- लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन वाले कई विधानसभा क्षेत्रों के भाजपा नेताओं ने बाद में उठाए अफसरशाही पर सवाल, बीएल संतोष की समीक्षा के बीच बिठूर विधायक का बिजली को लेकर वीडियो आया सामने
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश भाजपा में 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों की समीक्षा के बीच एक दिलचस्प सियासी पैटर्न दिखाई देता है। जिन विधानसभा क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा का वोट 2022 विधानसभा चुनाव के मुकाबले घटा या पार्टी को पिछड़ना पड़ा, वहां के कुछ भाजपा नेताओं की ओर से बाद में “अफसर सुनते नहीं” का दर्द भी सामने आया। किसी ने अधिकारियों पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप लगाया तो किसी ने फोन न उठाने और शिकायतों पर कार्रवाई न होने का मुद्दा उठाया। यह महज संयोग है या चुनावी जवाबदेही के बीच खड़ा किया गया दूसरा सवाल? इसका सीधा जवाब देना जल्दबाजी होगी। लेकिन चुनावी आंकड़ों और नेताओं के बयानों को साथ रखकर देखने पर सवाल जरूर उठता है कि जब पार्टी के भीतर पूछा जा रहा था कि वोट क्यों घटे, तब कुछ नेताओं के पास जवाब था कि अफसर सुनते नहीं।
चुनावी समीक्षा में विधायकों की भूमिका भी सवालों में थी
2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में भाजपा को 33 सीटें मिलीं। 2019 में भाजपा ने 62 सीटें जीती थीं। नतीजे आने के बाद पार्टी ने हार के कारणों की व्यापक समीक्षा शुरू की। अधिकारियों के असहयोग, स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की कथित अनदेखी, सरकार और संगठन के बीच दूरी, विधायकों की भूमिका और विपक्ष के संविधान-आरक्षण वाले अभियान समेत कई कारणों पर चर्चा हुई। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष की समीक्षा बैठकों में कमजोर प्रदर्शन वाले विधानसभा क्षेत्रों का भी आकलन किया गया। सवाल यह था कि जिन क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव में भाजपा अपेक्षित वोट नहीं ला सकी, वहां संगठन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या रही। यानी पार्टी के भीतर एक तरफ “वोट क्यों घटे?” का सवाल था तो दूसरी तरफ बाद के बयानों में “अफसर क्यों नहीं सुनते?” का सवाल उभरने लगा।
नंदकिशोर गुर्जर ने नतीजों के बाद अफसरों को घेरा
लोनी के भाजपा विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने जून 2024 में ही उत्तर प्रदेश में कम लोकसभा सीटें आने के लिए अधिकारियों और पार्टी नेताओं को जिम्मेदार ठहराया था। जुलाई में उन्होंने कार्यकर्ताओं और जनता की सुनवाई न होने तथा अधिकारियों की कार्यप्रणाली से भाजपा के खिलाफ माहौल बनने की बात कही। हालांकि गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा ने 2024 में जीत दर्ज की। भाजपा उम्मीदवार अतुल गर्ग 3,36,965 वोट से जीते। लेकिन 2019 के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 61.96 प्रतिशत से घटकर 58.09 प्रतिशत और जीत का अंतर करीब 5.01 लाख से घटकर 3.37 लाख रह गया। यानी यहां सीट हाथ से नहीं गई, लेकिन वोट और जीत का फासला दोनों घटे।

शलभ मणि के क्षेत्र में भी वोट नीचे आया
देवरिया सदर से भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने अक्टूबर 2024 में बिजली विभाग के अधिकारी के खिलाफ शिकायत की थी। उनकी शिकायत के बाद संबंधित एसडीओ को जिले से हटा दिया गया। देवरिया सदर विधानसभा क्षेत्र में 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 53.52 प्रतिशत वोट मिले थे। 2024 लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा घटकर 49.78 प्रतिशत रह गया। भाजपा क्षेत्र में आगे रही, लेकिन वोट शेयर में करीब 3.74 प्रतिशत अंक की कमी आई। 2024 में भाजपा की बढ़त 8,593 वोट रही। यानी यहां *हार नहीं हुई, मगर विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा का वोट जरूर घटा।
प्रतिभा शुक्ला के क्षेत्र में वोट घटा, भाजपा पिछड़ी
अकबरपुर-रनियां से भाजपा विधायक और प्रदेश सरकार की राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला ने जुलाई 2025 में अकबरपुर थाने में धरना दिया था। उन्होंने भाजपा कार्यकर्ता के खिलाफ गलत मुकदमा दर्ज करने और पुलिस की ओर से बदसलूकी का आरोप लगाते हुए थाना प्रभारी को हटाने की मांग की थी। उनके विधानसभा क्षेत्र में 2022 में भाजपा को 43.82 प्रतिशत वोट मिले थे। 2024 लोकसभा चुनाव में यह घटकर 37.87 प्रतिशत रह गया। समाजवादी पार्टी 51.98 प्रतिशत वोट के साथ आगे रही। यानी भाजपा का वोट शेयर करीब 5.95 प्रतिशत अंक घटा और लोकसभा चुनाव में पार्टी अपने ही विधायक के विधानसभा क्षेत्र में पिछड़ गई।
बिठूर में भी वोट घटा, सपा आगे निकली
सबसे ताजा मामला बिठूर के भाजपा विधायक अभिजीत सिंह सांगा का है। 17 सितंबर 2026 को सामने आए वीडियो में वह बिजली विभाग के अधिकारी से कहते सुनाई दिए कि जब मंत्री और अधिकारी समस्या नहीं सुन रहे हैं तो जनता आखिर जाए कहां। मामला मंधना क्षेत्र में बिजली कटौती से जुड़ा था। बिठूर के चुनावी आंकड़े भी इस घटनाक्रम को अलग संदर्भ देते हैं। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां 44.46 प्रतिशत वोट मिले थे। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर घटकर 43.24 प्रतिशत रह गया, जबकि समाजवादी पार्टी 47.60 प्रतिशत के साथ आगे निकल गई। यानी भाजपा का वोट 1.22 प्रतिशत अंक घटा और लोकसभा चुनाव में पार्टी बिठूर विधानसभा क्षेत्र में पिछड़ गई।
बीएल संतोष की समीक्षा और फिर सामने आया बिजली का दर्द
बिठूर का मामला इसलिए ज्यादा ध्यान खींचता है क्योंकि इसकी टाइमिंग भाजपा की मौजूदा चुनावी समीक्षा से जुड़ती है। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष सितंबर में विधायक और सांसदों के साथ बैठक करके पार्टी की कमजोरियों और 2024 के चुनावी नुकसान वाले क्षेत्रों का फीडबैक ले रहे हैं। लखनऊ और कानपुर क्षेत्र में संगठन पदाधिकारियों के साथ चुनावी रणनीति और कमजोरियों पर चर्चा हुई। इसी दौरान बिठूर विधायक अभिजीत सिंह सांगा का बिजली अधिकारियों को लेकर नाराजगी जताता वीडियो सामने आया।
पार्टी समीक्षा में कमजोर बूथ और घटते वोट का हिसाब चल रहा था, और मैदान से एक आवाज आई कि “मंत्री और अधिकारी सुनते ही नहीं।” दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रत्यक्ष कारण-परिणाम संबंध सामने नहीं आया है। इसलिए इसे समीक्षा के जवाब में दिया गया बयान कहना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों घटनाओं की टाइमिंग इस राजनीतिक पड़ताल को जरूर दिलचस्प बनाती है।
“अफसर नहीं सुनते” जवाबदेही से बचने का है नैरेटिव?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सियासी सवाल है। 2024 के बाद भाजपा के भीतर चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा शुरू हुई। कमजोर विधानसभा क्षेत्रों में विधायकों और संगठन की भूमिका पर सवाल उठे। इसी अवधि में कुछ जनप्रतिनिधियों की ओर से अधिकारियों की अनदेखी और सुनवाई न होने की शिकायतें भी सामने आईं। इसे “हार की जिम्मेदारी से बचने की पेशबंदी” कहना अभी एक राजनीतिक व्याख्या होगी, प्रमाणित तथ्य नहीं। लेकिन घटनाक्रम में इतना जरूर दिखता है कि जिन क्षेत्रों में भाजपा का वोट घटा या पार्टी लोकसभा चुनाव में पिछड़ी, वहां के कुछ जनप्रतिनिधियों का प्रशासन से असंतोष बाद में सार्वजनिक हुआ।
राजनीति में टाइमिंग अक्सर अपने आप में खबर होती है। यहां भी सवाल वही है कि पार्टी पूछ रही थी कि वोट क्यों घटे, तो क्या कुछ नेताओं ने जवाब में यह बताना शुरू किया कि अफसरों ने सुना ही नहीं? इसका अंतिम जवाब संगठन की चुनावी समीक्षा और बूथवार आंकड़ों से ही निकलेगा। फिलहाल चुनावी आंकड़े और नेताओं के सार्वजनिक बयान इतना जरूर बताते हैं कि “अफसर नहीं सुनते” का दर्द और “वोट क्यों घटे” का सवाल एक ही राजनीतिक समय में आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।


