– अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी सप्लाई चेन को चीन से अलग करने की रणनीति तेज की, भारत के सामने खनन से आगे बढ़कर प्रोसेसिंग और हाई वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग का मौका
भारत19 डेस्क
कानपुर। अमेरिका चीन पर क्रिटिकल मिनरल्स की निर्भरता कम करने और अपनी रक्षा तथा रणनीतिक औद्योगिक सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ट्रंप प्रशासन ने इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मित्र देशों के साथ वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क विकसित करने पर जोर दिया है। इस बदलती रणनीति में भारत महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है, लेकिन इसके लिए भारत को केवल खनिज भंडार या कच्चे माल की आपूर्ति तक सीमित रहने के बजाय प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता विकसित करनी होगी।
अमेरिकी समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 7 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन क्रिटिकल मिनरल्स और बैटरी प्रोजेक्ट्स में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश करेगा। इसका उद्देश्य अमेरिकी रक्षा सप्लाई चेन को मजबूत करना और महत्वपूर्ण खनिजों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है। अमेरिका की यह पहल ऐसे समय में तेज हुई है जब चीन की क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ पर पकड़ को रक्षा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और रिनिवेबल एनर्जी उद्योगों के लिए रणनीतिक जोखिम माना जा रहा है।
चीन की खनन नहीं, प्रोसेसिंग में असली ताकत
रॉयटर्स की जनवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार चीन तांबा, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग में करीब 47 से 87 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रखता है। इन खनिजों का इस्तेमाल रक्षा तकनीक, सेमी कंडक्टर, बैटरी और रिनिवेबल एनर्जी कंपोनेंट्स सहित कई रणनीतिक क्षेत्रों में होता है। यही वजह है कि अमेरिका के लिए चीन से निर्भरता कम करने का मतलब केवल अपने यहां खनन बढ़ाना नहीं है। चुनौती पूरी वैल्यू चेन तैयार करने की है, माइनिंग से प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, कंपोनेंट्स और फिर मैन्यूफैक्चरिंग तक। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के विश्लेषण के मुताबिक क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में सबसे बड़े बाटलनेम माइनिंग से ज्यादा रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग हैं। चीन के पास वैश्विक प्रोसेसिंग क्षमता का बहुत बड़ा हिस्सा है और कई रेयर अर्थ के मामले में उसकी पकड़ लगभग निर्णायक है।
भारत के लिए खुल रहा बड़ा अवसर
अमेरिका की चीन-प्लस सप्लाई चेन रणनीति भारत के लिए एक बड़ा अवसर पैदा कर रही है। भारत पहले से ही अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल्स की वैकल्पिक सप्लाई चेन पर सहयोग कर रहा है। जनवरी में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की मेजबानी में हुई बैठक में भारत समेत अमेरिका के कई सहयोगी देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ की सप्लाई चेन को सुरक्षित और विविध बनाने पर चर्चा की थी। रॉयटर्स के मुताबिक बैठक में भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसका संकेत साफ है कि अमेरिका चीन का एकमात्र विकल्प तैयार करने के बजाय कई देशों पर आधारित विविध आपूर्ति नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में भारत के पास इस नेटवर्क में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर है।
रेयर अर्थ मैग्नेट में भारत ने शुरू की तैयारी
भारत ने रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के क्षेत्र में भी अपनी क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। रॉयटर्स की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने वर्ष 2026 के अंत तक घरेलू स्तर पर रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सरकार ने 7,300 करोड़ रुपये के करीब का कार्यक्रम मंजूर किया है और चार क्रिटिकल प्रोसेसिंग प्लांट्स स्थापित करने की योजना है। भारत सरकार के अनुसार रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट निर्माण योजना के तहत 6,000 मीट्रिक टन सालाना की एकीकृत उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। इन मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टरबाइन, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा प्रणालियों में होता है। रॉयटर्स के मुताबिक भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा संसाधन आधार है, लेकिन घरेलू उत्पादन और प्रोसेसिंग क्षमता अभी सीमित है। भारत की रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट की मांग 2030 तक दोगुनी होने का अनुमान है, जबकि चीन ऐसे मैग्नेट की प्रोसेसिंग में करीब 90 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है।
सिर्फ भंडार से नहीं टूटेगा चीन का दबदबा
यही भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है। रेयर अर्थ या लीथियम का भंडार होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। उसे निकालने, अलग करने, शुद्ध करने, उससे धातु और मिश्रधातु बनाने और फिर उससे मैग्नेट, बैटरी कम्पोनेंट अथवा दूसरे हाईटेक प्रोडक्ट बनाने की पूरी औद्योगिक क्षमता जरूरी है। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के अनुसार चीन ने वर्षों तक रेयर अर्थ वैल्यू चेन के प्रत्येक स्तर माइनिंग, रिफायनिंग और रिसाइलिंग में निवेश किया है। इसी वजह से दूसरे देशों में खनन बढ़ने के बावजूद चीन की प्रोसेसिंग क्षमता को तुरंत बदलना मुश्किल है। अमेरिकी कंपनियां भी इस चुनौती को समझते हुए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रही हैं। एसोसिएट प्रेस की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी कंपनियां उन क्रिटिकल मिनरल्स की गैर-चीनी सप्लाई विकसित करने में तेजी ला रही हैं, जिनका इस्तेमाल टामहाक मिसाइल और थाड जैसे रक्षा प्रणालियों में होता है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को नई माइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं।
अमेरिका के लिए यह आर्थिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा
क्रिटिकल मिनरल्स अब केवल व्यापार या उद्योग का विषय नहीं रह गए हैं। अमेरिका में इन्हें नेशनल सिक्योरिटी और डिफेंस इंडट्रियल बेस से जोड़कर देखा जा रहा है। रॉयटर्स की अगस्त की रिपोर्ट में भी अमेरिकी सरकार के नए निवेश को घरेलू उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत करने की व्यापक नीति का हिस्सा बताया गया है। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के फरवरी 2026 के विश्लेषण में भी कहा गया है कि अमेरिका चीन से क्रिटिकल मिलरल्स की निर्भरता कम करने के लिए पारंपरिक माइनिंग और प्रोसेसिंग के साथ रीसाइक्लिंग, वेस्ट रिकवरी, नई निष्कर्षण तकनीक और वैकल्पिक सामग्री पर जोर दे सकता है।
भारत के सामने असली सवाल
पूरी रणनीति में भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उसके पास कितने लीथियम या रेयर अर्थ संसाधन हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत चीन-प्लस-वन सप्लाई चेन में केवल कच्चे माल का सप्लायर बनेगा या प्रोसेसिंग और हाई वैल्यू मैन्यूफैक्चरिंग का केंद्र भी बन पाएगा। अगर भारत रेयर अर्थ अलग करना, रिफाइनिंग, परमानेंट मैग्नेट, परमानेंट मैटेरियल्स, एडवांस मैटीरियल और सेमीकंडक्टर लिंक्ड मैन्यूफैक्चरिंग में में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ाता है तो अमेरिकी और पश्चिमी कंपनियों के लिए वह चीन के बाहर एक महत्वपूर्ण औद्योगिक साझेदार बन सकता है। लेकिन यदि प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग की क्षमता विकसित नहीं हुई तो भारत के खनिज भंडार का बड़ा हिस्सा भी वैश्विक सप्लाई चेन में सीमित मूल्य ही पैदा करेगा। अमेरिकी रणनीति का मौजूदा संकेत स्पष्ट है—चीन पर निर्भर एकल सप्लाई चेन के बजाय कई देशों पर आधारित नेटवर्क। भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों इसी में छिपे हैं। अब फैसला यह करना है कि भारत इस नई सप्लाई चेन में केवल खनिज देगा या पूरी वैल्यू चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
स्रोत: Reuters, Associated Press (AP), Council on Foreign Relations (CFR), भारत सरकार/PIB।


