- दो जजों की राय अलग, दत्ता ने बड़ी पीठ को भेजने से इनकार किया तो शर्मा ने पांच जजों की संविधान पीठ को जरूरी माना; अब मामला CJI के समक्ष
भारत 19
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दो जजों की राय बंट गई। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने मुख्य सवाल था कि कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं। जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को रेफर करने की जरूरत नहीं मानी, जबकि जस्टिस शर्मा ने इसे संविधान पीठ के विचार योग्य माना। दोनों जजों ने मामले को आगे की प्रशासनिक दिशा के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने पर सहमति जताई।
विवाद के केंद्र में CJI को चयन समिति से हटाना
मामला Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है। इस कानून के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। 2023 के कानून में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति का सदस्य नहीं रखा गया। याचिकाकर्ताओं ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी है और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए हैं।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या व्यवस्था दी थी
इस विवाद की पृष्ठभूमि अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले से जुड़ी है। मार्च 2023 में पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि संसद द्वारा इस विषय पर कानून बनाए जाने तक CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति की सलाह पर की जाए। इसके बाद संसद ने 2023 में नया कानून बनाया, जिसमें CJI की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया।
दो जजों के बीच कहां हुआ मतभेद
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केंद्र की उस मांग को स्वीकार नहीं किया कि मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए। दूसरी ओर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने माना कि याचिकाओं में ऐसे संवैधानिक प्रश्न हैं, जिन पर बड़ी पीठ का विचार जरूरी है। इसी वजह से रेफरेंस के सवाल पर फैसला स्प्लिट वर्डिक्ट बन गया। जस्टिस दत्ता ने अपने आदेश में 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर भी टिप्पणियां कीं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने कहा कि आयोग का केवल स्वतंत्र दिखाई देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका वास्तव में स्वतंत्र होना भी जरूरी है।
केंद्र की दलील और याचिकाकर्ताओं की आपत्ति
केंद्र सरकार ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने की मांग की थी। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। उनकी प्रमुख आपत्ति चयन समिति की उस संरचना को लेकर है, जिसमें CJI की जगह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल यह अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है कि 2023 का कानून संवैधानिक है या असंवैधानिक। बुधवार का विभाजित फैसला मुख्य रूप से इस सवाल पर था कि चुनौती पर आगे सुनवाई किस स्तर की पीठ करे।
अब CJI के समक्ष जाएगा मामला
दोनों जजों की अलग राय के बाद मामला CJI के समक्ष प्रशासनिक पक्ष पर रखा जाएगा। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक पीठ ने उचित संख्या वाली संविधान पीठ गठित करने के लिए मामले को CJI के सामने रखने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य पहले किसी छोटी पीठ से केवल रेफरेंस के सवाल पर निर्णय कराने से होने वाली देरी से बचना भी है।
क्यों अहम है CEC नियुक्ति का यह मामला
मामले का सीधा संबंध मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से है। इसलिए आगे संविधान पीठ के समक्ष 2023 के कानून की वैधता, चयन समिति की संरचना और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवालों पर विचार होना है। फिलहाल 2023 का कानून लागू है और उसकी संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।


