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आईआईटी कानपुर: सात दिन में दवा असर का अनुमान

  • अवसाद के मरीजों में ब्रेन और गट के संकेतों से इलाज की संभावित प्रतिक्रिया का शुरुआती अनुमान; सही दवा चुनने में समय घटने की उम्मीद

कानपुर। अवसाद के मरीजों में सही एंटीडिप्रेसेंट यानी अवसादरोधी दवा चुनने की प्रक्रिया अब अधिक सटीक हो सकती है। आईआईटी कानपुर और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के सहयोग से हुए एक अध्ययन में सामने आया है कि मरीज के मस्तिष्क और पेट से मिलने वाले गैर-आक्रामक विद्युत संकेतों को उसके चिकित्सीय लक्षणों के साथ मिलाकर इलाज की संभावित प्रतिक्रिया का शुरुआती अनुमान लगाया जा सकता है। अध्ययन में विकसित मॉडल का मकसद यह पहचानने में मदद करना है कि किन मरीजों में दी गई एंटीडिप्रेसेंट दवा से अपेक्षित लाभ मिलने की संभावना कम है। इससे डॉक्टरों को मरीज के लिए आगे की उपचार रणनीति तय करने में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है।

पहली दवा काम न करे तो बढ़ता है इलाज का समय

अवसाद के उपचार में पहली दी गई एंटीडिप्रेसेंट दवा हर मरीज पर समान असर नहीं करती। कई मरीजों में अपेक्षित सुधार नहीं होने पर डॉक्टर को उपचार की रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ता है। ऐसे में दवा के प्रति मरीज की संभावित प्रतिक्रिया का शुरुआती संकेत मिलना महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे भविष्य में ऐसे मरीजों की पहचान जल्दी करने में मदद मिल सकती है, जिनके लिए मौजूदा उपचार पर्याप्त प्रभावी नहीं रहने की संभावना है।

ब्रेन और गट के संकेतों पर आधारित शोध

शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि और पेट की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड किया। इसके साथ मरीजों में दिखाई देने वाले चिकित्सीय लक्षणों को भी अध्ययन में शामिल किया गया। मस्तिष्क की गतिविधि रिकॉर्ड करने के लिए ईईजी (Electroencephalography) और पेट की गतिविधि मापने के लिए ईजीजी (Electrogastrography) का इस्तेमाल किया गया। इन जैविक संकेतों और मरीज के लक्षणों को एक साथ देखकर उपचार की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने वाला मॉडल तैयार किया गया।

एक ही दवा का असर अलग क्यों

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि अलग-अलग मरीजों में अवसाद के लक्षण और उनके शरीर की जैविक गतिविधियां किस तरह अलग होती हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक मस्तिष्क और पेट की गतिविधियों में मौजूद ये अंतर यह समझने में मदद कर सकते हैं कि एक ही एंटीडिप्रेसेंट दवा अलग-अलग मरीजों पर अलग असर क्यों डालती है। इस जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में मरीज की जैविक स्थिति के अनुसार अधिक व्यक्तिगत उपचार रणनीति विकसित करने में किया जा सकता है।

डॉक्टरों को इलाज की दिशा तय करने में मदद

इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण संभावना यह है कि डॉक्टरों को उपचार के शुरुआती चरण में ही मरीज की संभावित प्रतिक्रिया के बारे में अतिरिक्त जानकारी मिल सके। अगर किसी मरीज में मौजूदा दवा से पर्याप्त लाभ मिलने की संभावना कम दिखाई देती है तो चिकित्सक उसके उपचार की आगे की रणनीति पर अधिक सूचित तरीके से विचार कर सकते हैं। इससे इलाज को मरीज की जरूरत के मुताबिक ढालने की दिशा में मदद मिल सकती है। हालांकि यह मॉडल डॉक्टर के निर्णय का विकल्प नहीं है। दवा जारी रखने, बदलने या उपचार में किसी अन्य बदलाव का फैसला मरीज की चिकित्सीय स्थिति के आधार पर चिकित्सक ही करेंगे।

अध्ययन में मॉडल ने दिखाई मजबूत क्षमता

अध्ययन में विकसित मॉडल ने उपचार से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने वाले मरीजों की पहचान करने में अच्छी क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं ने मॉडल को एक अलग मरीज समूह पर भी परखा, जहां इसकी भविष्यवाणी क्षमता का आकलन किया गया। इससे संकेत मिलता है कि ब्रेन और गट के विद्युत संकेतों तथा मरीज के चिकित्सीय लक्षणों को साथ लेकर बनाया गया मॉडल उपचार प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने में उपयोगी हो सकता है। हालांकि व्यापक क्लिनिकल इस्तेमाल से पहले इसे अलग-अलग मरीज समूहों और परिस्थितियों में और परखना जरूरी होगा।

206 मरीजों पर हुआ अध्ययन

आईआईटी कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े शोधकर्ताओं ने अवसाद के मरीजों पर यह अध्ययन किया। अध्ययन में ऐसे मरीज भी शामिल थे जिन्होंने इससे पहले अवसाद का उपचार नहीं कराया था। अध्ययन की कॉरस्पॉन्डिंग ऑथर आईआईटी कानपुर की सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रगति प्रियदर्शिनी बालासुब्रमणि हैं। पीएचडी शोधार्थी अमल जूड एश्विन फ्रांसिस अध्ययन के प्रथम लेखक हैं।

शोध को क्लीनिकल इस्तेमाल तक ले जाने की तैयारी

आईआईटी कानपुर के मुताबिक अध्ययन में विकसित तकनीकों को फिलहाल न्यूरोक्लिनिकल इनोवेटिव सॉल्यूशंस (NCIS) प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध कराया जा रहा है। इस ट्रांसलेशनल प्रोजेक्ट को बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) से वित्तीय सहयोग मिला है। अब शोध को प्रयोगशाला से वास्तविक क्लिनिकल इस्तेमाल तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

बड़े मरीज समूहों पर आगे परीक्षण जरूरी

इस तकनीक को व्यापक चिकित्सा इस्तेमाल में लाने से पहले बड़े और अधिक विविध मरीज समूहों पर आगे परीक्षण जरूरी होगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग आयु, लक्षण और चिकित्सीय परिस्थितियों वाले मरीजों में मॉडल कितना प्रभावी रहता है। अध्ययन क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया में पंजीकृत है और इसे आईआईटी कानपुर तथा जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की संस्थागत नैतिक समितियों से मंजूरी मिली है। अध्ययन के निष्कर्ष Frontiers in Psychiatry में प्रकाशित हुए हैं।

अवसाद के इलाज में व्यक्तिगत उपचार की उम्मीद

आईआईटी कानपुर और जीएसवीएम का यह अध्ययन अवसाद के इलाज को मरीज की जैविक स्थिति के मुताबिक तय करने की दिशा में नई संभावना दिखाता है। अभी दवा के असर का आकलन करने में समय लगने के कारण मरीज और डॉक्टर दोनों के लिए उपचार की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ब्रेन और गट से मिलने वाले संकेतों को मरीज के लक्षणों के साथ जोड़कर उपचार प्रतिक्रिया का शुरुआती अनुमान लगाने की यह तकनीक आगे सफल साबित होती है तो सही एंटीडिप्रेसेंट चुनने और उपचार रणनीति तय करने में मदद मिल सकती है।

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