- सर्दियों से पहले यूरोप के कम गैस भंडार बढ़ा रहे खरीदारी का दबाव, कतर की आपूर्ति में भारी गिरावट के बीच भारत और यूरोप की नजर उन्हीं स्पॉट कार्गो पर
यूरोप में सर्दी अभी दूर है, लेकिन गैस को लेकर बेचैनी बढ़ चुकी है। भंडार अपेक्षा से कम हैं, कतर से LNG आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित है और होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही पर संकट बना हुआ है। ऐसे में यूरोपीय खरीदारों की LNG डिमांड बढ़ती है तो उसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत पर भी पड़ सकता है। उसका कारण सीधा है कि जिस स्पॉट LNG कार्गो पर भारत की नजर है, उसी के लिए यूरोप ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हो सकता है। नतीजा यह कि भारत को या तो महंगी गैस खरीदनी पड़ेगी या ऊंची कीमत पर खरीद कम करनी पड़ सकती है।
यूरोप में कम हुआ गैस भंडार बढ़ाने की फिक्र
यूरोप के देश पहली बार LNG नहीं खरीद रहे लेकिन इस बार सर्दियों के करीब आने तक अपेक्षाकृत कम गैस भंडार और बाधित वैश्विक आपूर्ति उनके लिए संकट बन सकती है। फाइनेंसियल टाइम्स के अनुसार उत्तर-पश्चिम यूरोप में LNG की कीमत 22 डॉलर प्रति MMBtu (10 लाख ब्रिटिश थर्मल यूनिट) के ऊपर पहुंच गई है, जो जनवरी 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। एशियाई स्पॉट LNG बेंचमार्क भी 24 डॉलर प्रति MMBtu के आसपास पहुंच चुका है। रॉयटर्स के अनुसार, यूरोप के गैस भंडार इस वक्त सबसे निचले निचले स्तर पर हैं। दूसरी ओर, दुनिया के सबसे बड़े LNG आपूर्तिकर्ताओं में शामिल कतर का निर्यात छह महीने के संघर्ष में 96 प्रतिशत तक गिर गया है। कतर पहले वैश्विक दैनिक LNG आपूर्ति के करीब पांचवें हिस्से का बड़ा स्रोत था। यूरोपीय बाजार में इसलिए सिर्फ गैस की कीमत नहीं बढ़ी है, बल्कि सर्दियों से पहले पर्याप्त LNG जुटाने की डिमांड और चिंता के कारण उसमें उछाल आया है।
भारत की कीमत के लिए यूरोप से प्रतिद्वंदिता
LNG पाइपलाइन से बंधी हुई गैस नहीं है। जहाज से आने वाला कार्गो उस बाजार की ओर जा सकता है, जहां उसे बेहतर कीमत मिले। यहीं भारत की चुनौती शुरू होती है। भारत को अतिरिक्त गैस की जरूरत पड़ने पर स्पॉट मार्केट से LNG खरीदनी पड़ती है। यूरोप के खरीदार भी इसी बाजार में सक्रिय हैं। ऐसे में आपूर्ति सीमित होने और यूरोपीय खरीद तेज होने पर उपलब्ध कार्गो के लिए बोली बढ़ सकती है। इस प्रतिस्पर्धा का खतरा पहले से मौजूद है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी LNG जरूरतों के लिए कतर पर लगभग 45 प्रतिशत तक निर्भर रहा है। कतर की आपूर्ति में लंबे व्यवधान का असर इसलिए एशिया के बड़े खरीदारों पर पड़ना तय है।
कतर की कमी से बिगड़ा LNG का गणित
कतर से आने वाली LNG केवल एक देश की आपूर्ति का मामला नहीं है। उसकी कमी का असर पूरे वैश्विक व्यापार पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2026 में कतर और संयुक्त अरब अमीरात से LNG आपूर्ति में भारी गिरावट आई है। हालांकि अमेरिका, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों से बढ़ी आपूर्ति ने कुछ कमी पूरी की है, लेकिन एशिया और यूरोप में कीमतें 2025 की तुलना में काफी ऊपर बनी हुई हैं। अमेरिकी LNG निर्यात जरूर बढ़ा है, लेकिन उसकी अतिरिक्त खेप के लिए भी यूरोप और एशिया दोनों बड़े बाजार हैं। यानी एक तरफ कतर की कमी और दूसरी तरफ बढ़ती खरीद यही वैश्विक LNG बाजार को तंग बना रही है।
भारत में बढ़ सकते हैं CNG और PNG के दाम
महंगी LNG का मतलब यह नहीं कि अगले दिन CNG और PNG के दाम बढ़ जाएंगे। भारत की गैस मूल्य व्यवस्था में घरेलू गैस, दीर्घकालिक अनुबंध और नियामकीय ढांचा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी यदि ऊंची LNG कीमतें लंबे समय तक बनी रहीं तो भारत में इसका असर कई स्तरों पर दिख सकता है। मसलन CNG और PNG कंपनियों की खरीद लागत पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर तब, जब महंगी आयातित LNG का हिस्सा बढ़ाना पड़े। रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल, सिरेमिक, कांच और दूसरे गैस-आधारित उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। वहीं, IEA का मानना है कि ऊंची LNG कीमतों ने एशिया में बिजली क्षेत्र को गैस से कोयले की ओर झुकने के लिए प्रेरित किया है। प्राकृतिक गैस उर्वरक उत्पादन का अहम कच्चा माल है। कीमत बढ़ने पर कंपनियों की लागत के साथ सरकारी सब्सिडी पर भी दबाव बढ़ सकता है। IEA ने ऊंची गैस कीमतों को नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन पर असर डालने वाला कारक बताया है।
महंगाई से बचाव है सिर्फ खपत घटानाभारत महंगी LNG खरीदेगा या खरीद घटाएगा यही इस संकट का सबसे बड़ा सवाल है। भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाजार में LNG की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ने पर खरीदार स्पॉट कार्गो कम कर सकते हैं। लेकिन गैस खरीद कम करना हर जगह संभव नहीं है। उर्वरक, सिटी गैस और कई औद्योगिक क्षेत्रों में इसकी जरूरत बनी रहती है। इसलिए भारत के सामने विकल्प सीमित हैं। यानि जहां संभव हो खपत कम करे, वैकल्पिक ईंधन इस्तेमाल करे या जरूरत पड़ने पर महंगी LNG खरीदे।
असली परीक्षा यूरोप की सर्दी से पहले
फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी चिंता आने वाले महीनों की है। यूरोप के गैस भंडार अपेक्षाकृत कम हैं और वहां सर्दियों से पहले उन्हें भरने का दबाव बना हुआ है। फाइनेंसियल टाइम्स के अनुसार, कम स्टोरेज और होर्मुज के रास्ते LNG आपूर्ति में बाधा ने यूरोपीय बाजार को जनवरी 2023 के बाद सबसे ज्यादा तनावपूर्ण स्थिति में पहुंचा दिया है। यदि यूरोप की LNG डिमांड और बढ़ती है, तो भारत के सामने सिर्फ महंगी गैस की समस्या नहीं होगी। चुनौती यह भी होगी कि ऊंची कीमत के बावजूद जरूरी कार्गो उपलब्ध रहेंगे या नहीं।
