- ईवीएम, मतदाता सूची और चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वाले विपक्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत की फोटो आईडी और मतदान व्यवस्था को अमेरिकी चुनाव सुधार का उदाहरण बनाया
भारत 19 डेस्क
कानपुर। भारत में चुनाव नतीजों के बाद ईवीएम, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े करने वाले विपक्ष, खासकर राहुल गांधी को शायद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ताजा बयान रास न आए। ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में सुधार की अपनी मुहिम के लिए भारत की चुनाव प्रणाली और मतदाता पहचान व्यवस्था को सबसे उम्दा उदाहरण माना है। यही वह बिंदु है, जहां भारत की घरेलू चुनावी बहस और अमेरिकी राष्ट्रपति की राजनीतिक दलील एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
ट्रंप ने भारत में मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो आईडी, बेहद कम पोस्टल वोटिंग और बड़े पैमाने पर मतदान का उल्लेख करते हुए अमेरिका में कड़े मतदाता पहचान नियम लागू करने की वकालत की। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से हुई कथित बातचीत का भी हवाला दिया और कहा कि कुमार ने अमेरिका में वैध फोटो आईडी के बिना चुनाव कराए जाने पर सवाल किया था।
भारत में सवाल, अमेरिका के लिए उदाहरण
इस बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सिर्फ यह नहीं है कि ट्रंप ने भारतीय चुनाव व्यवस्था की तारीफ की। बड़ा सवाल यह है कि भारत में जिस चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है, उसी व्यवस्था के एक हिस्से को अमेरिका में चुनाव सुधार की जरूरत साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। खासकर राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से चुनाव आयोग, मतदाता सूची और कथित “वोट चोरी” को लेकर लगाए गए आरोपों के बीच ट्रंप का यह रुख राजनीतिक बहस को एक नया संदर्भ देता है। हालांकि, ट्रंप का बयान भारतीय चुनाव व्यवस्था पर उठे सभी सवालों का प्रमाणिक उत्तर नहीं है और इसे भारत की पूरी चुनाव प्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा के तौर पर भी नहीं देखा जा सकता। लेकिन *राजनीतिक नैरेटिव के स्तर पर इसका महत्व जरूर है।
ट्रंप ने भारत में क्या देखा?
ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि भारत के पिछले चुनाव में करीब 64.6 करोड़ लोगों ने मतदान किया, एक प्रतिशत से भी कम लोगों ने पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल किया और हर मतदाता के पास वैध फोटो पहचान दस्तावेज था। इसी तुलना के आधार पर उन्होंने अमेरिका में SAVE America Act पारित करने की जरूरत बताई। ट्रंप का फोकस भारत की चुनावी व्यवस्था की तीन चीजों पर है जिसमें पहली मतदाता की पहचान, दूसरी मतदान की प्रक्रिया और तीसरी पोस्टल वोटिंग। वह इन्हें अमेरिकी चुनावों में संभावित कमजोरियों को दूर करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
राहुल गांधी के लिए बदला हुआ नैरेटिव
राहुल गांधी और कांग्रेस लंबे समय से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का भारत की चुनाव व्यवस्था को अमेरिकी चुनाव सुधार के लिए उदाहरण बनाना विपक्ष के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा करता है। हालांकि कांग्रेस ने ट्रंप के बयान को स्वीकार करने के बजाय उस पर पलटवार किया। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने तंज कसते हुए कहा कि ट्रंप को ज्ञानेश कुमार और भारतीय ईवीएम को अमेरिका ले जाना चाहिए। इससे साफ है कि कांग्रेस ट्रंप के बयान को भारतीय चुनाव व्यवस्था की विश्वसनीयता के प्रमाण के तौर पर स्वीकार करने के बजाय उसे भारत के चुनाव आयोग पर अपने हमले के संदर्भ में देख रही है। यानी ट्रंप के बयान ने भारत की चुनावी बहस में एक दिलचस्प उलटफेर पैदा कर दिया है। जिस मुद्दे पर विपक्ष केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को घेरता है, उसी मुद्दे पर अमेरिका का राष्ट्रपति भारत की व्यवस्था को अपने देश के लिए बेहतर मॉडल के रूप में पेश कर रहा है।
भारतीय और अमेरिकी व्यवस्था में है बड़ा फर्क
यहां एक जरूरी अंतर समझना भी महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने भारत की पूरी चुनाव प्रणाली को अमेरिकी मॉडल बनाने की बात नहीं की है। उनका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी चुनावों में फोटो आईडी और नागरिकता संबंधी कड़े नियमों के समर्थन में भारत का उदाहरण देना है। भारत और अमेरिका की चुनाव व्यवस्थाएं संस्थागत रूप से काफी अलग हैं। भारत में निर्वाचन आयोग लोकसभा और विधानसभा चुनावों के संचालन की केंद्रीय संवैधानिक भूमिका निभाता है। अमेरिका में चुनाव प्रशासन का बड़ा हिस्सा राज्यों और स्थानीय प्रशासन के अधीन है। इसलिए दोनों देशों की चुनाव प्रणालियों की सीधी तुलना सीमित अर्थ में ही की जा सकती है।
भारत की चुनावी बहस को मिला अंतरराष्ट्रीय संदर्भ
भारत में चुनावी प्रक्रिया पर बहस अब तक मुख्यतः सत्ता बनाम विपक्ष के चश्मे से देखी जाती रही है। ट्रंप के बयान ने उसी बहस को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ दे दिया है। एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग, मतदाता सूची और ईवीएम को लेकर सवाल उठाता है, दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति भारतीय मतदाता पहचान व्यवस्था और कम पोस्टल वोटिंग को अमेरिकी चुनाव सुधार के पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। ट्रंप का बयान न तो भारतीय चुनाव व्यवस्था पर अंतिम प्रमाणपत्र है और न विपक्ष के आरोपों का स्वतः खंडन। हालांकि राजनीतिक नैरेटिव के स्तर पर यह जरूर एक असहज सवाल छोड़ता है कि जिस चुनावी मॉडल की विश्वसनीयता पर भारत में सवाल उठ रहे हैं, उसी मॉडल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अमेरिका में चुनाव सुधार का उदाहरण क्यों बन रहा है?

