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शी का समर्थन, ईरान बोला- अमेरिका माने तो खुलेगा होर्मुज

  • पेजेश्कियान ने शी जिनपिंग के बातचीत और कूटनीति वाले रुख का स्वागत किया; अराघची बोले- दबाव में संप्रभु अधिकारों से समझौता नहीं, अमेरिका शर्तें माने तो सात दिन में होर्मुज खुल सकता है

भारत 19 डेस्क

अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच कूटनीतिक रास्ता तलाशने की कोशिश तेज होती दिख रही है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस रुख का स्वागत किया है, जिसमें अमेरिका और ईरान को बातचीत और कूटनीति के जरिए मतभेद सुलझाने तथा जून में हुए इस्लामाबाद समझौते (MoU) की ओर लौटने की अपील की गई है। इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के सामने सात दिन का ठोस रोडमैप रखा है। उनके मुताबिक जरूरी शर्तें पूरी होने पर सातवें दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल की जा सकती है। Reuters के अनुसार अराघची ने साफ कहा कि अब फैसला अमेरिका को करना है।

शी के रुख का पेजेश्कियान ने किया स्वागत

पेजेश्कियान ने शी जिनपिंग के उस रुख की सराहना की है, जिसमें अमेरिकी और ईरानी पक्ष से बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने और इस्लामाबाद समझौते की ओर लौटने की बात कही गई है। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि तेहरान भी इस दृष्टिकोण को साझा करता है और पहले से किए गए समझौतों का सम्मान करते हुए गंभीर, ठोस और परिणामोन्मुख बातचीत की परिस्थितियां बनाने के पक्ष में है। पेजेश्कियान का यह बयान उनके कार्यालय की ओर से जारी संदेश में सामने आया। ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि तेहरान और बीजिंग राष्ट्रीय संप्रभुता के सम्मान, तनाव कम करने तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को लेकर समान दृष्टिकोण रखते हैं।

शी ने अमेरिका-ईरान को फिर बातचीत की राह सुझाई

शी जिनपिंग ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ बातचीत में अमेरिका और ईरान से जून में हुए इस्लामाबाद समझौते की ओर लौटने तथा कूटनीतिक बातचीत फिर शुरू करने की अपील की। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, बीजिंग का मानना है कि बल प्रयोग के बजाय संवाद और बातचीत से मतभेद सुलझाना ही स्थायी समाधान का रास्ता है। इससे पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी ईरान के विदेश मंत्री अराघची के साथ बातचीत में दोनों पक्षों से संयम बरतने और जून के समझौते की रूपरेखा पर लौटने की अपील की थी। Reuters के अनुसार चीन ने होर्मुज को फिर से खोलने को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बताया है।

ईरान ने कहा- दबाव में संप्रभु अधिकार नहीं छोड़ेंगे

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को यह संदेश भी दिया है कि दबाव या धमकी के बीच तेहरान अपने संप्रभु अधिकारों से समझौता नहीं करेगा। ईरानी पक्ष एक ओर बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य दबाव और प्रतिबंधों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है। राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि ईरान बातचीत और कूटनीति के लिए तैयार है, लेकिन दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध समाप्त करने के तौर-तरीकों पर अभी भी काफी दूरी बनी हुई है।

सात दिन में कैसे खुलेगा होर्मुज

अराघची के मुताबिक ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका को सात दिन का ठोस प्लान भेजा है। इस योजना के तहत यदि अमेरिका आवश्यक शर्तें स्वीकार करता है तो सात दिन की समयसीमा शुरू होगी और सातवें दिन होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल की जा सकती है। Reuters के अनुसार अराघची ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में पत्रकारों से कहा कि जरूरी शर्तें पूरी होने पर जलडमरूमध्य को फिर से खोला जा सकता है और सामान्य समुद्री मार्ग बहाल किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि योजना में ईरान की नई मांगें नहीं हैं, बल्कि ये वही मुद्दे हैं जिन पर जून में समझ बनी थी।

ईरान की योजना में अमेरिका से क्या शर्तें

ताजा रिपोर्टों के मुताबिक ईरान की सात दिन की योजना केवल होर्मुज खोलने तक सीमित नहीं है। Al Jazeera और Euronews/AP के अनुसार, प्रस्ताव में सैन्य कार्रवाई रोकना, ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में राहत और कुछ जमी हुई ईरानी परिसंपत्तियों को जारी करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। योजना में इसके बाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत फिर शुरू करने की बात भी शामिल है। यानी होर्मुज को खोलना व्यापक युद्धविराम और राजनीतिक बातचीत की प्रक्रिया से जोड़ा गया है।

‘अब फैसला अमेरिका को करना है’

अराघची ने प्रस्ताव की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से अमेरिका पर डालते हुए कहा कि “चुनाव अब अमेरिका को करना है।” उनका कहना है कि यदि वाशिंगटन आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार होता है तो ईरान सात दिन की प्रक्रिया के तहत होर्मुज में सामान्य आवाजाही बहाल कर सकता है। Reuters के मुताबिक, अराघची ने कहा कि प्रस्ताव में जिन अमेरिकी कदमों की बात की गई है, वे नए नहीं हैं और जून के समझौते में पहले से शामिल थे।

जून का समझौता क्यों टूट गया था

अमेरिका और ईरान के बीच जून में पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से एक समझ बनी थी। इसका उद्देश्य सैन्य टकराव रोकना और आगे व्यापक बातचीत के लिए रास्ता तैयार करना था। लेकिन कुछ ही सप्ताह में दोनों पक्षों के बीच समझौते की शर्तों को लेकर विवाद बढ़ गया। Al Jazeera के अनुसार, जून के समझौते में बातचीत के लिए 60 दिनों की रूपरेखा थी, लेकिन होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और नियंत्रण को लेकर मतभेद सामने आए। इसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर समझौते से पीछे हटने के आरोप लगाए और जुलाई में व्यवस्था टूट गई।

परमाणु मुद्दे पर भी बातचीत की गुंजाइश

ईरान ने परमाणु मुद्दे पर बातचीत का दरवाजा भी पूरी तरह बंद नहीं किया है। RFE/RL के अनुसार, पेजेश्कियान ने 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम के भंडार को कम करने और अंतरराष्ट्रीय सत्यापन की अनुमति देने की इच्छा जताई है। साथ ही तेहरान जून के समझौते की ओर लौटने की मांग कर रहा है। ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार हासिल नहीं करना चाहता। वहीं अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अलग सुरक्षा चिंताएं व्यक्त करता रहा है।

होर्मुज खुलने से दुनिया को क्या फायदा

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां लंबे समय से जारी व्यवधान का असर तेल और गैस की आपूर्ति, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ रहा है। ईरान की ओर से सात दिन में होर्मुज खोलने के प्रस्ताव की खबर सामने आने के बाद तेल बाजार में भी प्रतिक्रिया दिखाई दी। Barron’s के मुताबिक, प्रस्ताव की खबरों के बाद ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे चला गया था।

अमेरिका के जवाब पर टिकी आगे की बातचीत

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका ईरान के सात दिन के प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है। ईरान का कहना है कि यदि वाशिंगटन शर्तें स्वीकार करता है तो प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। वहीं अमेरिकी प्रशासन की ओर से मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी रहने के संकेत मिले हैं, लेकिन प्रस्ताव को स्वीकार करने की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। शी जिनपिंग का बातचीत और जून के समझौते की ओर लौटने का समर्थन और पेजेश्कियान का उसका स्वागत यह दिखाता है कि बीजिंग-तेहरान के बीच कूटनीतिक समन्वय बना हुआ है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता तय हो गया है।

अब तीन मुद्दों पर टिकी दुनिया की नजर

आगे की स्थिति मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर निर्भर करेगी, अमेरिका की सैन्य नीति, होर्मुज में समुद्री आवाजाही और परमाणु वार्ता। ईरान ने कूटनीति का रास्ता खुला रखने के साथ अपनी संप्रभुता और परमाणु अधिकारों पर समझौता नहीं करने की स्थिति दोहराई है। वहीं, शी जिनपिंग के कूटनीतिक रुख को पेजेश्कियान का समर्थन मिलने से चीन भी इस संकट में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पक्ष के रूप में सामने आया है। सात दिन का प्रस्ताव वास्तव में लागू होता है या बातचीत एक बार फिर गतिरोध में फंसती है, अब इसका अगला संकेत वाशिंगटन की प्रतिक्रिया से मिलेगा।

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