- डोभाल ने बीजिंग में सीमा और जयशंकर ने मॉस्को में व्यापार के मुश्किल मुद्दे उठाए, शिखर सम्मेलन से पहले अलग-अलग कूटनीतिक ट्रैक पर दिखी तैयारी
भारत 19
नई दिल्ली। BRICS शिखर सम्मेलन से पहले भारत की कूटनीति दो अलग राजधानियों में सक्रिय रही। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बीजिंग में भारत-चीन सीमा से जुड़े सबसे संवेदनशील सवाल पर बातचीत की, जबकि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मॉस्को में भारत-रूस व्यापार और आर्थिक सहयोग की चुनौतियों पर चर्चा की। दोनों यात्राओं का औपचारिक एजेंडा अलग था, लेकिन समय एक बड़े बहुपक्षीय आयोजन से ठीक पहले का था। यहीं से एक कूटनीतिक पैटर्न उभरता है कि भारत अपने प्रमुख साझेदारों के साथ कठिन द्विपक्षीय मुद्दों को अलग-अलग चैनलों में आगे बढ़ाते हुए BRICS से पहले संवाद की जमीन तैयार कर रहा है। यह भारत सरकार की घोषित रणनीति नहीं, बल्कि दोनों दौरों के समय और एजेंडे से निकलने वाला कूटनीतिक विश्लेषण है।
बीजिंग में सीमा विवाद पर फिर सक्रिय हुआ संवाद
रॉयटर्स और भारत-चीन वार्ता से जुड़े आधिकारिक बयानों के अनुसार, अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच 25वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में सीमा विवाद, सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने सीमा प्रश्न पर बातचीत जारी रखने और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति व स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया। यह वार्ता ऐसे समय हुई है, जब सितंबर में भारत की मेजबानी में BRICS शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना भी जताई गई है। इसलिए बीजिंग की बैठक को सिर्फ नियमित सीमा वार्ता के रूप में नहीं, बल्कि संभावित उच्चस्तरीय संपर्क से पहले संवेदनशील मुद्दे पर संवाद बनाए रखने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
मॉस्को में व्यापार की कमजोर कड़ी पर बात
जयशंकर की मॉस्को यात्रा में भारत-रूस व्यापार, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग प्रमुख मुद्दों में रहे। रॉयटर्स और दोनों देशों के सार्वजनिक बयानों के मुताबिक, वार्ताओं में आर्थिक संबंधों को व्यापक बनाने के साथ व्यापार से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। भारत-रूस व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसके साथ भारत के लिए व्यापार असंतुलन और बाजार पहुंच की चुनौती भी सामने आई है। इसलिए भारत की प्राथमिकता केवल मौजूदा व्यापार को बढ़ाना नहीं, बल्कि निर्यात के नए अवसर और व्यापक बाजार पहुंच तलाशना भी है। यानि बीजिंग में भारत की प्राथमिकता सीमा और सुरक्षा थी, जबकि मॉस्को में फोकस व्यापार और आर्थिक संतुलन पर रहा।
पहले कठिन मुद्दे, फिर BRICS की बड़ी मेज
यहीं दोनों यात्राओं का साझा कूटनीतिक अर्थ सामने आता है। शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने अपने दो प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ रिश्तों की अलग-अलग कमजोर कड़ियों पर बातचीत की। चीन के साथ सीमा विवाद सबसे संवेदनशील मुद्दा है, जबकि रूस के साथ तेजी से बढ़ते व्यापार के बीच संतुलन और बाजार पहुंच अहम चुनौती है। इन मुद्दों का समाधान तत्काल होना संभव नहीं है, लेकिन इन्हें अलग द्विपक्षीय ट्रैक पर सक्रिय रखना शिखर सम्मेलन से पहले रिश्तों में संवाद की निरंतरता बनाए रख सकता है। इसी संदर्भ में इन यात्राओं को प्री-समिट डिप्लोमैसी के रूप में देखा जा सकता है। पहले द्विपक्षीय रिश्तों की कठिन फाइलों पर बातचीत, फिर बहुपक्षीय मंच पर व्यापक एजेंडे के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक जगह।
सितंबर में पता चलेगा कूटनीति का असर
भारत की BRICS अध्यक्षता और आगामी शिखर सम्मेलन के संदर्भ में इन यात्राओं का महत्व सिर्फ बीजिंग या मॉस्को तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि इन समानांतर वार्ताओं से भारत को शिखर सम्मेलन के दौरान चीन और रूस के साथ अधिक सहज राजनीतिक माहौल बनाने में कितनी मदद मिलती है। फिलहाल इतना जरूर साफ है कि डोभाल और जयशंकर की यात्राओं ने दो अलग समस्याओं को दो अलग कूटनीतिक ट्रैक पर सक्रिय रखा है। बीजिंग में सीमा की फाइल खुली, मॉस्को में व्यापार की चुनौती उठी और दोनों के बीच BRICS से पहले भारत की कूटनीतिक तैयारी की एक समान रेखा दिखाई दी।


