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चीनी शेयर बाजार की तेजी से भारत में FPI खतरा

  • Shanghai Composite एक महीने में करीब 3.19 फीसदी मजबूत, सेंसेक्स 2.63 फीसदी कमजोर; विदेशी निवेशकों के लिए भारत-चीन का निवेश समीकरण बदलने की आशंका

भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली।
 चीन के शेयर बाजार में करीब एक महीने से बनी तेजी अब भारतीय शेयर बाजार के लिए नई चुनौती बनती दिख रही है। यदि चीन की यह तेजी आगे भी कायम रहती है और इसके साथ अर्थव्यवस्था व कंपनियों की कमाई में सुधार के संकेत मिलते हैं तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए भारत की तुलना में चीन आकर्षक विकल्प बन सकता है। इससे भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी की चुनौती बढ़ सकती है।

सेंसेक्स कमजोर, शंघाई कंपोजिट में लगातार तेजी

3 अगस्त 2026 को बीएसई सेंसेक्स 78,639.03 अंक पर बंद हुआ था, जो 2 सितंबर को 76,570.35 अंक रह गया। यानी करीब एक महीने में सेंसेक्स 2,068.68 अंक यानी 2.63 फीसदी गिरा। इसके उलट इसी अवधि में Shanghai Composite करीब 3.19 फीसदी मजबूत हुआ। सितंबर की शुरुआत में सूचकांक 3,900 अंक के पार रहा और 3 सितंबर को कारोबार के दौरान करीब 3,988 अंक तक पहुंचा। दोनों बाजारों के प्रदर्शन में करीब छह प्रतिशत अंक का अंतर विदेशी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।

चीन बेहतर चला तो बदल सकता है FPI का रुख

विदेशी निवेशक सिर्फ आर्थिक विकास दर के आधार पर पैसा नहीं लगाते। कंपनियों की वैल्यूएशन, कमाई की संभावना, मुद्रा, ब्याज दर और संभावित रिटर्न भी निवेश के फैसले में अहम होते हैं। ऐसे में चीन का बाजार लगातार भारत से बेहतर प्रदर्शन करता है तो वैश्विक फंड अपने पोर्टफोलियो का कुछ हिस्सा भारत से चीन की ओर कर सकते हैं। हालांकि फिलहाल FPI भारत से पूरी तरह दूर नहीं हुए हैं। अगस्त में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में 3.1 अरब डॉलर लगाए, जो करीब दो साल में सबसे बड़ा मासिक निवेश रहा। इसके बावजूद 2026 में अब तक उनका शुद्ध निवेश 24.6 अरब डॉलर नकारात्मक है।

चीन की टेक कंपनियां बनीं निवेश का आकर्षण

चीन लंबे समय से रियल एस्टेट संकट, कमजोर घरेलू मांग और आर्थिक सुस्ती से जूझता रहा है। इसके बावजूद इलेक्ट्रिक वाहन, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी विनिर्माण जैसे क्षेत्रों ने निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ाई है। यदि इन क्षेत्रों की कंपनियों की कमाई में सुधार आता है तो चीन का बाजार विदेशी फंडों के लिए और आकर्षक हो सकता है।

भारत को वैल्यूएशन पर देनी होगी टक्कर

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती वैल्यूएशन की हो सकती है। यदि भारतीय शेयर अपेक्षाकृत महंगे बने रहते हैं और चीन में मजबूत कंपनियां कम वैल्यूएशन पर उपलब्ध रहती हैं तो वैश्विक निवेशक चीन को तरजीह दे सकते हैं। इसके उलट भारत की कंपनियों की आय वृद्धि और घरेलू मांग मजबूत रहती है तो FPI का भरोसा बना रह सकता है।

FPI निकासी बढ़ी तो रुपये पर भी दबाव

विदेशी पूंजी की निकासी बढ़ने का असर शेयर बाजार के साथ रुपये पर भी पड़ सकता है। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव बन सकता है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भूमिका भारतीय बाजार को सहारा दे रही है। अगस्त में FPI की वापसी के बावजूद घरेलू निवेश और मिडकैप-स्मॉलकैप में मजबूती बाजार के लिए सकारात्मक संकेत रहे।

चीन की तेजी पर अब भारत की नजर

आने वाले महीनों में Shanghai Composite, भारत-चीन शेयर वैल्यूएशन, FPI का मासिक प्रवाह और चीन में विदेशी निवेश अहम संकेतक होंगे। यदि चीन की तेजी कॉरपोरेट कमाई में सुधार के साथ जारी रहती है और भारत में FPI फिर बिकवाली शुरू करते हैं तो विदेशी पूंजी के लिए भारत को चीन से ज्यादा प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है।

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