- यूपीयूएमएस सैफई में डिजिटल जीवनशैली और मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय सम्मेलन, विशेषज्ञों ने तनाव, डिजिटल निर्भरता और कार्य-जीवन असंतुलन से बचने के लिए आत्म-अनुशासन और मानवीय जुड़ाव पर जोर दिया
भारत 19/ इटावा। मोबाइल और इंटरनेट ने जिंदगी को आसान जरूर किया है, लेकिन हर वक्त ऑनलाइन रहने की आदत अब मानसिक सेहत के लिए नई चुनौती बन रही है। डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर होना संभव नहीं है, ऐसे में तकनीक के इस्तेमाल और वास्तविक जीवन के रिश्तों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, इस पर उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (UPUMS), सैफई में विशेषज्ञों ने मंथन किया। विश्वविद्यालय के नर्सिंग संकाय के मानसिक स्वास्थ्य नर्सिंग विभाग की ओर से गुरुवार को ‘डिजिटल माइंड्स, हेल्दी लाइव्स : बिल्डिंग रेजिलिएंस, बैलेंस एंड ह्यूमन कनेक्शन इन द डिजिटल एरा’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन-2026 आयोजित किया गया। सम्मेलन का उद्घाटन कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय सिंह ने किया।
तकनीक सुविधा बने, मानसिक दबाव का कारण नहीं
कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय सिंह ने कहा कि डिजिटल तकनीक ने शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और कामकाज को काफी आसान बनाया है। लेकिन इसके असंतुलित इस्तेमाल से मानसिक स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियां उभर रही हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और व्यावसायिक प्रभावों को समझना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए हो, लेकिन वह व्यक्ति के व्यवहार, रिश्तों और मानसिक संतुलन पर हावी न हो।
फोमो से जोमो तक, बदल रही नई पीढ़ी की सोच
सम्मेलन में नई पीढ़ी की डिजिटल आदतों और बदलती सोच पर भी चर्चा हुई। जेनरेशन-जेड की सोच, फोमो से जोमो की ओर बदलाव, डिजिटल पालन-पोषण, तनाव से संतुलन, डिजिटल विषहरण और संज्ञानात्मक पुनर्गठन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। चर्चा में इस बात पर जोर रहा कि लगातार ऑनलाइन रहने, सोशल मीडिया की तुलना और डिजिटल दुनिया में बने रहने के दबाव का असर नई पीढ़ी के व्यवहार और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है।
डिजिटल दुनिया के बीच रिश्तों को बचाना जरूरी
संकायाध्यक्ष प्रो. बिजी बीजू ने कहा कि डिजिटल दौर में मानसिक रूप से स्वस्थ और भावनात्मक रूप से संतुलित रहना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी सामाजिक संवेदनशीलता बनाए रखना भी है। उन्होंने जागरूकता और आत्म-अनुशासन के साथ परिवार, दोस्तों और समाज से मानवीय जुड़ाव मजबूत रखने पर जोर दिया। विशेषज्ञों का कहना था कि डिजिटल तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि उसके संतुलित इस्तेमाल की आदत जरूरी है।
काम के दबाव के बीच मानसिक सेहत पर जोर
सम्मेलन में डिजिटल कल्याण, मानसिक लचीलापन, कार्य-जीवन संतुलन और सार्थक मानवीय जुड़ाव से जुड़े शोध और अनुभव साझा किए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि डिजिटल जीवनशैली से पैदा होने वाली चुनौतियों को समझने के लिए मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा। सम्मेलन में प्रो. (डॉ.) एम.एस. विंसी, प्रिंसिपल, बॉम्बे हॉस्पिटल कॉलेज ऑफ नर्सिंग, इंदौर; डॉ. सुशील कुमार माहेश्वरी, एचओडी एवं एसोसिएट प्रोफेसर, मनोचिकित्सीय नर्सिंग विभाग, आईएचबीएएस; दिनेश शर्मा, प्रिंसिपल, स्कूल ऑफ नर्सिंग, गीतांजलि यूनिवर्सिटी, उदयपुर; अतुल शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, एम्स बठिंडा और डॉ. सुधा मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर, केजीएमयू ने सहभागिता की।
नर्सिंग विद्यार्थियों और स्वास्थ्यकर्मियों के तनाव पर चर्चा
पैनल चर्चा में प्रो. डॉ. ज्योति वाला, श्री सेवियनएन, डॉ. अर्चना चौहान, डॉ. सुभाष गुप्ता, डॉ. सुशील और डेमोन्सट्रेटर सुश्री नीलम शाह शामिल हुए। डॉ. संदीप आर्या ने चर्चा का संचालन किया। इस दौरान नर्सिंग विद्यार्थियों और स्वास्थ्यकर्मियों के तनाव प्रबंधन, आत्म-देखभाल और भावनात्मक मजबूती से जुड़े पहलुओं पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने काम के दबाव के बीच खुद की मानसिक सेहत का ध्यान रखने को जरूरी बताया।
शोध और अनुभव साझा करने का मंच बना सम्मेलन
राष्ट्रीय सम्मेलन में मानसिक स्वास्थ्य नर्सिंग और डिजिटल कल्याण से जुड़े शोध और अनुभव साझा किए गए। चर्चा का मुख्य संदेश यही रहा कि तकनीक जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है, लेकिन इसके साथ मानसिक स्वास्थ्य और मानवीय रिश्तों को भी बराबर महत्व देना होगा। कार्यक्रम के आयोजन में प्रति-कुलपति प्रो. डॉ. आदेश कुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. एसपी सिंह और चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. अमित सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस अवसर पर प्रॉक्टर डॉ. विजय मिश्रा, मुख्य नर्सिंग अधिकारी लवली जेम्स समेत संकाय सदस्य और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।


