- चुनाव आयोग ने पुराने नाम ‘All India Trinamool Congress’ और ‘Flowers & Grass’ चिन्ह पर लगाई अंतरिम रोक, ममता गुट को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ और फुटबॉल खिलाड़ी का चिन्ह, बागी गुट को अलग पहचान
भारत 19
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस की पहचान को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। चुनाव आयोग ने पार्टी के भीतर दो प्रतिद्वंद्वी गुट सामने आने के बाद ‘All India Trinamool Congress’ नाम और उसके ‘Flowers & Grass’ यानी जोड़ा फूल चिन्ह के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को नया नाम ‘Mamata All India Trinamool Congress’ और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है। वहीं अरूप राय के नेतृत्व वाले गुट को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और लिफाफा चिन्ह मिला है। यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए है, जबकि पार्टी के मूल नाम और स्थायी चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
दोनों गुट अब पुराने नाम-निशान से चुनाव नहीं लड़ेंगे
17 सितंबर के अपने अंतरिम आदेश में चुनाव आयोग ने कहा कि उसके सामने All India Trinamool Congress के दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं—एक ममता बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरा अरूप राय के नेतृत्व में। दोनों ही खुद को पार्टी बताते हैं। आयोग ने कहा कि विवाद का अंतिम निपटारा समय लेने वाला है और आगामी उपचुनाव सामने हैं, इसलिए दोनों पक्षों को बराबर स्थिति में रखने के लिए अंतरिम व्यवस्था जरूरी है। आयोग ने दोनों गुटों को निर्देश दिया कि वे उपचुनाव के लिए तीन-तीन वैकल्पिक नाम और उपलब्ध चुनाव चिह्नों में से अपनी पसंद बताएं। इसके आधार पर अलग पहचान दी गई।
ममता गुट को मिला नया नाम और फुटबॉल खिलाड़ी चिन्ह
18 सितंबर को आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम दिया और Football Player चुनाव चिह्न आवंटित किया। यानी ममता खेमे के उम्मीदवार आगामी उपचुनावों में पुराने जोड़ाफूल निशान पर नहीं लड़ेंगे। यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद से जोड़ाफूल का चिन्ह ममता बनर्जी और पार्टी की चुनावी पहचान से गहराई से जुड़ा रहा है।
बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’
अरूप राय के नेतृत्व वाले गुट को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और Envelope यानी लिफाफा चुनाव चिह्न दिया गया है। इस गुट के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी जुड़े हैं। यानी आगामी उपचुनावों में मतपत्र या ईवीएम पर पुराने All India Trinamool Congress नाम और जोड़ाफूल की जगह दोनों गुट अलग पहचान के साथ सामने होंगे।
यह फैसला स्थायी नहीं, अभी अंतरिम व्यवस्था है
यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु है। चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी से स्थायी तौर पर TMC का नाम और चिन्ह छीनने का अंतिम फैसला नहीं दिया है। 17 सितंबर का आदेश वर्तमान उपचुनावों को ध्यान में रखकर अंतरिम है। आयोग ने स्पष्ट किया कि पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण और नाम-चिन्ह के विवाद पर अंतिम निर्णय बाद में चुनाव चिह्न आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत किया जाएगा। इसलिए खबर में इसे ‘स्थायी रूप से नाम-चिन्ह छिन गया’ लिखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
6 अक्टूबर के उपचुनावों ने बढ़ाई आयोग की चुनौती
यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेगीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं। दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों ने वहां उम्मीदवार उतारने की तैयारी की थी। आयोग के सामने समस्या यह थी कि एक ही नाम और एक ही आरक्षित चिन्ह के साथ दोनों गुट चुनाव लड़ने का दावा कर रहे थे। इसी स्थिति से बचने के लिए आयोग ने दोनों पक्षों को अस्थायी रूप से अलग पहचान देने का रास्ता चुना।

TMC में विवाद की शुरुआत कैसे हुई
पार्टी के भीतर मौजूदा टकराव मई 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद खुलकर सामने आया। जून में बड़ी संख्या में तृणमूल विधायकों के बागी होने के बाद रितब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता मान्यता मिली। बाद में बागी खेमे ने अरूप राय को पार्टी का अध्यक्ष बताते हुए ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाया। ममता समर्थक इस दावे को स्वीकार नहीं करते और उन्हें पार्टी प्रमुख मानते रहे। यही विवाद आगे बढ़ते-बढ़ते चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक नियंत्रण के विवाद में बदल गया।
चुनाव आयोग के सामने मामला कैसे पहुंचा
जुलाई में चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से दस्तावेज और जवाब मांगे थे। आयोग ने संगठनात्मक नियंत्रण, अधिकृत पदाधिकारियों और पार्टी के दावे से जुड़े रिकॉर्ड पर दोनों पक्षों को सुना। सितंबर में दोनों गुटों की अलग-अलग सुनवाई के बाद आयोग ने माना कि विवाद को अंतिम रूप से तय करने में समय लगेगा। इसके बाद अंतरिम आदेश में दोनों गुटों को बराबर स्थिति में रखने का फैसला हुआ।
शिवसेना और NCP मामलों की भी मिसाल
चुनाव आयोग ने अपने फैसले में पूर्व के शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संगठनात्मक विवादों का भी संदर्भ लिया। उन मामलों में भी अंतिम निर्णय तक नाम और चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर अंतरिम व्यवस्था की गई थी। यह प्रावधान चुनाव आयोग के Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैरा 15 से जुड़ा है, जिसके तहत किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन होने पर आयोग यह तय करता है कि किस गुट को पार्टी के रूप में मान्यता दी जाए और चुनाव चिन्ह का अधिकार किसे मिले।
ममता गुट ने आदेश का किया विरोध
ममता बनर्जी के गुट ने आयोग के अंतरिम आदेश पर कड़ा विरोध दर्ज कराया और कहा कि उसे पुराने नाम और चिन्ह के इस्तेमाल से रोका जाना स्वीकार्य नहीं है। इसके बावजूद उपचुनाव को देखते हुए गुट ने आयोग को वैकल्पिक नाम और चिन्ह के विकल्प सौंपे। आयोग ने दोनों पक्षों को यह विकल्प दिया था कि वे अपने नए नाम में मूल All India Trinamool Congress से संबंध रखना चाहें तो उसका संकेत दे सकते हैं।
नाम-निशान बदलने का मतदाताओं पर क्या असर
आगामी उपचुनावों में सबसे बड़ा व्यावहारिक बदलाव यही होगा कि पुराने नाम और जोड़ाफूल चिन्ह की जगह मतदाताओं को दोनों गुटों की अलग पहचान दिखाई देगी। इससे उम्मीदवारों, प्रचार सामग्री और मतदान मशीन पर पार्टी की पहचान बदल जाएगी। हालांकि ममता गुट के नए नाम में स्वयं ‘Mamata’ और ‘Trinamool Congress’ दोनों शब्द रखे गए हैं, जिससे पुरानी राजनीतिक पहचान से संबंध बनाए रखने की कोशिश साफ दिखाई देती है। नया चिन्ह फुटबॉल खिलाड़ी है।
नाम-निशान विवाद पर सियासत भी तेज
चुनाव आयोग के आदेश के बाद विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आयोग के फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं, आयोग के आदेश का स्थापित तथ्य नहीं। वहीं भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने फैसले को लेकर ममता बनर्जी और तृणमूल पर राजनीतिक टिप्पणी की है।


