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जीएसटी 2.0 के एक साल बाद फंसे आईटीसी पर फैसला

  • 12 सितंबर को 57वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक; इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर से फंसी कार्यशील पूंजी, आईटीसी रिफंड और दरों में बदलाव पर उद्योग की नजर

भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली
। 22 सितंबर 2025 वह दिन था, जब देश में जीएसटी की दरों में बड़ा बदलाव किया गया। इसे जीएसटी 2.0 का नाम भी दिया गया। इसमें कई सुधार किए गए, लेकिन कुछ नई समस्याएं भी पैदा हुईं। बदली हुई दरों से कुछ क्षेत्रों में इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (आईडीएस) का संकट पैदा हुआ और पूरा इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) इस्तेमाल नहीं हो पाने से कारोबारियों की कार्यशील पूंजी फंसने लगी। अब नई जीएसटी दरें लागू होने के करीब एक वर्ष बाद 12 सितंबर 2026 को जीएसटी काउंसिल की 57वीं बैठक होने जा रही है। ऐसे में उद्योग को उम्मीद है कि फंसे आईटीसी के रिफंड की इस गांठ को खोलने पर बैठक में कोई ठोस फैसला हो सकता है।

नई दरों के बाद कुछ सेक्टर में फिर बना इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर

पिछले वर्ष सितंबर की शुरुआत में हुई जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक में बड़े पैमाने पर दरों में बदलाव किया गया था। इसके बाद कई पुराने इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर खत्म हुए, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इनपुट और तैयार माल की दरों में उलटा अंतर पैदा हो गया। उद्योग संगठनों का कहना है कि आईटीसी उनके इलेक्ट्रॉनिक लेजर में जमा हो रहा है और रिफंड मिलने तक उनकी कार्यशील पूंजी फंसी रहती है।

कॉरुगेटेड बॉक्स उद्योग में 13 प्रतिशत का दर अंतर

कॉरुगेटेड बॉक्स उद्योग इस समस्या का प्रमुख उदाहरण है। 22 सितंबर 2025 से कॉरुगेटेड पेपरबोर्ड बॉक्स पर जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत कर दी गई। वहीं इसके प्रमुख कच्चे माल क्राफ्ट पेपर और पेपर बोर्ड पर दर 12 से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दी गई। इसके बाद कच्चे माल के इनपुट और तैयार माल के बीच 13 प्रतिशत का अंतर पैदा हो गया। ईस्टर्न इंडिया कॉरुगेटेड बॉक्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने बदलाव के समय ही दावा किया था कि इससे 20 हजार से अधिक एमएसएमई इकाइयां प्रभावित हो रही हैं और उनके सामने कारोबार बंद होने का खतरा पैदा हो जाएगा।

रिफंड का दावा आसान नहीं, कागजों की जांच में लगता है समय

उद्यमी के लिए असली समस्या यहीं से शुरू होती है। मसलन, उद्यमी ने एक करोड़ रुपये का कच्चा माल खरीदने पर 18 लाख रुपये जीएसटी दी, लेकिन तैयार माल बेचने पर मात्र पांच लाख रुपये जीएसटी मिली। अब बचे 13 लाख रुपये के आईटीसी का रिफंड मांगने पर विभागीय जांच शुरू होती है।  अधिकारी यह देखते हैं कि बाकी 13 लाख रुपये वास्तव में रिफंड योग्य हैं या नहीं। इसके लिए कई सवालों के जवाब देने होते हैं—यह आईटीसी किन खरीद से आया? संबंधित इनवायस पर वास्तव में जीएसटी जमा किया गया या नहीं? क्या उसे जीएसटीआर-1 में दिखाया गया है? क्या जीएसटीआर-2बी में दिखाई दे रहा है? क्या खरीदार वास्तव में कारोबार करता है? क्या कारोबारी ने कुछ आईटीसी का पहले ही इस्तेमाल कर लिया है? क्या उसका टर्नओवर सही है?

परेशान उद्यमियों को अपने कागजात का मिलान करवाना पड़ता है और सबसे ज्यादा समय इसी प्रक्रिया में लगता है। कारोबारी ने अपने पूरे इनवायस जमा करके दिखा दिए, लेकिन उसके किसी खरीदार ने अपनी लिखापढ़ी में उसे समय से नहीं दिखाया तो भी बेचने वाले कारोबारी को जवाब देना पड़ता है। इतना ही नहीं, अगर 13 लाख रुपये का आईटीसी दिखाई दे रहा है तो जरूरी नहीं कि 13 लाख रुपये का रिफंड मिल जाए। अधिकारी एक फार्मूले के आधार पर यह तय करते हैं कि कितना आईटीसी वास्तव में उस इनवर्टेड सप्लाई से जुड़ा है। इसी जगह कारोबारी और विभाग की गणना में अंतर आ जाता है। कारोबारी अपनी पूरी आईटीसी मांगता है, लेकिन अधिकारी उसे पूरा रिफंड नहीं देते। रिफंड स्वीकार करने में अधिकारी गलत रिफंड होने की आशंका से भी सावधानी बरतते हैं। इससे प्रक्रिया में और समय लगता है। अक्सर इसमें महीनों लग जाते हैं और कारोबारी का अपना धन फंसा रहता है।

मार्च में वित्त मंत्रालय तक पहुंची आईटीसी रिफंड की मांग

मार्च 2026 में कई उद्योग संगठनों ने वित्त मंत्रालय के सामने आईडीएस को लेकर अपनी मांग रखी थी। उद्योग की प्रमुख मांग थी कि रिफंड व्यवस्था का दायरा बढ़ाया जाए और इनपुट के साथ इनपुट सर्विस तथा कैपिटल गुड्स पर जमा आईटीसी को भी रिफंड में शामिल किया जाए। उनका कहना था कि उत्पादन की लागत केवल कच्चे माल तक सीमित नहीं है। मशीनरी, मरम्मत, किराया, जॉब वर्क, परिवहन और अन्य सेवाओं पर भी जीएसटी का भुगतान होता है। यदि तैयार माल पर कर की दर कम है तो इन खर्चों पर दिया गया पूरा टैक्स आउटपुट टैक्स से समायोजित नहीं हो पाता। उन्होंने नेट आईटीसी की परिभाषा बदलने, रिफंड की गणना के फार्मूले में बदलाव करने और इनवायस मिलान की प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग भी की। साथ ही यह मांग रखी गई कि यदि सरकार के दरों में बदलाव से इनपुट और आउटपुट कर दरों में उल्टा अंतर पैदा हुआ है तो उससे जमा आईटीसी को भी रिफंड का लाभ दिया जाए।

सिर्फ रिफंड नहीं, जीएसटी दरों में बदलाव भी चाहता उद्योग

कॉरुगेटेड बॉक्स उद्योग लगातार यह मांग कर रहा है कि कागज और पेपर बोर्ड पर जीएसटी दर 18 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत की जाए। उद्योग का तर्क है कि इससे तैयार बॉक्स और उसके प्रमुख कच्चे माल पर कर की दर समान हो जाएगी और आईडीएस की समस्या ही खत्म हो जाएगी। यानी उद्योग के सामने दो विकल्प हैं। पहला, इनपुट और आउटपुट की दरों में अंतर खत्म किया जाए। दूसरा, यदि दर में बदलाव नहीं किया जाता तो जमा होने वाली आईटीसी का जल्दी और पूरा रिफंड किया जाए।

बजट ने रास्ता खोला, आर्थिक सर्वे ने आगे का संकेत दिया

2026 के वित्त विधेयक में सीजीएसटी अधिनियम की धारा 54(6) में संशोधन का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर से जुड़े रिफंड को प्रोविजनल रिफंड की व्यवस्था में स्पष्ट रूप से शामिल करना है। इससे पहले 56वीं जीएसटी काउंसिल ने जोखिम आधारित मामलों में 90 प्रतिशत तक प्रोविजनल रिफंड देने की सिफारिश की थी। सीबीआईसी ने इसके बाद क्षेत्रीय अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश भी जारी किए थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी जीएसटी दरों में बदलाव के बाद बचे इनवर्टेड ड्यूटी मामलों का उल्लेख है। इसमें अप्रयुक्त आईटीसी के जल्दी और स्वतः रिफंड की जरूरत बताई गई। साथ ही कैपिटल गुड्स और इनपुट सर्विस पर आईडीएस रिफंड की अनुमति देने जैसे विकल्पों पर विचार की संभावना जताई गई। यह बिंदु मार्च में उद्योग संगठनों की ओर से की गई मांग के अनुरूप है।

57वीं बैठक में दरों और आईटीसी रिफंड पर नजर

57वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि 22 सितंबर 2025 को लागू नई दर व्यवस्था से कारोबारियों को वास्तव में कितना फायदा हुआ और किन क्षेत्रों में नई विसंगतियां पैदा हुईं। सरकार ने पिछले साल कई पुराने इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को खत्म किया था। अब उद्योग चाहता है कि नई व्यवस्था की भी समीक्षा हो। जहां नई दरों के कारण इनपुट और आउटपुट के बीच उल्टा कर ढांचा बन गया है, वहां दरों को फिर संतुलित किया जाए। जहां दरों में बदलाव संभव नहीं है, वहां जमा आईटीसी का रिफंड किया जाए।

उद्योग की मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने रिफंड की प्रक्रिया तेज करने की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन उद्योग अभी भी इनपुट सर्विस और कैपिटल गुड्स को रिफंड के दायरे में लाने तथा नई दरों से पैदा हुए इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर का स्थायी समाधान मांग रहा है। इसलिए काउंसिल के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर जहां दरों से पैदा हुए इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना है, वहीं दूसरी ओर जहां आईटीसी जमा हो रहा है, वहां उसे कारोबारी की कार्यशील पूंजी को बनाए रखने के लिए मुक्त करना है।

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