- अमेरिकी हाउस से 262-159 से पास हुआ बिल, ट्रंप को रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति
भारत 19 डेस्क
रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी टैरिफ की तलवार अब और करीब आ गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक को 262-159 मतों से मंजूरी दे दी है। इसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले चुनिंदा देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है। भारत और चीन इस प्रावधान से प्रभावित होने वाले प्रमुख देशों में हैं।
भारत ने कहा ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं
अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने 17 सितंबर को आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी की। मंत्रालय ने कहा कि भारत घटनाक्रम पर नजर रख रहा है और 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस की खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। मंत्रालय के मुताबिक, इस घटनाक्रम के संभावित असर पर अमेरिकी पक्ष के साथ चर्चा भी की गई है और सरकार इसके प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार एवं उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करेगी।
100% टैरिफ अभी लागू नहीं, राष्ट्रपति के फैसले पर असर
विधेयक के पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत और चीन पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। कानून बनने के बाद राष्ट्रपति को निर्धारित परिस्थितियों में टैरिफ लगाने का अधिकार मिलेगा। टैरिफ की वास्तविक दर और किन देशों पर इसे लागू किया जाएगा, यह अमेरिकी प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा। विधेयक में रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच आयातक देशों तथा रूस के तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष देशों पर शून्य से 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है।
भारत के अमेरिकी निर्यात पर बढ़ेगा लागत का दबाव
भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम अमेरिकी बाजार में निर्यात की लागत बढ़ने का है। 2025 में अमेरिका ने भारत से 103.8 अरब डॉलर का माल आयात किया था। यदि भारतीय उत्पादों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाता है तो अमेरिकी आयातकों के लिए भारतीय माल की लागत में भारी वृद्धि हो सकती है। इसका असर उन क्षेत्रों पर अधिक पड़ सकता है जहां अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से समान उत्पाद खरीद सकते हैं। इनमें फार्मास्युटिकल, इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, कपड़ा-परिधान, रसायन और ऑटो कंपोनेंट जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
100 डॉलर का माल 200 डॉलर का कैसे होगा
मान लीजिए किसी भारतीय उत्पाद का अमेरिकी आयात मूल्य 100 डॉलर है। 100 प्रतिशत टैरिफ लगने पर केवल टैरिफ के रूप में 100 डॉलर और जुड़ेंगे। यानी अमेरिकी आयातक की लागत 200 डॉलर हो सकती है, अन्य शुल्क और खर्च अलग होंगे। हालांकि इसका पूरा बोझ भारतीय निर्यातक पर ही पड़े, यह जरूरी नहीं है। अमेरिकी आयातक कुछ हिस्सा खुद वहन कर सकता है, निर्यातक कीमत घटा सकता है या अतिरिक्त लागत अमेरिकी उपभोक्ता तक पहुंच सकती है।
चीन पर भारत से भी बड़ा हो सकता है असर
चीन के लिए अमेरिकी बाजार का दांव और बड़ा है। 2025 में अमेरिका ने चीन से 308.7 अरब डॉलर का माल आयात किया था। इसलिए 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने की स्थिति में चीनी सामान की अमेरिकी बाजार में लागत और प्रतिस्पर्धा पर बड़ा असर पड़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, उपभोक्ता सामान, फर्नीचर, प्लास्टिक उत्पाद और दूसरे विनिर्मित सामान में अमेरिकी आयातकों को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं। इससे चीन से आयात घटने और दूसरे देशों से आयात बढ़ने की संभावना बन सकती है।
भारत के लिए रूसी तेल खरीदना बनेगा बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में भारत के सामने सबसे अहम आर्थिक सवाल रूसी कच्चे तेल की खरीद और अमेरिकी बाजार के बीच संतुलन का है। रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए लागत का लाभ देता है, लेकिन यदि उसी वजह से भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ता है तो निर्यात कारोबार पर उसका असर पड़ सकता है। यानी भारत के लिए मामला केवल तेल खरीद की कीमत तक सीमित नहीं रहेगा। एक तरफ रूसी तेल से मिलने वाला संभावित लागत लाभ होगा, दूसरी तरफ अमेरिकी बाजार तक पहुंच महंगी होने का जोखिम।
अमेरिकी कंपनियों और ग्राहकों पर भी पड़ेगा असर
100 प्रतिशत टैरिफ का असर केवल भारत और चीन पर नहीं पड़ेगा। अमेरिकी आयातकों को समान उत्पाद दूसरे देशों से खरीदने पड़ सकते हैं। नए सप्लायर तलाशने, उत्पादन शृंखला बदलने और परिवहन व्यवस्था में बदलाव की लागत बढ़ सकती है। जहां दूसरे देशों से तुरंत समान उत्पाद उपलब्ध नहीं होंगे, वहां अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए कीमत बढ़ने का दबाव भी बन सकता है। वहीं भारत और चीन के कुछ उत्पादों के लिए दूसरे बाजारों में निर्यात बढ़ाने की कोशिश तेज हो सकती है।
भारत-चीन के सामने बदल सकती है व्यापार रणनीति
यदि 100 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में लागू होता है तो दोनों देशों की कंपनियों के सामने अमेरिकी बाजार में कीमत बनाए रखने की चुनौती होगी। इसके जवाब में कंपनियां अमेरिकी आयातकों के साथ कीमत साझा करने, उत्पादन लागत घटाने, दूसरे देशों में बाजार बढ़ाने और सप्लाई चेन में बदलाव जैसे विकल्प अपना सकती हैं। भारत के लिए इसका एक अलग पहलू भी है। यदि कुछ चीनी उत्पाद अमेरिकी बाजार से महंगे होते हैं तो भारतीय कंपनियों के लिए कुछ श्रेणियों में अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का अवसर बन सकता है। हालांकि यह तभी संभव होगा जब भारतीय उत्पाद टैरिफ और लागत के बाद भी प्रतिस्पर्धी बने रहें।
अब नजर ट्रंप प्रशासन के अगले फैसले पर
बिल के हाउस से पारित होने के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद प्रशासन की कार्रवाई होगी। इसलिए फिलहाल इसे 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने की खबर के बजाय 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलने की दिशा में बड़ा कदम समझना अधिक सटीक होगा। भारत के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया से भी स्पष्ट है कि नई अमेरिकी व्यवस्था के संभावित असर पर भारत नजर रख रहा है और ऊर्जा आपूर्ति के साथ अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखने की तैयारी कर रहा है। भारत और चीन के कारोबार पर वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि अमेरिका कानून को किस तरह लागू करता है, टैरिफ की दर कितनी रखता है, किन उत्पादों को दायरे में लाता है और रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर दोनों देशों की नीतियों में क्या बदलाव आता है।


