- कानपुर का चमड़ा, भदोही के कालीन और मुरादाबाद के हस्तशिल्प को 6-10% शुल्क से राहत, अक्टूबर अंत तक लागू होने की उम्मीद
भारत 19
नई दिल्ली। भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते यानी FTA को न्यूजीलैंड की संसद से मंजूरी मिलने के साथ उत्तर प्रदेश के निर्यात कारोबार के लिए न्यूजीलैंड का बाजार और खुलने जा रहा है। 16 सितंबर को न्यूजीलैंड की संसद ने भारत के साथ एफटीए को लागू करने वाला कानून 93-29 मतों से पारित किया। समझौते के अक्टूबर 2026 के अंत तक लागू होने की उम्मीद है। इसके लागू होने पर न्यूजीलैंड भारत के निर्यात को 100 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच देगा। उत्तर प्रदेश में कानपुर के चमड़े-फुटवियर, भदोही के कालीन और मुरादाबाद के हस्तशिल्प को इससे खास फायदा मिलने की संभावना है।
यूपी के तीन बड़े निर्यात क्लस्टर सीधे लाभ में
वाणिज्य मंत्रालय के राज्यवार आकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश के लेदर गुड्स, कालीन और हस्तशिल्प ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जहां न्यूजीलैंड के 6 से 10 प्रतिशत तक के शुल्क हटने से निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। कानपुर, भदोही और मुरादाबाद के एमएसएमई और कारीगर आधारित उद्योग इसके प्रमुख लाभार्थी माने गए हैं। शुल्क खत्म होने से भारतीय उत्पाद न्यूजीलैंड के बाजार में पहले की तुलना में कम लागत पर पहुंच सकेंगे। निर्यातक इस लाभ का इस्तेमाल कीमत घटाकर बाजार बढ़ाने या लागत बचत के जरिए मार्जिन सुधारने में कर सकते हैं।
कानपुर के चमड़े और फुटवियर को बड़ा बाजार
कानपुर के लिए चमड़ा और फुटवियर क्षेत्र इस समझौते के प्रमुख लाभार्थियों में है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने न्यूजीलैंड को करीब 8.52 मिलियन डॉलर के चमड़े और फुटवियर उत्पाद निर्यात किए। इनमें चमड़े के उत्पादों का निर्यात करीब 6.23 मिलियन डॉलर और फुटवियर का करीब 2.28 मिलियन डॉलर रहा। इन उत्पादों पर पहले अधिकतम करीब 10 प्रतिशत तक शुल्क था, जो एफटीए लागू होने के बाद शून्य हो जाएगा। कानपुर के तैयार चमड़े, जूते, सुरक्षा जूते, सैडलरी, बैग, बेल्ट, पर्स, वॉलेट और दूसरे चमड़े के सामान के लिए इससे कीमत प्रतिस्पर्धा बेहतर होने की संभावना है। न्यूजीलैंड का वैश्विक चमड़ा और फुटवियर आयात बाजार भारतीय निर्यातकों के मौजूदा कारोबार से काफी बड़ा है, इसलिए नए खरीदारों तक पहुंच बढ़ाने की गुंजाइश बनी है।
भदोही के कालीनों के लिए शुल्क बाधा खत्म
भदोही और मिर्जापुर के कालीन उद्योग के लिए भी न्यूजीलैंड बाजार में अवसर बढ़ सकते हैं। न्यूजीलैंड में कुछ कालीन और कपड़ा उत्पादों पर पहले 10 प्रतिशत तक शुल्क लगता था। एफटीए के बाद भारतीय निर्यातकों को इन उत्पादों पर शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। वस्त्र मंत्रालय ने भी कालीन, परिधान, होम टेक्सटाइल, हैंडलूम और हस्तशिल्प को न्यूजीलैंड में संभावनाशील क्षेत्रों में रखा है। भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में दुनिया को करीब 1.50 अरब डॉलर के कालीन निर्यात किए। भदोही-मिर्जापुर क्षेत्र देश के प्रमुख कालीन उत्पादन और निर्यात केंद्रों में है। शुल्क हटने से ऊन, जूट और मानव निर्मित फाइबर से बने कालीनों की कीमत प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सकती है।
मुरादाबाद के हस्तशिल्प को भी मिलेगा फायदा
मुरादाबाद का पीतल और धातु हस्तशिल्प उद्योग भी एफटीए के संभावित लाभार्थियों में है। सजावटी सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, टेबलवेयर और अन्य धातु हस्तशिल्प न्यूजीलैंड के बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। वाणिज्य मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प क्षेत्र को शुल्क कटौती से लाभ पाने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया है। छोटे और मध्यम निर्यातकों के लिए शुल्क में 6 से 10 प्रतिशत तक की बचत महत्वपूर्ण हो सकती है। इसका एक हिस्सा उत्पाद की कीमत कम करने और बाजार बढ़ाने में इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि कुछ हिस्सा निर्यातक की लागत और मार्जिन को बेहतर कर सकता है।
नोएडा से पश्चिमी यूपी तक खुलेंगे नए अवसर
एफटीए का लाभ केवल कानपुर, भदोही और मुरादाबाद तक सीमित नहीं रहेगा। नोएडा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के टेक्सटाइल, परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, रबर, इंजीनियरिंग और फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए भी न्यूजीलैंड का बाजार महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का न्यूजीलैंड को टेक्सटाइल और कपड़ा निर्यात करीब 103.14 मिलियन डॉलर, इंजीनियरिंग उत्पादों का 68.26 मिलियन डॉलर, फार्मास्यूटिकल्स का 57.52 मिलियन डॉलर और प्लास्टिक व रबर उत्पादों का 23.66 मिलियन डॉलर रहा। शुल्क खत्म होने से इन क्षेत्रों के निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर हो सकती है। न्यूजीलैंड का वैश्विक आयात बाजार भी इन क्षेत्रों में बड़ा है। इसलिए भारत के मौजूदा निर्यात के मुकाबले बाजार विस्तार की पर्याप्त गुंजाइश है।
न्यूजीलैंड से सस्ता कच्चा माल भी आएगा
एफटीए का फायदा सिर्फ तैयार माल के निर्यात तक सीमित नहीं है। भारत को विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले कुछ कच्चे माल पर भी शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। इनमें लकड़ी के लॉग, ऊन, कोकिंग कोल और धातुओं का स्क्रैप शामिल हैं। इसका भदोही जैसे कालीन क्लस्टर को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। न्यूजीलैंड से ऊन की खरीद की लागत कम होने पर ऊनी कालीन बनाने वाले उद्योगों के लिए कच्चे माल का खर्च घट सकता है। इसी तरह लकड़ी आधारित उद्योगों और धातु प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार को भी वैकल्पिक इनपुट स्रोत मिल सकते हैं।
किन देशों पर निर्भरता घटाने का विकल्प
खासकर ऊन, लकड़ी और कुछ औद्योगिक कच्चे माल के मामले में न्यूजीलैंड से खरीद बढ़ने पर भारतीय कंपनियों के पास आपूर्ति के अतिरिक्त विकल्प होंगे। इससे किसी एक देश पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया, चीन, यूरोप या अन्य मौजूदा आपूर्तिकर्ताओं से आयात खत्म हो जाएगा। न्यूजीलैंड की ओर से भारत को 100 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच मिल रही है, जबकि भारत ने न्यूजीलैंड की करीब 70.03 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर बाजार पहुंच दी है और करीब 29.97 प्रतिशत लाइनों को बाहर रखा है। डेयरी और कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को भारत ने संरक्षण दिया है।
न्यूजीलैंड के उत्पाद भी भारतीय बाजार में आएंगे
एफटीए एकतरफा बाजार खोलने का समझौता नहीं है। भारत ने न्यूजीलैंड के करीब 70 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर बाजार पहुंच दी है। इसके तहत न्यूजीलैंड से ऊन, लकड़ी, कोकिंग कोल और धातु स्क्रैप जैसे इनपुट का आयात बढ़ सकता है। इससे यूपी के कुछ उद्योगों को वैकल्पिक या कम लागत वाले कच्चे माल का फायदा मिल सकता है। दूसरी ओर जिन घरेलू उत्पादों से इन आयातों की सीधी प्रतिस्पर्धा होगी, उन पर दबाव भी बढ़ सकता है। भारत ने इसी वजह से डेयरी और कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को समझौते से बाहर रखा है।
यूपी को निर्यात और कच्चे माल दोनों तरफ फायदा
यूपी के लिए इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संभावित फायदा निर्यात बाजार और उत्पादन लागत, दोनों तरफ दिखाई देता है। वाणिज्य मंत्रालय के राज्यवार आकलन में भी उत्तर प्रदेश के लेदर गुड्स, कार्पेट और हैंडीक्राफ्ट को 6 से 10 प्रतिशत तक शुल्क हटने से लाभान्वित होने वाले प्रमुख क्षेत्र बताया गया है।
कानपुर-आगरा : चमड़ा, जूते, सैडलरी और लेदर उत्पाद।
भदोही-मिर्जापुर : कालीन, ऊनी उत्पाद और होम टेक्सटाइल।
मुरादाबाद : पीतल और धातु हस्तशिल्प।
नोएडा-पश्चिमी यूपी : टेक्सटाइल, परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, रबर, इंजीनियरिंग और फार्मा।
शुल्क हटने के बाद गुणवत्ता भी होगी निर्णायक
शुल्क खत्म होने से भारतीय उत्पादों को कीमत में फायदा मिलेगा, लेकिन वास्तविक निर्यात वृद्धि केवल टैरिफ हटने से तय नहीं होगी। यूपी के निर्यातकों को न्यूजीलैंड के खरीदारों, वितरण नेटवर्क, उत्पाद गुणवत्ता, पैकेजिंग और वहां लागू मानकों के अनुरूप आपूर्ति क्षमता भी विकसित करनी होगी। भारत और न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 1.3 अरब डॉलर रहा। एफटीए का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और विस्तार देना है। न्यूजीलैंड की संसद से कानून पारित होने के बाद अब समझौते के लागू होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसके लागू होने पर यूपी के प्रमुख निर्यात क्लस्टरों को न्यूजीलैंड के बाजार में पहले की तुलना में कम शुल्क बाधा का सामना करना पड़ेगा। कानपुर का चमड़ा, भदोही के कालीन और मुरादाबाद के हस्तशिल्प इसके प्रमुख लाभार्थी क्षेत्रों में रहेंगे।


