- अखिलेश दुबे से जुड़े मामले के वादी सुरेश पाल ने अदालत में लगाया आरोप; कहा- ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत जेल भेजने और पुराने पॉक्सो केस को दोबारा खोलने की धमकी देकर पुलिस ने बनाया दबाव
भारत 19
कानपुर। रंगदारी के चर्चित मामले में मुख्य गवाह और वादी सुरेश पाल की अदालत में हुई जिरह पूरी हो गई। प्रतिपरीक्षा में सुरेश ने ऐसा बयान दिया, जिसने मुकदमे की जांच और पुलिस की कार्रवाई को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए। उसने अदालत में कहा कि अखिलेश दुबे ने उससे कभी रंगदारी नहीं मांगी और न ही उन्हें धमकाया। उसने पुलिस को तहरीर देने की बात से भी इनकार किया।
सुरेश ने जिरह के दौरान एसआईटी पर दबाव बनाने का आरोप लगाया। उसके मुताबिक, पुलिस ने पुराने पॉक्सो मामले को दोबारा खोलने और ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत जेल भेजने की धमकी दी थी। सुरेश के मुताबिक इसी दबाव में उनसे टाइपशुदा कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे। उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए अपने बयान को भी पुलिस के दबाव में दिया जाना बताया।
कोर्ट में बोले- अखिलेश दुबे ने नहीं मांगी रंगदारी
बचाव पक्ष की प्रतिपरीक्षा में सुरेश पाल से रंगदारी की मांग और धमकी को लेकर सवाल किए गए। सुरेश ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि अखिलेश दुबे ने न उनसे कभी रंगदारी नहीं मांगी और न ही धमकाया। सुरेश ने पुलिस को तहरीर देने से भी इनकार किया। मुकदमे के मुख्य गवाह की ओर से अदालत में कही गई ये बातें अब मामले की आगे की न्यायिक कार्यवाही में अहम होंगी। हालांकि, गवाह के बयान का अंतिम फैसला कोर्ट पूरे साक्ष्य और रिकॉर्ड के आधार पर करेगी।
पुराने पॉक्सो केस को खोलने की दी धमकी
जिरह में सुरेश पाल ने वर्ष 2022 के नौबस्ता थाने से जुड़े एक पुराने पॉक्सो मामले का जिक्र किया। उनके मुताबिक, इस मामले में पहले फाइनल रिपोर्ट लग चुकी थी, लेकिन उसे दोबारा खोलने की बात कहकर उन पर दबाव बनाया गया। सुरेश ने अदालत में आरोप लगाया कि उन्हें ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत जेल भेजने की धमकी दी गई। इसके बाद उनसे टाइपशुदा कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए। उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान भी पुलिस के दबाव में दिया गया था।
एम्स में इलाज के बीच कानपुर लौटने का दावा
सुरेश पाल ने जिरह के दौरान अगस्त 2025 की घटनाओं का भी विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस समय वह एम्स, नई दिल्ली में भर्ती थे और 16 अगस्त को उनकी हार्ट सर्जरी होनी थी। उसके मुताबिक, इसी दौरान कानपुर पुलिस की ओर से उनके घर और होटल पर लगातार फोन किए गए। उन्होंने अदालत में कहा कि दबाव के चलते उन्हें 6 अगस्त को इलाज अधूरा छोड़कर कानपुर लौटना पड़ा। उनके अनुसार, अगले दिन यानी 7 अगस्त को एसआईटी कार्यालय में उनसे कागजात पर हस्ताक्षर कराए गए।
संपत्ति बेचने का रंगदारी से कनेक्शन नकारा
मामले में अभियोजन की ओर से संपत्तियों की बिक्री को रंगदारी की रकम से जोड़ने के आरोप पर भी सुरेश पाल से सवाल किए गए। उसने अदालत में इस संबंध से इनकार किया। उन्होंने बताया कि प्रयागराज स्थित उनका मकान करीब दो करोड़ रुपये और वृंदावन का प्लॉट करीब डेढ़ करोड़ रुपये में बेचा गया था। उनके मुताबिक, दोनों संपत्तियां व्यावसायिक जरूरतों के चलते बेची गई थीं, रंगदारी चुकाने के लिए नहीं। सुरेश ने अभियुक्त लवी मिश्रा के साथ किसी तरह के लेन-देन से भी इनकार किया।
जिरह में जांच की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
सुरेश पाल के बयान का एक अहम हिस्सा पुलिस और एसआईटी की कार्रवाई से जुड़ा रहा। एक तरफ उन्होंने अदालत में अखिलेश दुबे द्वारा रंगदारी मांगे जाने से इनकार किया, दूसरी तरफ एसआईटी पर दबाव बनाकर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने का आरोप लगाया। मामले की जांच के लिए तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार की ओर से एसआईटी गठित की गई थी। गवाह के इस बयान के बाद जांच की प्रक्रिया और उसके दौरान अपनाई गई कार्रवाई को लेकर बचाव पक्ष की दलीलों को नया आधार मिल सकता है। हालांकि, इसका अंतिम प्रभाव अदालत में पेश पूरे साक्ष्य के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगा।
अब आगे की सुनवाई पर रहेगी नजर
सुरेश पाल की प्रतिपरीक्षा पूरी होने के बाद मामले की आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। इस जिरह में रंगदारी मांगने से इनकार, तहरीर देने से इनकार और एसआईटी पर दबाव बनाने के आरोप प्रमुख बिंदु रहे। अदालत में गवाह ने जो कहा है, वह रिकॉर्ड पर दर्ज उसकी गवाही है। वहीं पुलिस पर लगाए गए दबाव के आरोपों और रंगदारी से जुड़े अन्य आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति अदालत में उपलब्ध समूचे साक्ष्य और आगे की कार्यवाही से तय होगी।
