- उत्तर प्रदेश में सामान्य बारिश का करीब 76.5 प्रतिशत कोटा पूरा, कानपुर में 769 मिमी के मुकाबले 672.7 मिमी वर्षा; मानसून के बचे डेढ़ महीने में ज्यादा बारिश बढ़ा सकती है जलभराव और फसलों की चिंता
भारत 19
विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। ढाई महीने की मानसूनी बारिश ने उत्तर प्रदेश के खेतों और जलस्रोतों की प्यास काफी हद तक बुझा दी है। जून से अगस्त के बीच सक्रिय रहे मानसून ने प्रदेश में बारिश के आंकड़े को सामान्य स्तर के करीब पहुंचा दिया है। अब स्थिति यह है कि आने वाले दिनों में होने वाली तेज और लगातार बारिश राहत के बजाय कई इलाकों में नई चुनौती पैदा कर सकती है। पहले से नमी से भरी जमीन, लबालब होते तालाब और बढ़ते नदी जलस्तर के बीच भारी बारिश बाढ़, जलभराव और खरीफ फसलों के लिए खतरा बढ़ा सकती है।
उत्तर प्रदेश में एक जून से 15 अगस्त तक 367.3 मिमी बारिश हो चुकी है, जबकि सामान्य बारिश 480.1 मिमी है। यानी इस अवधि तक सामान्य बारिश का करीब 76.50 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, संभल, फिरोजाबाद और एटा समेत कई जिलों में भारी बारिश दर्ज की गई है। प्रदेश के कई जिले ऐसे भी हैं, जहां सामान्य से 120 प्रतिशत से अधिक वर्षा हो चुकी है। मानसून का अभी करीब डेढ़ महीना बाकी है। ऐसे में यदि अगस्त के शेष दिनों और सितंबर में बारिश का सिलसिला सक्रिय रहा तो सामान्य वर्षा का आंकड़ा पूरा होने के साथ कई क्षेत्रों में अतिरिक्त बारिश की स्थिति भी बन सकती है। यही अतिरिक्त बारिश अब खेतों, नदियों और निचले इलाकों के लिए चुनौती बन सकती है।
कानपुर में भी सामान्य बारिश के करीब पहुंचा आंकड़ा
औद्योगिक क्षेत्र कानपुर में भी मानसूनी बारिश सामान्य के काफी करीब पहुंच चुकी है। जून से सितंबर के बीच यहां सामान्य मानसूनी बारिश 769 मिमी मानी जाती है। इसके मुकाबले अब तक 672.7 मिमी बारिश हो चुकी है। लगातार बारिश के कारण नदी, तालाब और अन्य जलस्रोतों में पानी का स्तर बढ़ा है। पर्याप्त वर्षा से भूजल और कृषि को राहत मिली है, लेकिन आने वाले दिनों में तेज बारिश हुई तो यही स्थिति जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती है। कानपुर बैराज पर गंगा का जलस्तर भी बढ़ा हुआ है। यहां अपस्ट्रीम में 113.580 मीटर और डाउनस्ट्रीम में 113.430 मीटर जलस्तर दर्ज किया गया। बैराज पर चेतावनी स्तर 114 मीटर और खतरे का स्तर 115 मीटर है। यानी गंगा का पानी चेतावनी स्तर के काफी करीब पहुंच चुका है। कानपुर के निकट शुक्लागंज में भी गंगा का जलस्तर 112.220 मीटर तक पहुंच गया है। ऐसे में ऊपरी क्षेत्रों में लगातार बारिश और पानी का प्रवाह बढ़ने पर नदी के जलस्तर में और तेजी आ सकती है।

जमीन की बुझ चुकी प्यास के बाद बढ़ता है खतरा
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मौसम एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. नौशाद खान बताते हैं कि अब तक हुई बारिश ने खेतों और जलस्रोतों में पर्याप्त नमी पहुंचा दी है। लेकिन तेज बारिश की संभावना अभी बनी हुई है। उनके अनुसार जमीन की पानी सोखने की क्षमता सीमित होती है। लगातार बारिश के बाद मिट्टी जब पर्याप्त पानी सोख चुकी होती है तो उसके बाद होने वाली तेज वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय सतह पर बहने लगता है। यही अतिरिक्त पानी नालों, नदियों और निचले इलाकों की ओर बढ़ता है। ऐसी स्थिति में जलभराव और नदियों के उफान में आने का खतरा बढ़ जाता है। चिंता उन क्षेत्रों को लेकर सबसे अधिक है, जहां जलनिकासी व्यवस्था कमजोर है या अतिरिक्त पानी के तेजी से निकलने का पर्याप्त इंतजाम नहीं है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारी बारिश की चेतावनी
हालिया सक्रिय मानसून के बाद मौसम विभाग ने प्रदेश के कई जिलों में भारी बारिश की चेतावनी दी है। मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में 18 और 19 अगस्त को कई स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है। अगर पहले से पर्याप्त नमी वाले क्षेत्रों में कम समय के भीतर तेज बारिश होती है तो खेतों और निचले इलाकों में पानी भरने का खतरा बढ़ सकता है। नदियों और जलाशयों का बढ़ता जलस्तर भी ऐसी स्थिति में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए चिंता बढ़ा सकता है।
खरीफ फसलों के लिए राहत भी, चुनौती भी
पर्याप्त बारिश से धान, मक्का, बाजरा, अरहर और अन्य खरीफ फसलों की बढ़वार को फायदा मिलता है। खेतों में बनी नमी पौधों की वृद्धि के लिए उपयोगी है और सिंचाई की जरूरत भी कम होती है। लेकिन यही बारिश अगर सामान्य से बहुत अधिक हो जाए या लंबे समय तक लगातार होती रहे तो फसलों के लिए नुकसानदेह भी साबित हो सकती है। खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहने से पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिलती। इससे जड़ सड़ने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं और पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। धान जैसी फसल कुछ हद तक पानी सहन कर सकती है, लेकिन मक्का, बाजरा, अरहर और अन्य कई खरीफ फसलों के लिए लंबे समय तक जलभराव नुकसान का कारण बन सकता है।
क्या होता है नदी का अप और डाउनस्ट्रीम
अपस्ट्रीमः ऊपरी दिशा या हिस्सा जहां से पानी किसी स्थान की ओर आ रहा होता है। इसे नदी के उद्गम की दिशा भी कहा जा सकता है।
डाउनस्ट्रीमः नदी की वह निचली दिशा जहां पानी किसी स्थान से आगे बहते हुए नदी के मुहाने की ओर जाता है। बैराज और अन्य नदी तटवर्ती क्षेत्रों में दोनों ओर के जलस्तर से पानी के प्रवाह की स्थिति का आकलन किया जाता है।
बारिश की मात्रा से ज्यादा उसका स्वरूप अहम
उत्तर प्रदेश में अब तक हुई मानसूनी बारिश ने खेतों की नमी और जलस्रोतों की स्थिति को काफी हद तक संभाल दिया है। लेकिन मानसून अभी समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए अब आने वाले दिनों में बारिश की केवल मात्रा ही नहीं, बल्कि उसका वितरण और तीव्रता भी महत्वपूर्ण होगी। यदि बारिश सामान्य अंतराल पर और संतुलित रूप से होती है तो यह खेती और जलस्रोतों के लिए फायदेमंद बनी रहेगी। लेकिन कम समय में लगातार भारी बारिश हुई तो पहले से भरी नदियों, संतृप्त जमीन और कमजोर जल निकासी वाले क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव की चुनौती तेजी से बढ़ सकती है। इसलिए मानसून के बचे हुए डेढ़ महीने में उत्तर प्रदेश के सामने तस्वीर बदल सकती है। खेतों और जलस्रोतों की बुझी प्यास के बाद अब सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि कहीं अतिरिक्त बारिश राहत को आफत में न बदल दे।

