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कानपुर में सत्ता की चाहत ने बदली व्यापारी राजनीति

– विधानसभा टिकट की दौड़ में कई व्यापारी नेता, सरकार से टकराव के बजाय ज्ञापन और अफसरों से बैठकों तक सिमटा आंदोलन


भारत 19
कानपुर
। कभी व्यापारी हितों पर सड़क जाम करने, बाजार बंद कराने और सरकारों के फैसलों पर दबाव बनाने वाले कानपुर के व्यापारी नेताओं के तेवर अब बदल गए हैं। विधानसभा चुनाव की आहट के बीच कई बड़े व्यापारी नेता खुद टिकट की दौड़ में हैं या सत्ता पक्ष की सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। ऐसे में व्यापारी समस्याओं पर सरकार से सीधा टकराव लेने के बजाय आंदोलन ज्ञापन, अधिकारियों से मुलाकात और बंद कमरों की बैठकों तक सिमटता दिखाई दे रहा है।

कानपुर के व्यापारी संगठनों में यह बदलाव केवल आंदोलन की रणनीति का नहीं, बल्कि बदलती व्यापारी राजनीति का भी है। जिन नेताओं के जिम्मे व्यापारियों की लड़ाई लड़ना है, उनमें से कई के सामने अब अपना राजनीतिक भविष्य भी है। ऐसे में सरकार के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतरने से बचने की प्रवृत्ति ने व्यापारी आंदोलन की पुरानी धार को कमजोर किया है।

कभी कानपुर के व्यापारी आंदोलन से सरकारों पर बनता था दबाव

व्यापारी आंदोलनों के मामले में कानपुर की अलग पहचान रही है। गल्ला, सराफा और कपड़ा व्यापारियों के संगठन अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते थे। बाजार बंद होते थे, जुलूस निकलते थे और प्रशासन से लेकर सरकार तक दबाव महसूस किया जाता था। कानपुर की इसी सक्रियता से प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े व्यापारी संगठन भी खड़े हुए। जीएसटी लागू होने के दौरान भी कानपुर के व्यापारी सड़कों पर उतरे और बाजार बंद कराए। लेकिन इसके बाद बड़े स्तर के आंदोलन लगातार कम होते गए। विरोध की जगह धीरे-धीरे ज्ञापन और अधिकारियों के साथ बैठकों ने ले ली।

श्याम बिहारी मिश्रा के दौर से बदल गई व्यापारी राजनीति

कानपुर से सांसद रहे श्याम बिहारी मिश्रा व्यापारी राजनीति के बड़े चेहरों में गिने जाते थे। उनकी पहचान केवल किसी संगठन के नेता की नहीं, बल्कि व्यापारी हितों पर सरकार के सामने खुलकर बोलने वाले नेता की थी। अपनी ही सरकार के दौर में सांसद रहते हुए भी वे व्यापारी समस्याओं को लेकर आवाज उठाते थे। आज की स्थिति काफी अलग दिखाई देती है। कानपुर के कई प्रमुख व्यापारी नेता अब सीधे सत्ता पक्ष की राजनीति में सक्रिय हैं। व्यापारी संगठन और दलगत राजनीति के बीच की दूरी कम होने के साथ सरकार के खिलाफ खुलकर आंदोलन करने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती गई।

कानपुर के बड़े व्यापारी नेता भी टिकट की दौड़ में

कानपुर से संचालित दो बड़े व्यापारिक संगठनों के प्रमुख नेताओं की राजनीतिक सक्रियता इस बदलाव की तस्वीर साफ करती है। उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल का नेतृत्व श्याम बिहारी मिश्रा के बाद उनके पुत्र मुकुंद मिश्रा कर रहे हैं। मुकुंद मिश्रा सीसामऊ और आर्यनगर विधानसभा सीट से राजनीतिक दावेदारी जता चुके हैं। दूसरी ओर भारतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के ज्ञानेश मिश्रा भी भाजपा की राजनीति से जुड़े हैं और किदवई नगर विधानसभा सीट से उनकी दावेदारी की चर्चा रहती है। उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के वरिष्ठ पदाधिकारी मणिकांत जैन भी विभिन्न चुनावों में टिकट की दावेदारी करते रहे हैं और लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के संयोजक की भूमिका निभा चुके हैं। कानपुर उद्योग व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष सुनील बजाज भाजपा उत्तर जिला के अध्यक्ष रह चुके हैं और सीसामऊ तथा आर्यनगर विधानसभा सीटों से राजनीतिक दावेदारी में सक्रिय हैं। मुकुंद मिश्रा से अलग होकर व्यापारियों के मुद्दे उठाने वाले विनोद गुप्ता भी छावनी विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। व्यापारी राजनीति से जुड़े नीरज चतुर्वेदी और सलिल विश्नोई भी भाजपा की सक्रिय राजनीति में हैं। सलिल विश्नोई विधान परिषद सदस्य हैं और विधानसभा चुनावों में भी सक्रिय रहे हैं, जबकि पूर्व विधायक नीरज चतुर्वेदी भी टिकट की दावेदारी में बने रहते हैं। भाजपा विधायक सुरेंद्र मैथानी भी व्यापार मंडल से जुड़े रहे हैं। इन नेताओं की राजनीतिक सक्रियता के बीच व्यापारी संगठनों के सामने व्यापारी हित और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का संतुलन भी बड़ा सवाल बन गया है।

आंदोलन की जगह अफसरों से वार्ता को तरजीह

जीएसटी हो, नगर निगम की व्यवस्था हो या केस्को से जुड़ी समस्याएं, कानपुर के व्यापारी संगठन अब बड़े आंदोलन के बजाय अधिकारियों से बातचीत कर समाधान निकालने को अधिक तरजीह देते दिखाई देते हैं। ज्ञापन देना और अधिकारियों से मिलना लोकतांत्रिक विरोध के तरीके जरूर हैं, लेकिन कानपुर के व्यापारी आंदोलन की पुरानी पहचान बाजार बंद कराने और बड़े सार्वजनिक दबाव बनाने की रही है। आज कई मुद्दे बैठकों, आश्वासनों और पत्राचार के बीच ही उलझे रह जाते हैं।

छोटे व्यापारी संगठन भी खुलकर बोलने से बच रहे

बड़े व्यापारी संगठनों के बदले रुख का असर छोटे संगठनों पर भी दिखाई दे रहा है। जब शहर के प्रमुख व्यापारी नेता सरकार से सीधा टकराव लेने से बचते हैं तो छोटे संगठन भी बड़े आंदोलन की अगुवाई करने से हिचकते हैं। इसका असर बाजारों की रोजमर्रा की समस्याओं पर दिखाई देता है। जाम, जलभराव, बिजली के तारों का मकड़जाल, नगर निगम और केस्को से जुड़ी शिकायतें लगातार उठती हैं, लेकिन उनका समाधान कई बार बैठकों और आश्वासनों के बीच अटक जाता है।

कानपुर की व्यापारी राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां संगठन की ताकत और नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा साथ-साथ चल रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी व्यापारी नेता सत्ता से जवाब मांगने के लिए जाने जाते थे, जबकि अब उनमें से कई खुद सत्ता में जगह बनाने की दौड़ में हैं। इसी बदलते समीकरण ने कानपुर के व्यापारी आंदोलन की पुरानी धार को काफी हद तक कुंद कर दिया है।

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