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युद्ध से चरमराया कानपुर का चर्म उद्योग, 1000 करोड़ के आर्डर अटके

  • बंदरगाहों पर जूते, बेल्ट, पर्स और जैकेट समेत तैयार माल की खेप फंसी, केमिकल और कच्चे माल की आपूर्ति बाधित- उत्पादन इकाइयों की रफ्तार पड़ी धीमी, फ्रेट, मरीन इंश्योरेंस और वार रिस्क सरचार्ज बढ़ने से निर्यातकों पर दोहरी मार

विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब उत्तर प्रदेश के चर्म उद्योग की उत्पादन और निर्यात श्रृंखला पर साफ दिखाई देने लगा है। कानपुर समेत प्रदेश के प्रमुख चर्म औद्योगिक केंद्रों में तैयार माल की विदेशों तक पहुंच प्रभावित हुई है, जबकि चमड़े की फिनिशिंग और प्रसंस्करण में इस्तेमाल होने वाले कुछ केमिकल व अन्य कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से उत्पादन की गति भी धीमी पड़ गई है। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि कानपुर में करीब पांच सौ इकाइयों को अब तक एक हजार करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर प्रभावित होने का झटका लगा है।

युद्ध के कारण समुद्री मार्गों में अनिश्चितता बढ़ी है। जहाजों के रूट बदलने, यात्रा अवधि बढ़ने और बीमा जोखिम बढ़ने से निर्यात की लागत बढ़ी है। कई निर्यातकों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि माल तैयार होने के बाद भी उसकी डिलीवरी का समय निश्चित नहीं रह गया है। विदेशी खरीदारों तक समय पर माल नहीं पहुंचने से नए ऑर्डर पर भी असर पड़ने लगा है। चर्म आयात-निर्यात विशेषज्ञ जफर फिरोज के मुताबिक कानपुर के निर्यातकों को एक साथ कई मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। एक तरफ विदेश भेजे जाने के लिए तैयार माल की खेप रास्ते में अटक रही है तो दूसरी ओर कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होने से नई खेप तैयार करने की प्रक्रिया भी धीमी हो रही है। बारिश और नमी ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। लंबे समय तक गोदामों में पड़े चमड़े और तैयार उत्पादों में फंगस लगने का खतरा बढ़ गया है।

तैयार माल फंसा, नई खेप की तैयारी भी प्रभावित

चर्म उद्योग की उत्पादन प्रक्रिया कई चरणों और अलग-अलग इनपुट पर निर्भर करती है। चमड़े की टैनिंग, फिनिशिंग और उत्पाद निर्माण के बाद तैयार माल समुद्री मार्ग से विदेशी बाजारों तक भेजा जाता है। मौजूदा संकट में केवल निर्यात का रास्ता ही प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि आयातित कच्चे माल और केमिकल की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है। इसका सीधा असर उन इकाइयों पर पड़ रहा है जो लगातार उत्पादन के लिए समयबद्ध कच्चे माल की आपूर्ति पर निर्भर रहती हैं। यदि किसी एक इनपुट की आपूर्ति में देरी होती है तो पूरी उत्पादन श्रृंखला की गति प्रभावित हो जाती है।

कानपुर के साथ आगरा और उन्नाव भी प्रभावित

उत्तर प्रदेश में कानपुर के अलावा आगरा, उन्नाव के बंथरा, नोएडा और गाजियाबाद चर्म एवं फुटवियर उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। इन क्षेत्रों से जूते, सेफ्टी फुटवियर, चमड़े के उत्पाद, सैडलरी और अन्य सामान विदेशी बाजारों में भेजे जाते हैं। राज्य की नई फुटवियर, लेदर और नॉन-लेदर नीति में भी कानपुर को लेदर फुटवियर एक्सेसरीज, सेफ्टी फुटवियर और सैडलरी के प्रमुख केंद्र के रूप में रेखांकित किया गया है। कानपुर की खास पहचान सैडलरी और हार्नेस उत्पादों के लिए है। 2023 में जिला स्तर पर आयोजित निर्यात संबंधी कार्यक्रम में भी सैडलरी को शहर के प्रमुख निर्यात उत्पादों में बताया गया था और कानपुर की हिस्सेदारी को 17 प्रतिशत बताया गया था।

सबसे बड़ी चिंता लॉजिस्टिक लागत की

आनवर्ड शिपिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक शाहब खान के मुताबिक संघर्ष के कारण लगाए जा रहे वॉर रिस्क सरचार्ज ने निर्यातकों की लागत बढ़ा दी है। उनके अनुसार एक कंटेनर पर तीन हजार डॉलर तक अतिरिक्त चार्ज का बोझ पड़ा है। युद्ध के दौरान समुद्री परिवहन में जोखिम बढ़ने के साथ मरीन इंश्योरेंस का प्रीमियम और अन्य ऑपरेटिंग खर्च भी बढ़ सकते हैं। केंद्र सरकार ने भी मार्च में पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों में व्यवधान से उत्पन्न असाधारण फ्रेट वृद्धि, बीमा प्रीमियम और युद्ध-संबंधी निर्यात जोखिमों को देखते हुए RELIEF योजना शुरू की थी। यानी भारतीय निर्यातक युद्ध में सीधे शामिल नहीं होने के बावजूद उसकी आर्थिक कीमत लॉजिस्टिक लागत और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के रूप में चुका रहे हैं।

अमेरिका का अलग टैरिफ दबाव भी जारी

चर्म उद्योग के लिए मुश्किल सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। अमेरिकी बाजार में भारतीय चमड़ा, चमड़ा उत्पाद और फुटवियर पर टैरिफ का दबाव भी बना हुआ है। चर्म निर्यात परिषद के अनुसार जुलाई 2026 में अमेरिका ने विभिन्न भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जिसमें चमड़ा, चमड़ा उत्पाद और फुटवियर भी शामिल हैं। यह अतिरिक्त शुल्क 24 जुलाई 2026 से प्रभावी हुआ। इससे निर्यातकों की लागत और प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और बढ़ गया है। खासकर ऐसे समय में जब समुद्री परिवहन पहले ही महंगा और अनिश्चित हो चुका है, अमेरिकी बाजार में अतिरिक्त शुल्क निर्यातकों के मार्जिन पर असर डाल सकता है।

यूरोप में राहत की नई उम्मीद, लेकिन लॉजिस्टिक संकट चुनौती

दूसरी ओर यूरोपीय बाजार भारतीय चर्म उद्योग के लिए बड़ा अवसर बना हुआ है। चर्म निर्यात परिषद के मुताबिक यूरोपीय संघ दुनिया में चमड़े, चमड़ा उत्पाद और फुटवियर का सबसे बड़ा आयातक है और भारतीय चर्म एवं फुटवियर निर्यात में यूरोप की हिस्सेदारी करीब 43 प्रतिशत है। भारत-ईयू एफटीए के तहत चमड़ा और फुटवियर क्षेत्र के लिए शुल्क में कमी की संभावनाओं से भारतीय निर्यात को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। इसी तरह भारत-यूके सीईटीए 15 जुलाई 2026 से प्रभावी हो चुका है और इसके तहत भारत से ब्रिटेन भेजे जाने वाले चमड़ा, चमड़ा उत्पाद और फुटवियर को शून्य प्रतिशत सीमा शुल्क का लाभ मिल सकता है। ऐसे में उद्योग के सामने विडंबना यह है कि एक ओर नए बाजारों में अवसर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया के समुद्री संकट से माल की आवाजाही और लागत प्रभावित हो रही है।

छोटे निर्यातकों पर ज्यादा असर

बड़ी कंपनियां बढ़ी हुई लॉजिस्टिक लागत को कुछ हद तक वहन कर सकती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम निर्यातकों के लिए अतिरिक्त फ्रेट, बीमा, स्टोरेज और देरी की लागत सीधे मार्जिन को प्रभावित करती है। यही वजह है कि मौजूदा संकट में एमएसएमई इकाइयों की कार्यशील पूंजी और समय पर भुगतान की स्थिति भी चिंता का विषय बन गई है। सरकार की RELIEF योजना में भी असाधारण फ्रेट और बीमा बोझ से प्रभावित एमएसएमई निर्यातकों के लिए सहायता का प्रावधान किया गया था। पात्र निर्यातकों के लिए कुछ मामलों में अतिरिक्त जोखिम कवरेज और सहायता का प्रावधान रखा गया है।

आर्डर बचाने के लिए वैकल्पिक बाजार जरूरी

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट से निपटने के लिए केवल समुद्री परिवहन सामान्य होने का इंतजार पर्याप्त नहीं होगा। निर्यातकों को यूरोप, ब्रिटेन और अन्य बाजारों में नए खरीदारों से जुड़ने, वैकल्पिक लॉजिस्टिक मार्ग तलाशने और उत्पादों में वैल्यू एडिशन बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। कानपुर जैसे चर्म औद्योगिक क्लस्टर के लिए यह संकट एक चेतावनी भी है कि उत्पादन क्षमता के साथ-साथ सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, बीमा और बाजारों का विविधीकरण भी निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए उतना ही जरूरी है। फिलहाल उद्योग की निगाह समुद्री मार्गों की स्थिति, फ्रेट दरों और विदेशी खरीदारों के रुख पर टिकी है। यदि संघर्ष और लॉजिस्टिक व्यवधान लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल अटके हुए आर्डरों तक सीमित न रहकर उत्पादन, रोजगार और नए निर्यात अनुबंधों तक पहुंच सकता है।

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