- स्टेल्थ एंटीना, मेटासर्फेस और बदलने वाली विद्युतचुंबकीय संरचनाओं पर देशभर के विशेषज्ञों ने किया मंथन; DRDO, रक्षा संस्थानों और उद्योग विशेषज्ञों ने साझा किए शोध और तकनीकी अनुभव
भारत 19
कानपुर। दुश्मन के रडार की नजर से लड़ाकू विमान को बचाना और जरूरत के मुताबिक उसकी विद्युतचुंबकीय पहचान बदलना—भविष्य की हवाई युद्ध तकनीक अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। आईआईटी कानपुर में हुई तीन दिवसीय कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने उन तकनीकों पर मंथन किया, जो विमानों की रडार पहचान घटाने के साथ उनकी संचार और सेंसर क्षमता को भी बेहतर बना सकती हैं। स्टेल्थ एंटीना, मेटासर्फेस, रडार क्रॉस-सेक्शन और री-कॉन्फिगरेबल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्ट्रक्चर्स चर्चा के केंद्र में रहे। आईआईटी कानपुर के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक कार्यशाला 18 से 20 सितंबर तक DRDO-Industry-Academia Centre of Excellence के तहत आयोजित हुई।
रडार पर विमान कितना दिखाई देता है, यही अहम सवाल
स्टेल्थ तकनीक का मूल उद्देश्य किसी हवाई प्लेटफॉर्म की रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) को कम करना है। RCS यह बताता है कि कोई वस्तु रडार को विद्युतचुंबकीय रूप से कितनी बड़ी या स्पष्ट दिखाई देती है। RCS कम होने पर रडार के लिए प्लेटफॉर्म का पता लगाना और उसे ट्रैक करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आईआईटी कानपुर की कार्यशाला में इसी से जुड़ी तकनीकों पर विशेष चर्चा हुई।
एंटीना भी बनेगा स्टेल्थ तकनीक की बड़ी कड़ी
लड़ाकू विमान में संचार और सेंसर के लिए एंटीना जरूरी होते हैं, लेकिन विमान की बाहरी सतह पर मौजूद विद्युतचुंबकीय संरचनाएं उसकी रडार दृश्यता को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए कार्यशाला का फोकस नेक्स्ट-जनरेशन स्टेल्थ एंटीना पर रहा। उद्देश्य ऐसे एंटीना और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डिजाइन विकसित करना है, जिन्हें रणनीतिक एयरबोर्न प्लेटफॉर्म की जरूरतों के अनुरूप इस्तेमाल किया जा सके।

जरूरत के हिसाब से बदल सकेंगे विद्युतचुंबकीय गुण
कार्यशाला के दूसरे प्रमुख विषयों में री-कॉन्फिगरेबल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्ट्रक्चर्स शामिल रहे। ऐसी संरचनाओं में विद्युतचुंबकीय प्रतिक्रिया को आवश्यकता के अनुसार बदला जा सकता है। इससे अलग-अलग परिस्थितियों में प्लेटफॉर्म के विद्युतचुंबकीय व्यवहार को नियंत्रित करने की संभावनाएं खुलती हैं। आईआईटी कानपुर में इस क्षेत्र से जुड़े शोध में सक्रिय और ट्यून किए जा सकने वाले विद्युतचुंबकीय ढांचों पर काम भी शामिल है।
मेटासर्फेस से तरंगों की दिशा और प्रतिक्रिया नियंत्रित
मेटासर्फेस बेहद पतली इंजीनियर्ड सतहें होती हैं, जिन्हें विद्युतचुंबकीय तरंगों के परावर्तन, अवशोषण या संचरण को नियंत्रित करने के लिए डिजाइन किया जा सकता है। स्टेल्थ और रडार काउंटरमेजर से जुड़े शोध में इन संरचनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। आईआईटी कानपुर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में मेटासर्फेस और फ्रीक्वेंसी सेलेक्टिव सरफेस से जुड़े कई शोध कार्य सूचीबद्ध हैं।
स्टेल्थ का मतलब सिर्फ विमान को छिपाना नहीं
भविष्य के एयरबोर्न प्लेटफॉर्म में चुनौती केवल रडार से कम दिखाई देना नहीं है। विमान को संचार, सेंसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के लिए भी प्रभावी रहना होता है। इसलिए स्टेल्थ एंटीना और विद्युतचुंबकीय संरचनाओं पर शोध में कम दृश्यता और उपयोगी इलेक्ट्रॉनिक क्षमता के बीच संतुलन महत्वपूर्ण विषय बनता है।
IIT कानपुर में पहले से चल रहा स्टेल्थ शोध
कार्यशाला किसी अलग-थलग पहल के बजाय आईआईटी कानपुर में चल रहे विद्युतचुंबकीय और माइक्रोवेव शोध की व्यापक कड़ी का हिस्सा है। विभाग की शोध सूची में रडार काउंटरमेजर, स्टेल्थ एप्लीकेशन के लिए रासॉर्बर और विमान के RCS को कम करने वाली संरचनाओं से जुड़े शोध दर्ज हैं। इनमें एयरक्राफ्ट RCS रिडक्शन और टाइम-मॉड्यूलेटेड फ्रीक्वेंसी सेलेक्टिव सरफेस जैसे विषय शामिल हैं।
DRDO और अकादमिक जगत को साथ लाने पर जोर
कार्यशाला का आयोजन आईआईटी कानपुर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग ने DRDO-Industry-Academia Centre of Excellence (DIA-CoE) के तहत किया। इसका उद्देश्य रक्षा जरूरतों, अकादमिक शोध और उद्योग की तकनीकी क्षमता के बीच सहयोग को बढ़ाना है। आईआईटी के आधिकारिक कार्यक्रम में प्रो. राघवेंद्र कुमार चौधरी और प्रो. कुमार वैभव श्रीवास्तव को कार्यशाला के समन्वयकों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। DRDO की डॉ. एन. रंजना ने भी शामिल हुई। DRDO के आधिकारिक दस्तावेजों में उन्हें Outstanding Scientist एवं Director, Directorate of Futuristic Technology Management (DFTM) के रूप में दर्ज किया गया है।
स्वदेशी तकनीक से भविष्य के एयरबोर्न सिस्टम पर नजर
कार्यशाला का व्यापक फोकस ऐसी तकनीकों पर रहा जिन्हें आगे रणनीतिक एयरबोर्न एप्लीकेशंस में विकसित किया जा सके। तीन दिन चले आयोजन ने स्टेल्थ एंटीना, RCS रिडक्शन, मेटासर्फेस और री-कॉन्फिगरेबल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्ट्रक्चर्स को एक साझा शोध एजेंडे के रूप में सामने रखा। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर किसी खास लड़ाकू विमान में इन तकनीकों के इस्तेमाल का दावा करना उचित नहीं होगा।

