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यूपी चुनाव से पहले बूथवार जातीय गणित समझने में लगी भाजपा

  • हर बूथ की प्रमुख चार-पांच जातियों का आंकड़ा जुटाने की तैयारी; संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाकर संबंधित समुदायों तक पहुंच मजबूत करने की रणनीति

भारत 19

राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी औपचारिक रूप से नहीं बजा है, लेकिन भाजपा ने बूथ स्तर पर जातीय समीकरण समझने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी अब हर बूथ पर यह पता लगाने में जुटी है कि किन जातियों की संख्या सबसे अधिक है, उन समुदायों के कौन से लोग प्रभावशाली और सक्रिय हैं और संगठन में उनका प्रतिनिधित्व कितना है। प्रमुख जातियों के सक्रिय लोगों को उसके आधार पर पार्टी से जोड़ने और उन्हें संगठन में जिम्मेदारी देने की रणनीति बनाई जा रही है।

भाजपा का मानना है कि बूथ स्तर से जुटाया गया जातीय आंकड़ा शत-प्रतिशत सटीक न भी हो तो 60-70 प्रतिशत तक सही जानकारी भी चुनावी रणनीति के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। पार्टी इस जानकारी को बूथ संगठन की स्थिति समझने और संबंधित सामाजिक समूहों तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी में है।

हर बूथ से चार-पांच प्रमुख जातियों का आंकड़ा

जिलाध्यक्षों के जरिए जिला और मंडल पदाधिकारियों तक जातीय आंकड़े जुटाने का संदेश पहुंचाया जा रहा है। बूथ अध्यक्षों से अपने क्षेत्र में मौजूद सबसे अधिक संख्या वाली चार-पांच जातियों की जानकारी तैयार करने को कहा जा रहा है। पार्टी की रणनीति के मुताबिक बूथ अध्यक्ष अपने क्षेत्र की सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह आंकड़ा तैयार करेंगे। एक बूथ पर मतदाताओं की संख्या सीमित होने के कारण स्थानीय पदाधिकारियों को वहां के सामाजिक समीकरण की जानकारी होने का तर्क दिया जा रहा है। इसके बाद बूथों से मिली जानकारी को शक्ति केंद्र स्तर पर एकत्र किया जाएगा। शक्ति केंद्र से यह आंकड़ा मंडल अध्यक्षों के पास पहुंचेगा। इस तरह पार्टी बूथवार सामाजिक संरचना का एक व्यापक खाका तैयार करना चाहती है।

जातीय आंकड़े के साथ संगठन में प्रतिनिधित्व पर नजर

इस कवायद का अगला चरण सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित नहीं है। पदाधिकारियों को यह भी देखना होगा कि जिस जाति की किसी बूथ पर संख्या अधिक है, उस समुदाय का कोई सक्रिय व्यक्ति भाजपा संगठन में मौजूद है या नहीं। यदि किसी प्रमुख जाति का प्रतिनिधित्व संगठन में नहीं है तो वहां से सक्रिय और प्रभावशाली व्यक्ति को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की जाएगी। इसके बाद उसे किसी समिति, मोर्चा या संगठनात्मक जिम्मेदारी में स्थान देने की तैयारी है। पार्टी की कोशिश है कि संबंधित समुदाय को यह संदेश मिले कि उसकी सामाजिक भागीदारी भाजपा संगठन में भी मौजूद है। इसके लिए संभावित लोगों से व्यक्तिगत संपर्क करने और उनके घर जाकर पार्टी से जुड़ने का निमंत्रण देने पर भी जोर दिया जा रहा है।

कानपुर की बैठक में सामने आई रणनीति

मंगलवार को कानपुर उत्तर भाजपा की बैठक में जिलाध्यक्ष अनिल दीक्षित ने जिला और मंडल पदाधिकारियों को इसी दिशा में काम करने के निर्देश दिए। उन्होंने पदाधिकारियों से धरातल पर जाकर अपने क्षेत्र का जातीय आंकड़ा समझने और जिन प्रमुख जातियों का संगठन में प्रतिनिधित्व नहीं है, वहां से सक्रिय लोगों को पार्टी से जोड़ने को कहा। इस निर्देश से संकेत मिलता है कि बूथ सत्यापन की कवायद के साथ पार्टी स्थानीय सामाजिक समीकरण को संगठन की संरचना से जोड़ने पर भी काम कर रही है।

बूथ सत्यापन के साथ जातीय समीकरण की पड़ताल

भाजपा इस समय बूथ के साथ मंडल और शक्ति केंद्रों के सत्यापन की तैयारी भी कर रही है। पार्टी के लिए बूथ चुनावी संगठन की सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में से एक है। ऐसे में बूथ की सामाजिक संरचना को समझना आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में अहम माना जा रहा है। सत्यापन और जातीय आंकड़े जुटाने के जरिए पार्टी यह जानना चाहती है कि किस क्षेत्र में कौन सा सामाजिक समूह प्रभावी है और संगठन की पहुंच वहां कितनी है। इसके आधार पर कमजोर कड़ियों को मजबूत करने की कोशिश की जाएगी।

जेन-जी के साथ जातीय समीकरण भी चुनौती

आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने कई स्तरों पर चुनौतियां हैं। पार्टी के भीतर जेन-जी की नाराजगी को लेकर भी मंथन चल रहा है। अलग-अलग मुद्दों पर युवा वर्ग के रुख को देखते हुए भाजपा उसे अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके साथ ही पार्टी अपने पुराने सामाजिक और जातीय समीकरण को भी मजबूत रखने की कोशिश में है। यानी एक तरफ नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ बूथवार जातीय संरचना को समझकर संगठन का सामाजिक आधार मजबूत करने पर जोर है।

जातीय गणित अब बूथ संगठन का हिस्सा

भाजपा विपक्षी दलों पर अक्सर जातीय राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। ऐसे में बूथ स्तर पर जातियों की संख्या समझने, प्रमुख समुदायों की पहचान करने और उसी आधार पर संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की यह कवायद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

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