- प्रधानमंत्री बालेन शाह ने UN में भारत को कहा धन्यवाद, भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा के बाद समय पर मिली मदद के लिए जताया आभार
भारत 19 डेस्क
न्यूयॉर्क में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र ‘बालेन’ शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिमालयी क्षेत्र के लिए नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में साझा जलवायु-लचीलापन तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। शाह ने कहा कि हिमालयी आपदाओं का असर सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, इसलिए उपग्रह आंकड़ों और विशेषज्ञता को साझा करने, खतरनाक हिमनद झीलों की निगरानी और संयुक्त पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने हाल की भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा के दौरान भारत, चीन और अन्य देशों से मिली सहायता के लिए भी आभार जताया।
हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए साझा तंत्र
शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में कहा कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र करीब दो अरब लोगों के पानी, पारिस्थितिकी, कृषि और आजीविका का आधार है। ऐसे में हिमालय में बढ़ते जलवायु जोखिम का असर नेपाल तक सीमित नहीं रह सकता। उन्होंने इसी आधार पर नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में हिमालयी जलवायु-लचीलापन तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। प्रस्तावित व्यवस्था में तीन प्रमुख क्षेत्रों पर जोर दिया गया है—उपग्रह आंकड़ों और विशेषज्ञता को साझा करना, खतरनाक हिमनद झीलों की निगरानी और संयुक्त पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना। आपदा आने की स्थिति में सीमापार राहत और सहायता के समन्वय की व्यवस्था भी इसका हिस्सा हो सकती है।
बाढ़ को पूरे हिमालय के लिए चेतावनी बताया
शाह ने अगस्त में आई भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा को सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं, बल्कि दुनिया के लिए जलवायु संकट की चेतावनी बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल ऐसे संकट की बड़ी कीमत चुका रहा है, जबकि वैश्विक जलवायु संकट पैदा करने में उसका योगदान बहुत कम है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और हजारों लोग प्रभावित हुए। आपदा का संबंध हिमालयी क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और पर्वतीय घटनाओं से जोड़ा गया है, हालांकि किसी खास आपदा में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका तय करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।
भारत को धन्यवाद, राहत सहायता का किया जिक्र
शाह ने आपदा के बाद नेपाल को सहायता देने वाले देशों के प्रति आभार जताया और भारत तथा चीन की समय पर मिली मदद का विशेष उल्लेख किया। इससे पहले नेपाल की संसद में भी शाह भारत और चीन की राहत, तकनीकी सहायता तथा बचाव दलों के लिए धन्यवाद दे चुके हैं। भारत की ओर से नेपाल में राहत सामग्री और बचाव विशेषज्ञ उपलब्ध कराने की जानकारी भी सामने आई है। भारतीय सहायता में आपदा से निपटने के लिए जरूरी सामग्री और विशेषज्ञ दल शामिल रहे। संयुक्त राष्ट्र में शाह का संदेश सिर्फ सहायता मांगने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आपदा के दौरान मिली मदद के लिए धन्यवाद देने के साथ भविष्य में ऐसी घटनाओं से पहले तैयारी और सूचना साझा करने की क्षेत्रीय व्यवस्था की जरूरत भी रखी।
भारत-चीन से उपग्रह आंकड़े साझा करने की अपील
प्रस्ताव का एक अहम हिस्सा उपग्रह से मिलने वाले आंकड़ों और वैज्ञानिक विशेषज्ञता को साझा करना है। हिमनदों और हिमनद झीलों में बदलाव की निगरानी से संभावित जोखिमों की पहले पहचान करने में मदद मिल सकती है। नेपाल का प्रस्ताव है कि तीनों देश खतरनाक हिमनद झीलों की निगरानी को मजबूत करें और संभावित खतरे की जानकारी प्रभावित क्षेत्रों तक जल्दी पहुंचाएं। इससे अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं में तैयारी के लिए उपलब्ध समय बढ़ सकता है।
पूर्व चेतावनी प्रणाली पर भी जोर
शाह के प्रस्ताव में संयुक्त पूर्व चेतावनी प्रणाली को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसका उद्देश्य संभावित बाढ़ या दूसरी हिमालयी आपदा के संकेत मिलने पर संबंधित देशों और प्रभावित आबादी तक सूचना तेजी से पहुंचाना है। हिमालयी क्षेत्र में नदियां, ग्लेशियर और हिमनद झीलें राजनीतिक सीमाओं के अनुसार नहीं बदलतीं। इसलिए नेपाल का तर्क है कि जोखिम की निगरानी और चेतावनी व्यवस्था भी केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
आपदा के बाद मदद से आगे बढ़ा प्रस्ताव
इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसका फोकस आपदा के बाद राहत से ज्यादा आपदा से पहले तैयारी पर है। शाह ने सीमापार सूचना साझा करने और आपदा के समय सहायता के समन्वय की बात रखी है। नेपाल में हालिया बाढ़ ने यह सवाल और गंभीर किया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक आने वाली आपदाओं के लिए भारत, चीन और नेपाल किस तरह साझा तैयारी कर सकते हैं।
जलवायु न्याय और आर्थिक मदद का मुद्दा भी उठा
शाह ने संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों के लिए अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वित्तीय सहायता की मांग भी उठाई। नेपाल की ओर से पहले ही यह तर्क सामने आता रहा है कि कम उत्सर्जन करने वाले देश जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव झेल रहे हैं। रॉयटर्स के अनुसार शाह ने बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण के लिए अनुदान आधारित अंतरराष्ट्रीय सहायता की मांग भी की। नेपाल का कहना है कि ऐसी आपदाओं से उबरने के लिए कर्ज के बजाय अनुदान आधारित वित्तीय सहयोग अधिक उपयुक्त होगा।
भारत के लिए प्रस्ताव का क्या मतलब
नेपाल और भारत पहले से साझा नदियों, बाढ़ पूर्वानुमान और जल संसाधनों से जुड़े विभिन्न तंत्रों के माध्यम से सहयोग करते हैं। भारत और चीन के बीच भी सीमापार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर की व्यवस्था मौजूद है, जिसमें जल संबंधी आंकड़ों और सहयोग के मुद्दे शामिल हैं। शाह का प्रस्ताव इन मौजूदा व्यवस्थाओं से आगे जाकर नेपाल-भारत-चीन के बीच हिमालय केंद्रित व्यापक जलवायु और आपदा सहयोग का ढांचा बनाने की बात करता है। हालांकि अभी यह नेपाल की ओर से रखा गया प्रस्ताव है। तीनों देशों के बीच इसे औपचारिक रूप देने की प्रक्रिया, संस्थागत ढांचा और समयसीमा पर कोई अंतिम सहमति सामने नहीं आई है।
भारत को धन्यवाद के साथ क्षेत्रीय सहयोग का संदेश
बालेन शाह के संयुक्त राष्ट्र संबोधन में दो समानांतर संदेश दिखाई दिए—भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा के बाद भारत और चीन समेत मददगार देशों का आभार और भविष्य की हिमालयी आपदाओं के लिए साझा तैयारी का प्रस्ताव। इस तरह नेपाल ने हाल की आपदा को केवल राहत और पुनर्निर्माण का मुद्दा न बनाकर क्षेत्रीय जलवायु सहयोग से जोड़ दिया है। प्रस्ताव लागू होने की स्थिति में उपग्रह आंकड़े, हिमनद झीलों की निगरानी, पूर्व चेतावनी और सीमापार राहत समन्वय इसके प्रमुख हिस्से हो सकते हैं।


