- सत्य निकेतन हॉस्टल हादसे में नीरज की दर्दनाक कहानी, घंटों मलबे में फंसे छात्र ने दोस्त को भेजी लाइव लोकेशन; एक फोन कॉल ने जगाई बचने की उम्मीद
भारत 19
नई दिल्ली। “भाई… मैं मर रहा हूं…” दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी की इमारत जब भरभराकर गिरी, तब मलबे के नीचे दबे 19 वर्षीय नीरज बावा के पास मदद के लिए पुकारने का ही रास्ता बचा था। चारों तरफ कंक्रीट और लोहे का मलबा था, शरीर गंभीर रूप से घायल था और हर गुजरते पल के साथ सांस लेना मुश्किल हो रहा था। उस खौफनाक अंधेरे में भी नीरज ने हिम्मत नहीं छोड़ी। उसने दोस्त को फोन किया, अपनी लाइव लोकेशन भेजी और किसी तरह बाहर की दुनिया तक अपनी आवाज पहुंचाई। यही जानकारी बाद में बचाव दल के लिए बेहद अहम साबित हुई।
एक फोन कॉल और मलबे के नीचे उम्मीद
नीरज के साथ उसका दोस्त नितेश छिब भी मलबे में फंसा था। दोनों घंटों तक बाहर निकलने का इंतजार करते रहे। ऊपर बचाव दल मलबा हटाने में जुटा था और नीचे फंसे छात्रों के लिए हर मिनट किसी परीक्षा से कम नहीं था। नीरज की फोन पर कही बात उसके दोस्तों के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। लेकिन उसी फोन कॉल ने उन्हें यह भरोसा भी दिया कि नीरज जिंदा है और उसे बचाया जा सकता है। बाहर मौजूद दोस्तों ने बचावकर्मियों को उसकी स्थिति और लोकेशन की जानकारी दी। करीब 27 घंटे चले पूरे राहत-बचाव अभियान में मलबे से लोगों को निकालने का काम लगातार जारी रहा। आखिरकार नीरज और नितेश को भी बाहर निकाला गया।
दोस्त का संदेश—हिम्मत मत हारना
मलबे के भीतर फंसे दोस्त के लिए बाहर से बहुत कुछ करना संभव नहीं था। ऐसे समय में शब्द ही सहारा थे। दोस्त ने नीरज को संदेश भेजा—“हिम्मत नहीं हारनी है तुझे…” नीरज के लिए ये शब्द शायद उस समय किसी दवा से कम नहीं रहे होंगे। एक तरफ जिंदगी बचाने की कोशिश में जुटे पुलिस, दमकल और एनडीआरएफ के जवान थे, दूसरी तरफ दोस्त लगातार उसकी सलामती की उम्मीद लगाए बैठे थे। जब नीरज को मलबे से बाहर निकाला गया तो उसकी हालत गंभीर थी। उसे एम्स ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहां उसका इलाज जारी है।
नितेश बचकर लौटा, नीरज की लड़ाई जारी
इस हादसे में घायल छात्रों में नितेश छिब भी शामिल था। उसके सिर में टांके आए और पैर व कंधे में चोट लगी। बाद में उसकी हालत स्थिर हुई और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। लेकिन नीरज की स्थिति अब भी गंभीर है। 9 सितंबर तक उपलब्ध एम्स अपडेट के अनुसार नीरज आईसीयू में भर्ती है और गंभीर हालत में है। उसके साथ भर्ती रहे आदित्य कुमार को भी उपचार के बाद छुट्टी मिल चुकी है, जबकि असगर अली की हालत स्थिर बताई गई है। नीरज की कहानी इसलिए और मार्मिक है क्योंकि वह उन हजारों युवाओं में से एक है जो पढ़ाई और बेहतर भविष्य की उम्मीद में दूसरे शहरों का रुख करते हैं। कॉलेज में जगह मिल जाती है, लेकिन सुरक्षित रहने की जगह मिलना आज भी बड़ी चुनौती है।
पढ़ाई के शहर में सुरक्षित छत का सवाल
सत्य निकेतन का यह हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। इसके साथ दिल्ली में छात्रों के लिए उपलब्ध निजी हॉस्टल और पीजी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय और दूसरे संस्थानों में पढ़ने वाले बड़ी संख्या में छात्र निजी पीजी और किराये के कमरों पर निर्भर हैं। ऐसे में उनके सामने अक्सर किराया, लोकेशन और सुविधाओं के साथ सुरक्षा का सवाल भी होता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हादसे के बाद पीजी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा और शहर में पर्याप्त हॉस्टल सुविधाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने एमसीडी को दिल्ली में पीजी हॉस्टलों का निरीक्षण कर भवनों की अनुमति और बिल्डिंग बायलॉज के अनुपालन की रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
हादसे से पहले चल रहा था निर्माण कार्य
पुलिस की जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में पीजी चल रहा था, वहां मरम्मत और निर्माण का काम चल रहा था। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इमारत की संरचनात्मक स्थिति कैसी थी और निर्माण कार्य का उसकी मजबूती पर क्या असर पड़ा। जांच का एक अहम पहलू यह भी है कि क्या इमारत की कमजोर स्थिति की जानकारी संबंधित लोगों को थी और इसके बावजूद उसमें छात्रों को रहने दिया गया। इमारत मालिक के परिवार और पीजी संचालन से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच हो रही है। पुलिस के मुताबिक, इमारत को लेकर पहले से मौजूद खामियों और उसमें किए गए बदलाव अब जांच के केंद्र में हैं।
सात मौतों के बाद उठी जवाबदेही की मांग
सत्य निकेतन हादसे में सात लोगों की मौत हुई, जिनमें पांच छात्र भी शामिल हैं। हादसे के बाद करीब 27 घंटे तक राहत और बचाव अभियान चला। पांच घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया था। अब हादसे की जांच सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि इमारत क्यों गिरी। असल सवाल यह है कि क्या किसी खतरनाक इमारत की पहचान उसके गिरने से पहले हो सकती थी? अगर भवन में निर्माण या मरम्मत चल रही थी तो उसकी निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? अगर इमारत असुरक्षित थी तो उसमें छात्रों को रहने की अनुमति कैसे मिली? और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया? नीरज की वह फोन कॉल इन सवालों को और ज्यादा गंभीर बना देती है। मलबे के नीचे फंसे एक छात्र को अपनी जान बचाने के लिए फोन करना पड़ा। अब व्यवस्था की परीक्षा यह है कि अगली बार किसी छात्र को ऐसी पुकार लगाने की नौबत न आए।
पांच गिरफ्तारियां, एक आरोपी अब भी फरार
सत्य निकेतन हादसे में पुलिस ने अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें इमारत के मालिक हरिराम, उनकी पत्नी उर्मिला, बेटे महेश, लेबर कॉन्ट्रैक्टर और पीजी संचालक सुधांशु शामिल हैं। पीजी चलाने वाला दूसरा पार्टनर शुभम त्यागी फरार बताया जा रहा है। पुलिस के मुताबिक, सुधांशु और शुभम ने इमारत को लीज पर लेकर ‘Hostel Daze’ के नाम से पीजी चलाया था। जांच में इमारत में चल रहे मरम्मत और निर्माण कार्य तथा उससे जुड़े लोगों की भूमिका भी खंगाली जा रही है।
हादसे में सात लोगों की मौत हुई है। पांच घायलों में से नितेश छिब और आदित्य कुमार को उपचार के बाद छुट्टी मिल चुकी है। नीरज बावा अब भी आईसीयू में गंभीर हालत में भर्ती है, जबकि असगर अली की स्थिति स्थिर बताई गई है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घायलों के लिए प्रति घायल पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की है। दिल्ली सरकार ने घायलों के इलाज का पूरा खर्च उठाने की बात भी कही है। मुख्यमंत्री ने एम्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचकर घायलों और उनके परिवारों से मुलाकात की। सरकार अब दिल्ली में निजी पीजी और हॉस्टलों को नियमन के दायरे में लाने के लिए नई व्यवस्था पर काम कर रही है। प्रस्तावित नीति के तहत पीजी को लाइसेंस, पुलिस क्लीयरेंस और स्ट्रक्चरल व फायर सेफ्टी एनओसी लेना होगा। प्रत्येक पीजी को पंजीकरण नंबर देकर एक सार्वजनिक पोर्टल पर सूचीबद्ध करने का भी प्रस्ताव है।
MCD की कार्रवाई तेज
हादसे के बाद एमसीडी ने पांच अधिकारियों को निलंबित किया है। इनमें दक्षिण जोन के डिप्टी कमिश्नर और इंजीनियरिंग से जुड़े अधिकारी शामिल हैं। कार्रवाई का आधार प्रारंभिक तौर पर लापरवाही और निगरानी में चूक को माना गया है। एमसीडी ने हादसे से सटी खतरनाक इमारत को गिराने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। यह इमारत पहले ही असुरक्षित घोषित की जा चुकी थी और उसमें चल रहे गर्ल्स पीजी को खाली कराया गया था। इसके अलावा दिल्ली में अवैध और खतरनाक निर्माण के खिलाफ कार्रवाई तेज की गई है। एमसीडी ने कई संपत्तियों को सील करने, नोटिस जारी करने और ध्वस्तीकरण के आदेश देने की कार्रवाई शुरू की है।
अब सिर्फ जांच नहीं, सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में पीजी और छात्र आवासों की सुरक्षा का मुद्दा स्थानीय प्रशासन से निकलकर अदालत और सरकार के स्तर तक पहुंच गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी पीजी हॉस्टलों के निरीक्षण और नियमों के अनुपालन की रिपोर्ट मांगी है, जबकि सुप्रीम कोर्ट भी पीजी और छात्र आवासों के सुरक्षा ऑडिट से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रहा है। नीरज की जिंदगी अभी अस्पताल के आईसीयू में टिकी है। लेकिन सत्य निकेतन का हादसा अब दिल्ली की पूरी पीजी व्यवस्था से एक बड़ा सवाल पूछ रहा है—छात्रों को सिर्फ रहने की जगह चाहिए या ऐसी छत भी, जिस पर उन्हें भरोसा हो कि वह उनके सिर पर कायम रहेगी?


