से प्रधानमंत्री के संदेश की मूल भावना यह है कि सुरक्षा की उपलब्धि को स्थायी बनाने के लिए हिंसक विचारधारा को दोबारा जमीन नहीं मिलने देनी होगी। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अंतर स्पष्ट रहना भी उतना ही जरूरी है कि हिंसक संगठन का समर्थन और सरकार की नीतियों की आलोचना एक ही बात नहीं है।
अमेरिकी मीडिया की नजर में क्यों बड़ी खबर बना नक्सलवाद?
मोदी का स्वतंत्रता दिवस भाषण केवल नक्सलवाद तक सीमित नहीं था। इसमें विकसित भारत, आत्मनिर्भरता, युवाओं, तकनीक, रक्षा उत्पादन, ऊर्जा और आर्थिक विकास जैसे कई बड़े मुद्दे शामिल थे। फिर भी Washington Post और AP ने नक्सलवाद को प्रमुखता दी। इससे पता चलता है कि अमेरिकी मीडिया के लिए भारत की आंतरिक सुरक्षा में आया बदलाव अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय है। जिस माओवादी आंदोलन ने दशकों तक भारत की सुरक्षा और विकास की कहानी को प्रभावित किया, उसका कमजोर पड़ना भारत की बदलती क्षमता का संकेत माना जा रहा है। यानी अमेरिकी पाठक के सामने भारत की तस्वीर केवल एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की नहीं, बल्कि अपनी पुरानी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों को पीछे छोड़ते देश की भी बन रही है।
भारत की उपलब्धि का अंतरराष्ट्रीय संदेश
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सकारात्मक पहलू यही है कि नक्सलवाद पर भारत की लड़ाई अब केवल घरेलू राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं है। अमेरिकी मीडिया ने भी इसे अपनी स्वतंत्रता दिवस कवरेज का प्रमुख हिस्सा बनाया है। Washington Post की रिपोर्ट का शीर्षक ही सशस्त्र माओवाद के कमजोर पड़ने और वैचारिक खतरे के बने रहने को केंद्र में रखता है। AP ने भी लगभग यही फ्रेम अपनाया। भारत के लिए इसका संदेश साफ है, दशकों तक देश के सामने खड़ी रही एक बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती अब निर्णायक रूप से कमजोर हुई है।
अमेरिकी मीडिया ने दिखाया भारत का बदला चेहरा
80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी का नक्सलवाद पर दिया गया संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसकी खबर भारत से निकलकर अमेरिकी मीडिया के प्रमुख मंचों तक पहुंची। Washington Post और AP ने जिस विषय को प्रमुखता दी, वह भारत के लिए गौरव का विषय भी है, जिस हिंसक आंदोलन ने दशकों तक देश को चुनौती दी, उसकी सशस्त्र ताकत अब समाप्ति की ओर बताई जा रही है।


