- 20 से 70 मीटर/सेकंड की हवा में फेदर और नायलॉन शटल की जांच; ऑटो रोटेशन, लचीली स्कर्ट और वायु प्रतिरोध के बीच संबंध ने खोला उड़ान का अहम रहस्य
भारत 19
कानपुर। बैडमिंटन कोर्ट पर रैकेट से निकलते ही शटल तेजी से हवा चीरता है, फिर अपनी दिशा बदलता हुआ कुछ ही पलों में लगभग सीधा नीचे आ गिरता है। देखने में यह महज खेल का एक साधारण उपकरण लगता है, लेकिन उसकी इस खास उड़ान के पीछे हवा, घूमने की गति और शटल की लचीली स्कर्ट के बीच लगातार बदलता संतुलन काम करता है। IIT कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. संजय मित्तल और बीटेक-एमटेक छात्र मुकुल कुमार कंसारा ने अपने शोध में इसी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की है। शोधकर्ताओं ने फेदर और सिंथेटिक नायलॉन शटल को 20 से 70 मीटर/सेकंड की हवा में विंड टनल के भीतर परखा। खास तौर पर यह देखा गया कि शटल के खुद घूमने यानी ऑटो रोटेशन से उसकी स्कर्ट का आकार, वायु प्रतिरोध और संरचनात्मक स्थिरता किस तरह बदलती है।
शटल का खुद घूमना ही बना अहम कड़ी
शटल की उड़ान को समझने के लिए सबसे पहले उसके ऑटो रोटेशन को समझना होगा। हवा के प्रवाह में शटल की स्कर्ट खुद घूमने लगती है। हवा की गति बढ़ने पर उसकी घूमने की गति भी बढ़ती है। लेकिन यह घूमना सिर्फ शटल की गति का हिस्सा नहीं है। स्कर्ट के घूमने से उसका आकार बदलता है और आकार बदलने के साथ उस पर लगने वाला एयरो डायनामिक ड्रैग भी प्रभावित होता है। यानी शटल हवा में सिर्फ घूम नहीं रहा होता, बल्कि उसका घूमना और हवा का दबाव एक-दूसरे को लगातार प्रभावित कर रहे होते हैं।
लचीली स्कर्ट हवा के साथ बदलती है
शटल का पिछला हिस्सा पूरी तरह कठोर नहीं होता। खासकर नायलॉन शटल की स्कर्ट हवा के दबाव में फैल और सिकुड़ सकती है। यही बदलाव उसके वायु गतिकीय व्यवहार को प्रभावित करता है। इसे आसान भाषा में समझें तो हवा शटल को बदलती है और बदला हुआ शटल फिर हवा के साथ अपने व्यवहार को बदल देता है। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में इसी तरह की प्रक्रिया को फ्लूड-स्टक्चर इंटरैक्शन के नजरिए से देखा जाता है।
नायलॉन शटल में तेज हवा पर आती है बकलिंग
शोध में फेदर और नायलॉन दोनों तरह के शटल को अलग-अलग वायु गति पर जांचा गया। नायलॉन शटल की स्कर्ट फेदर शटल की तुलना में अधिक लचीली पाई गई और तेज हवा में उसमें ज्यादा संरचनात्मक विकृति देखी गई। एक निश्चित गति के बाद स्कर्ट में बकलिंग यानी अचानक अस्थिर होकर मुड़ने की स्थिति पैदा हो सकती है। यही वह अवस्था है जहां शटल की संरचना और उसके एयरोडायनामिक व्यवहार के बीच संबंध और स्पष्ट दिखाई देता है।
ऑटो रोटेशन ने बकलिंग का व्यवहार बदला
शोध का दिलचस्प हिस्सा यही है। जब नायलॉन शटल घूम रहा होता है तो उसकी स्कर्ट का व्यवहार बदल जाता है। अध्ययन के अनुसार ऑटो रोटेशन से ड्रैग बढ़ सकता है और स्कर्ट की बकलिंग खत्म हो सकती है या अधिक वायु गति तक टल सकती है। इसका मतलब यह है कि शटल का घूमना केवल उसे स्थिर दिखाने वाली कोई अलग घटना नहीं है। उसकी स्कर्ट की संरचनात्मक स्थिरता और हवा के साथ होने वाली प्रतिक्रिया में भी इसकी भूमिका है।
फेदर और नायलॉन शटल में क्यों दिखा अंतर
शोध में बिना ऑटो रोटेशन और ऑटो रोटेशन दोनों परिस्थितियों में शटल के व्यवहार को देखा गया। बढ़ती हवा की गति के साथ स्कर्ट का क्रॉस-सेक्शन और ड्रैग किस तरह बदलते हैं, इसका अध्ययन किया गया। ऑटो रोटेशन की स्थिति में कम गति पर ड्रैग में अलग व्यवहार दिखाई दिया, जबकि अधिक गति पर ड्रैग कॉएफिशिएंट और स्कर्ट का क्रॉस-सेक्शन बढ़ने की स्थिति सामने आई। इससे पता चलता है कि शटल की उड़ान केवल उसके बाहरी आकार से तय नहीं होती।
बैडमिंटन के शटल में एयरोस्पेस का विज्ञान
बैडमिंटन कोर्ट पर कुछ सेकंड में पूरी होने वाली शटल की उड़ान वास्तव में कई भौतिक प्रक्रियाओं का मेल है। हवा की गति, स्कर्ट का लचीलापन, ऑटो रोटेशन, संरचनात्मक विकृति और वायु प्रतिरोध एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। IIT कानपुर का यह अध्ययन इसी संबंध को प्रयोगों के जरिए समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि सिंथेटिक नायलॉन शटल के डिजाइन में किस तरह बदलाव किए जाएं, ताकि उसका उड़ान व्यवहार फेदर शटल के ज्यादा करीब लाया जा सके।
साधारण दिखने वाले शटल के पीछे जटिल विज्ञान
शटल की खासियत यह नहीं कि वह सिर्फ हवा में उड़ता है। उसकी खासियत यह है कि उसकी संरचना और हवा के बीच लगातार प्रतिक्रिया होती रहती है और उसी दौरान वह खुद घूमता भी है। यही वजह है कि बैडमिंटन का यह छोटा-सा उपकरण एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के लिए अध्ययन का दिलचस्प विषय बन जाता है। रैकेट से निकलने के बाद दिखाई देने वाली उसकी स्थिर उड़ान के पीछे हवा और संरचना के बीच चल रहा बेहद सूक्ष्म संतुलन काम करता है।


