- सीनेट से पास ‘ग्राहम एक्ट’, अब प्रतिनिधि सभा में होगा पेश, कानून बना तो भारत के निर्यात, ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका से रणनीतिक रिश्तों पर पड़ेगा असर
भारत19 न्यूज डेस्क
कानपुर। अमेरिका ने टैरिफ नीति को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया है। अब शुल्क सिर्फ विदेशी सामान को महंगा करने या अमेरिकी उद्योगों को संरक्षण देने का औजार नहीं रह गया है, बल्कि विदेश नीति और भू-राजनीतिक दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में अमेरिकी कांग्रेस आगे बढ़ रही है। रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने वाला नया अमेरिकी विधेयक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने इसे अमेरिकी विधायी इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव बताया है। प्रस्तावित कानून में राष्ट्रपति को रूस के बड़े तेल-गैस खरीदार देशों के सामान पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत और चीन इसके संभावित प्रमुख निशानों में हैं। मूल उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा आय को कम करना है। लेकिन अमेरिकी रणनीति का तरीका अलग है। सीधे रूस पर शुल्क लगाने के बजाय उन देशों को आर्थिक रूप से दबाने का रास्ता चुना जा रहा है, जो रूसी तेल और गैस खरीदते हैं। यही वह बिंदु है जहां टैरिफ व्यापार नीति से निकलकर भू-राजनीतिक हथियार बन जाता है।
अमेरिकी कांग्रेस राष्ट्रपति को यह अधिकार देने की तैयारी कर रही है कि वह रूस के ऊर्जा क्षेत्र के बड़े खरीदारों पर शुल्क लगाकर उन्हें रूसी तेल खरीद कम करने के लिए मजबूर कर सकें। विधेयक में ऐसे देशों की संख्या शीर्ष पांच तक सीमित रखने का प्रावधान है। भारत के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है और अमेरिकी कानून में प्रस्तावित व्यवस्था में भारत उन संभावित देशों में आता है, जिन पर यह कार्रवाई की जा सकती है।
सीनेट पार, अब प्रतिनिधि सभा की परीक्षा
लिंडसे ओ. ग्राहम रूस-ईरान प्रतिबंध अधिनियम, 2026 को अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को 86-11 के भारी बहुमत से पारित कर दिया। यह रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों के समर्थन वाला विधेयक है। लेकिन इसे अभी कानून नहीं कहा जा सकता। अब विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाना है। वहां इसे समर्थन मिलना अगली बड़ी परीक्षा होगी। रिपोर्टों के मुताबिक प्रतिनिधि सभा में कुछ सांसद राष्ट्रपति को इतने व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंतित हैं। उनका तर्क है कि इससे अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं की लागत बढ़ सकती है और अमेरिका खुद व्यापार युद्ध में फंस सकता है।
फिलहाल स्थिति
सीनेट → 86-11 से पारित
प्रतिनिधि सभा → अगला पड़ाव
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर → कानून बनने की अगली प्रक्रिया
100% टैरिफ → अभी लागू नहीं, राष्ट्रपति को मिलने वाला संभावित अधिकार
यह अंतर महत्वपूर्ण है। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि “अमेरिका ने भारत पर 100% टैरिफ लगा दिया है।” सही स्थिति यह है कि भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का कानूनी रास्ता तैयार किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के बाद राष्ट्रपति को वैधानिक ताकत देने की कोशिश !
अमेरिका में राष्ट्रपति की टैरिफ लगाने की आपातकालीन शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि राष्ट्रपति को व्यापक शुल्क लगाने का स्पष्ट कानूनी अधिकार किस तरह दिया जाए। ग्राहम एक्ट इसी दिशा में एक नया रास्ता तैयार करता दिखाई देता है। WSJ के मुताबिक प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर टैरिफ लगाने के लिए स्पष्ट वैधानिक अधिकार देने की कोशिश करता है। इसका अर्थ यह है कि टैरिफ लगाने की शक्ति अब सिर्फ कार्यपालिका की आर्थिक नीति नहीं, बल्कि कांग्रेस द्वारा विदेश नीति के औजार के रूप में वैधानिक रूप से इस्तेमाल की जा सकती है। यही इस विधेयक को सामान्य व्यापार कानून से अलग बनाता है।
भारत के लिए कितना नुकसानदायक
पहला, भारत से आने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगता है तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ जाएगी। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। फार्मा, इंजीनियरिंग सामान, टेक्सटाइल, मशीनरी और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर इसका दबाव पड़ने की आशंका होगी।
दूसरा, भारत की रूस से तेल खरीदने की नीति का बड़ा आधार कीमत और ऊर्जा सुरक्षा रहा है। अमेरिका इस खरीद को आर्थिक दंड से जोड़ता है तो भारत के सामने कठिन विकल्प पैदा हो सकता है। एक तरफ सस्ता रूसी तेल छोड़ने पर आयात लागत बढ़ेगी, दूसरी ओर रूसी तेल खरीद जारी रखने पर अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर भारी शुल्क का जोखिम पैदा हो सकता है। यानी अमेरिकी टैरिफ भारत की ऊर्जा नीति को भी प्रभावित करने की कोशिश बन सकता है।
तीसरा, भारत और अमेरिका के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत पर अत्यधिक शुल्क लगाने की नीति अमेरिकी रणनीति के भीतर ही विरोधाभास पैदा कर सकती है। अमेरिकी सांसदों के एक वर्ग ने इसी आशंका को उठाया है कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदार पर अत्यधिक दबाव चीन के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
अमेरिका के लिए भी जोखिम कम नहीं
टैरिफ नीति का नुकसान सिर्फ भारत या चीन तक सीमित नहीं रह सकता। यदि बड़े रूसी तेल खरीदारों पर भारी शुल्क लगाया जाता है तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी रहेगी। अमेरिकी कंपनियां भी आयातित वस्तुओं की बढ़ी हुई लागत का सामना कर सकती हैं और उसका कुछ हिस्सा अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इसी कारण राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंता जताई जा रही है। यानी वाशिंगटन रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए जिस हथियार का इस्तेमाल करना चाहता है, वह अमेरिका के अपने व्यापारिक हितों को भी चोट पहुंचा सकता है।
500% से 100% तक: कितना बदला प्रस्ताव?
विधायी प्रक्रिया के दौरान टैरिफ की सीमा को लेकर भी बदलाव हुए हैं। मूल प्रस्ताव कहीं अधिक कठोर था, जबकि अंतिम समझौते में राष्ट्रपति के लिए रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने की व्यवस्था रखी गई है। WSJ के अनुसार, व्हाइट हाउस और सांसदों के बीच इस बात को लेकर बातचीत हुई कि राष्ट्रपति को कितना व्यापक अधिकार दिया जाए। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका एक साथ दो लक्ष्य साधना चाहता है, रूस पर अधिकतम आर्थिक दबाव और राष्ट्रपति के लिए पर्याप्त रणनीतिक लचीलापन।
भारत के लिए असली चुनौती अब शुरू
भारत के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि 100% टैरिफ लगेगा या नहीं? बल्कि यह है कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा इस विधेयक को किस रूप में स्वीकार करती है और कानून बनने के बाद राष्ट्रपति इस अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करते हैं। सीनेट में भारी बहुमत से पारित होना निश्चित रूप से भारत के लिए चेतावनी है। लेकिन अभी अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है। भारत के लिए आने वाले चरण में तीन मोर्चे अहम होंगे—अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक की भाषा, भारत के लिए संभावित छूट या carve-out और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता।
…तो बदलेगी वैश्विक व्यापार व्यवस्था
अमेरिका की यह पहल वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है। यदि किसी देश की विदेश नीति को बदलने के लिए उसके सामान पर भारी शुल्क लगाने की शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है, तो टैरिफ अब केवल कितना व्यापार होगा तय करने का माध्यम नहीं रह जाता। वह यह तय करने का साधन बन जाता है कि किस देश की विदेश नीति क्या होगी। रूस को अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश का सीधा असर भारत पर पड़ना बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण मिसाल है। सीनेट ने रास्ता खोल दिया है। अब असली परीक्षा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और उसके बाद राष्ट्रपति के फैसले की है। भारत के लिए यह सिर्फ एक संभावित टैरिफ का मामला नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात और रणनीतिक स्वायत्तता, तीनों से जुड़ा सवाल है।


