– हिमाचल में नौ सितंबर तक 79.66 लाख पेटियां ही मंडियों में पहुंचीं, पिछले साल 1.46 करोड़ थीं; मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से उत्पादन प्रभावित, अब कश्मीर की आवक और आयात पर टिकी बाजार की नजर
भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। इस बार त्योहारों में सेब खरीदना जेब पर भारी पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने सेब की फसल को ऐसा झटका दिया कि मंडियों तक पहुंचने वाली आवक पिछले साल के मुकाबले करीब 45 प्रतिशत तक घट गई। नौ सितंबर तक राज्य में सिर्फ 79.66 लाख पेटियां बाजार पहुंचीं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 1.46 करोड़ पेटियां आ चुकी थीं। राज्य में इस बार कुल उत्पादन भी 1.25 करोड़ पेटियों से आगे नहीं बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में अक्टूबर-नवंबर के त्योहारों और उसके बाद शुरू होने वाले सहालग में घरेलू बाजार में सेब की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। अभी कीमतों में कितनी तेजी आएगी, यह तय नहीं है। जम्मू-कश्मीर से आने वाली फसल और आयात की रफ्तार आने वाले हफ्तों में बाजार की दिशा तय करेगी।
हिमाचल में 45 फीसदी तक कम पहुंची फसल
हिमाचल की शिमला-किन्नौर क्षेत्र की मंडियों में सात सितंबर तक सिर्फ 51.03 लाख पेटियां पहुंची थीं। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 93.71 लाख पेटियों का था। यानी इस बार करीब 42.68 लाख पेटियां कम पहुंची हैं। नौ सितंबर तक पूरे हिमाचल में आवक 79.66 लाख पेटियां रही, जबकि पिछले साल यह 1.46 करोड़ पेटियां थी। राज्य में इस साल कुल उत्पादन 1.25 करोड़ पेटियों से आगे नहीं बढ़ने का अनुमान है। बागवानों के मुताबिक मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने फसल को प्रभावित किया है। सीजन का बड़ा हिस्सा निकल जाने के बाद अब हिमाचल से आने वाली अतिरिक्त फसल इस कमी की पूरी भरपाई कर पाएगी, इसकी संभावना कम मानी जा रही है।
देश में सेब उत्पादन का आंकड़ा क्या कहता है
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में 2024-25 के दौरान 26.86 लाख टन सेब का उत्पादन हुआ था। इससे पहले 2023-24 में 26.26 लाख टन, 2022-23 में 28.76 लाख टन और 2021-22 में 25.89 लाख टन उत्पादन दर्ज किया गया था। यानी देश में सेब उत्पादन साल-दर-साल एक समान नहीं रहा है। इस बार हिमाचल की कमजोर आवक के बीच घरेलू बाजार को दूसरे उत्पादक राज्यों और आयात पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
केंद्र के अनुमान में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद
केंद्र के 2025-26 के दूसरे अग्रिम बागवानी अनुमान में देश के कुल फल उत्पादन में 3.25 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इसमें सेब का उत्पादन भी बढ़ने की संभावना जताई गई है। हालांकि ये अनुमान बाद में मौसम से हुए नुकसान को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर सकते। यही वजह है कि बाजार में वास्तविक उपलब्धता का आकलन केवल अग्रिम उत्पादन अनुमान से करना पर्याप्त नहीं होगा।
अब कश्मीर की फसल पर टिकी बाजार की उम्मीद
हिमाचल में कम आवक के बाद अब बाजार की निगाह जम्मू-कश्मीर के सेब उत्पादन और मंडियों तक पहुंचने वाली वास्तविक मात्रा पर है। 17 सितंबर को उपलब्ध सरकारी मंडी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर की एक रिपोर्टेड मंडी में सेब के भाव 50 से 64 रुपये प्रति किलो रहे। किस्म और गुणवत्ता के हिसाब से कीमतों में अंतर बना हुआ है। अगर कश्मीर से पर्याप्त मात्रा में सेब देश के दूसरे बाजारों तक पहुंचता है तो हिमाचल की कमी का असर कुछ हद तक सीमित हो सकता है। लेकिन कश्मीर की आवक भी कमजोर रही तो घरेलू बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है।
आयात बढ़ा तो कीमतों को मिल सकती है राहत
घरेलू उत्पादन में कमी की स्थिति में आयात बाजार को कुछ राहत दे सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत ने 2024-25 में करीब 5.11 लाख टन ताजा सेब का आयात किया था। 2023-24 में आयात 5.44 लाख टन और 2022-23 में करीब 3.60 लाख टन रहा था। भारत को सेब की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में ईरान, तुर्किये, अफगानिस्तान, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, चिली और अमेरिका शामिल हैं। ऐसे में घरेलू फसल की कमी बढ़ने पर आने वाले महीनों में आयात की मात्रा बढ़ सकती है। हालांकि इसका असर विदेशी सेब की कीमत, समुद्री मालभाड़े, आयात की गति और घरेलू मांग पर निर्भर करेगा।
त्योहार और सहालग में क्यों बढ़ेगी मांग
अक्टूबर-नवंबर में नवरात्र, दशहरा और दीपावली के बाद सहालग का मौसम शुरू होता है। इस दौरान फलों की मांग बढ़ती है। इसी अवधि में घरेलू सेब की नई फसल का बड़ा हिस्सा बाजार में आता है। इस बार हिमाचल से शुरुआती आवक कमजोर रहने के कारण बाजार में आपूर्ति का आधार पहले से कमजोर है। ऐसे में यदि कश्मीर से पर्याप्त फसल नहीं आती और आयात भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ता तो त्योहार और सहालग के दौरान खासकर अच्छी गुणवत्ता वाले सेब के खुदरा भाव में तेजी देखने को मिल सकती है।
प्रीमियम सेब पर सबसे पहले बढ़ सकता है दबाव
सेब की सभी किस्मों और ग्रेड पर एक जैसा असर पड़ना जरूरी नहीं है। बाजार में प्रीमियम और अच्छी गुणवत्ता वाले सेब की कीमत पर आपूर्ति की कमी का असर पहले पड़ सकता है। वहीं सामान्य ग्रेड के सेब की कीमतों को कश्मीर से आने वाली फसल और आयात कुछ हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। इसलिए आने वाले दिनों में सिर्फ औसत कीमत के बजाय अलग-अलग ग्रेड के भाव पर नजर रखना जरूरी होगा।
सरकार की आयात नीति भी कीमत तय करेगी
सरकार ने घरेलू उत्पादकों को सस्ते आयात से बचाने के लिए सेब के आयात पर न्यूनतम मूल्य की व्यवस्था की है। दूसरी तरफ घरेलू बाजार में कीमतें बहुत बढ़ने की स्थिति में आयातक विदेशी सेब मंगाकर आपूर्ति बढ़ा सकते हैं। यानी आयात बाजार में दो तरह की भूमिका निभा सकता है, एक ओर घरेलू उत्पादकों को अत्यधिक सस्ते आयात से सुरक्षा, दूसरी ओर घरेलू आपूर्ति घटने पर बाजार में अतिरिक्त सेब उपलब्ध कराने का विकल्प।
सेब की कीमतों का नया समीकरण क्या होगा
इस बार सेब के बाजार को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कारक होंगे, हिमाचल की कम फसल, जम्मू-कश्मीर की वास्तविक आवक और आयात की गति। हिमाचल में सितंबर तक आवक करीब 45 प्रतिशत कम है। अब अगर कश्मीर की फसल पर्याप्त मात्रा में बाजार में पहुंचती है और आयात भी बढ़ता है तो कीमतों में तेजी सीमित रह सकती है। इसके उलट दोनों स्रोतों से आपूर्ति कमजोर रही तो त्योहार और सहालग में सेब महंगा होने का दबाव बढ़ेगा।
त्योहार से पहले सेब बाजार की तस्वीर
हिमाचल : आवक करीब 45 प्रतिशत तक कम।
9 सितंबर तक आवक : 79.66 लाख पेटियां।
पिछले साल समान अवधि : 1.46 करोड़ पेटियां।
हिमाचल का अनुमानित कुल उत्पादन : 1.25 करोड़ पेटियों से अधिक नहीं।
कश्मीर मंडी भाव : 17 सितंबर को उपलब्ध आंकड़ों में 50 से 64 रुपये प्रति किलो।
2024-25 देश का उत्पादन : 26.86 लाख टन।
2024-25 सेब आयात : करीब 5.11 लाख टन।
कीमत तय करने वाले प्रमुख कारक : हिमाचल की आवक, कश्मीर की फसल और आयात की गति।


