- इटली के स्कूलों में बुर्का-नकाब पर रोक के प्रस्ताव का विरोध; मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया, मेलोनी से पुनर्विचार की अपील
भारत 19
लखनऊ। इटली के स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रस्तावित रोक को लेकर भारत में भी प्रतिक्रिया सामने आई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के कार्यकारिणी सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ बताया और फैसले पर पुनर्विचार की अपील की।
इटली में क्या प्रस्ताव लेकर आईं मेलोनी
मेलोनी ने 20 सितंबर को अपनी पार्टी ब्रदर्स ऑफ इटली के युवा संगठन के कार्यक्रम में स्कूलों को लेकर कई प्रस्तावों की घोषणा की। इनमें बुर्का और नकाब पर रोक, कक्षाओं में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने और गंभीर एकीकरण संबंधी कठिनाइयों वाले विदेशी छात्रों के अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य करने की बात शामिल है। सरकार इन उपायों को स्कूलों में एकीकरण, भाषा और सामाजिक समावेशन से जोड़कर पेश कर रही है। हालांकि, अभी इसे लागू कानून नहीं माना जा सकता। प्रस्ताव को सरकार की प्रक्रिया से गुजरने के बाद संसद की मंजूरी भी लेनी होगी। रिपोर्टों के मुताबिक अंतिम कानूनी स्वरूप में यह स्पष्ट होगा कि रोक किन परिस्थितियों और किन संस्थानों पर लागू होगी।
फिरंगी महली ने धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के तहत लोगों को अपने धार्मिक परिधान पहनने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने मेलोनी से प्रस्ताव पर दोबारा विचार करने की अपील की और उम्मीद जताई कि यह प्रस्ताव इतालवी संसद में पारित नहीं होगा। इस प्रतिक्रिया के साथ इटली की घरेलू शिक्षा नीति पर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर बहस भी जुड़ गई है। वहीं इटली सरकार इस प्रस्ताव को स्कूलों में एकीकरण और चेहरा ढकने वाले परिधानों से जुड़े अपने नीतिगत दृष्टिकोण के तहत देख रही है।
बुर्का, नकाब और हिजाब में अंतर समझना जरूरी
इस पूरे विवाद में परिधानों के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। बुर्का आम तौर पर शरीर और चेहरे को ढकता है, जबकि नकाब चेहरे को ढकता है और आम तौर पर आंखों के आसपास का हिस्सा खुला रहता है। हिजाब मुख्य रूप से सिर और गर्दन को ढकता है, जबकि चेहरा खुला रहता है। मेलोनी के प्रस्ताव को लेकर Reuters, AP और अन्य रिपोर्टों में बुर्का और नकाब पर रोक का उल्लेख है। हालांकि ANSA की एक रिपोर्ट में हिजाब का भी उल्लेख आया है, इसलिए अंतिम सरकारी प्रस्ताव सामने आने तक इसके कानूनी दायरे को लेकर सावधानी जरूरी है।
विदेशी छात्रों की संख्या भी प्रस्ताव का हिस्सा
मेलोनी की घोषणा सिर्फ धार्मिक परिधान तक सीमित नहीं है। सरकार कक्षाओं में विदेशी छात्रों की संख्या के लिए कानूनी सीमा तय करने की तैयारी में है। साथ ही, जिन विदेशी छात्रों को स्कूल व्यवस्था में गंभीर एकीकरण संबंधी समस्या है, उनके अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखने की अनिवार्यता का प्रस्ताव भी है। इटली के स्कूलों में करीब 11.6 प्रतिशत छात्र गैर-नागरिक हैं। हालांकि प्रति कक्षा विदेशी छात्रों की नई प्रस्तावित अधिकतम सीमा अभी स्पष्ट नहीं की गई है। ANSA के मुताबिक इस प्रस्ताव पर इटली में राजनीतिक और शैक्षिक स्तर पर सवाल भी उठे हैं।
इटली में चेहरा ढकने को लेकर पहले से कानून
इटली में चेहरा ढकने वाले परिधानों को लेकर पहले से कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। 1975 के एक कानून में ऐसे हेलमेट या कपड़ों पर रोक है जिनसे पहचान मुश्किल हो, जबकि बाद के न्यायिक स्पष्टीकरणों में धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से चेहरे को ढकने की स्थिति में पहचान सत्यापन के समय चेहरा दिखाने की बात सामने आई है। इसी पृष्ठभूमि में मेलोनी सरकार का नया प्रस्ताव स्कूलों के लिए अलग नियम बनाने की दिशा में कदम माना जा रहा है। यूरोप के दूसरे देशों में भी चेहरा ढकने वाले परिधानों को लेकर अलग-अलग नियम हैं, लेकिन उनकी कानूनी व्यवस्था एक जैसी नहीं है।
मुद्दा इटली का, बहस भारत तक पहुंची
पूरे विवाद का अहम पहलू यह है कि प्रस्ताव इटली की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि भारत में AIMPLB के प्रतिनिधि ने इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है। बोर्ड के कार्यकारिणी सदस्य फिरंगी महली ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के नजरिए से देखा है। दूसरी ओर, मेलोनी सरकार इसे स्कूलों में एकीकरण, भाषा और सामाजिक-सांस्कृतिक समावेशन की अपनी नीति के हिस्से के तौर पर प्रस्तुत कर रही है।

