Hot Topics

नेपाल फ्लड: हिमालय में ग्लेशियर झीलें बढ़ीं, जल प्रलय का खतरा

  • पिघलते ग्लेशियरों से बन रहीं नई झीलें, प्राकृतिक बांध टूटने पर मिनटों में घाटियों तक पहुंच सकता है पानी और मलबा

भारत 19

विक्सन सिकरोड़िया, कानपुर। नेपाल में आई भीषण बाढ़ हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी बनकर सामने आई है। पहाड़ों में तेजी से पिघलते ग्लेशियर अब केवल पर्यावरण की चिंता नहीं रहे। बढ़ता तापमान नई ग्लेशियर झीलों को जन्म दे रहा है और इनके बढ़ते आकार के साथ ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ यानी GLOF का खतरा भी बढ़ रहा है।

आईआईटी कानपुर से जुड़े हिमालयी ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों के अध्ययन में यह संकेत सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के साथ ऐसी घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब ग्लेशियर झील को रोकने वाला प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ जाए या टूट जाए। ऐसी स्थिति में भारी मात्रा में पानी, बर्फ और मलबा कुछ ही समय में नीचे की पहाड़ी घाटियों की ओर बढ़ सकता है।

नेपाल की बाढ़ ने फिर जगाई हिमालय की चिंता

नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास हाल में हुई भीषण बाढ़ के बाद वैज्ञानिक तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण और ग्लेशियरों की स्थिरता पर नए सिरे से अध्ययन कर रहे हैं। बाढ़ के सटीक कारणों और भविष्य में ऐसे खतरों की आशंका को समझने के लिए ग्लेशियर झीलों की सैटेलाइट मैपिंग और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान पर काम चल रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों पर शोध करने वाले आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर इंद्रसेन के अनुसार, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों के सामने अब चुनौती उन झीलों को समय रहते चिन्हित करने की है, जो भविष्य में बड़ा खतरा बन सकती हैं।

प्रोफ़ेसर इंद्र शेखर सेन, पृथ्वी विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर

प्राकृतिक बांध टूटा तो मिनटों में आ सकती बाढ़

ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों में बनने वाली झीलों को कई बार बर्फ, चट्टान और मलबे के प्राकृतिक अवरोध रोकते हैं। लेकिन तापमान बढ़ने, लगातार पानी जमा होने या भूस्खलन जैसी घटनाओं से ये अवरोध कमजोर पड़ सकते हैं। यदि किसी बड़ी ग्लेशियर झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो उसका पानी सामान्य नदी बाढ़ की तरह धीरे-धीरे नहीं, बल्कि अचानक तेज बहाव के साथ नीचे की ओर बढ़ सकता है। रास्ते में मलबा और चट्टानें जुड़ने से इसका विनाशकारी असर और बढ़ सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान, उनकी स्थिति में बदलाव और संभावित बाढ़ के रास्तों का अध्ययन कर रहे हैं।

केदारनाथ और चमोली की आपदाएं दे चुकीं चेतावनी

भारत भी हिमालयी आपदाओं की विनाशकारी तस्वीर देख चुका है। केदारनाथ और चमोली में हुई आपदाओं ने पहाड़ों की संवेदनशीलता और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को सामने रखा। इसी वजह से वैज्ञानिक अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पर ही नहीं, बल्कि उनसे बनने वाली झीलों के आकार, आसपास की भौगोलिक स्थिति और संभावित बाढ़ के रास्तों का भी अध्ययन कर रहे हैं। नेपाल की हालिया बाढ़ के बाद तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण और संभावित ग्लेशियर अस्थिरता को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

पश्चिमी हिमालय पर पड़ सकता है ज्यादा असर

प्रो. इंद्रसेन के अनुसार ग्लेशियरों में बदलाव का प्रभाव पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में अधिक गंभीर हो सकता है। सिंधु और चिनाब नदी तंत्र भारत के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों, विशेषकर लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से जुड़े हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पर्वतीय घाटियों और ऊपरी नदी बेसिन क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर नीचे के मैदानी क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है, जहां कृषि और जल संसाधन इन नदी तंत्रों से जुड़े हैं।

पहले बाढ़, फिर पानी की कमी की चुनौती

हिमालय के सामने खतरा केवल अचानक आने वाली बाढ़ का नहीं है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की प्रक्रिया लंबे समय में जल संकट की चुनौती भी पैदा कर सकती है। शुरुआती दौर में अधिक पिघलाव से नदियों और ग्लेशियर झीलों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लगातार सिकुड़ते ग्लेशियर भविष्य में नदी जल प्रवाह और पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं। इसका असर हिमालयी क्षेत्रों के साथ पंजाब, हरियाणा और दूसरे कृषि क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। यानी बदलते हिमालय के सामने भविष्य में पहले बाढ़ और फिर पानी की कमी की दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है।

सैटेलाइट से होगी खतरे वाली झीलों की निगरानी

आईआईटी कानपुर के कई शोध समूह हिमालयी नदियों, ग्लेशियरों के पिघलने और वहां की कृषि व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। इस विषय पर कई शोध पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं। वैज्ञानिकों का जोर अब ग्लेशियर झीलों की सैटेलाइट मैपिंग, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और संभावित बाढ़ के मॉडल तैयार करने पर है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि किसी संवेदनशील झील या ग्लेशियर क्षेत्र में बदलाव का संकेत समय रहते मिल सके।

आपदा रोकना मुश्किल, तबाही कम करना संभव

वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन समय रहते खतरे की पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और बेहतर चेतावनी व्यवस्था के जरिए जनहानि और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी, समय पर बाढ़ अलर्ट और वैज्ञानिक जोखिम आकलन जरूरी है। आम लोगों को भी नदी और झीलों के अत्यधिक संवेदनशील किनारों पर बसावट से बचना चाहिए और बाढ़ या आपदा संबंधी चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

हिमालय की बदलती तस्वीर दे रही भविष्य की चेतावनी

नेपाल की बाढ़ ने एक बार फिर हिमालय में बढ़ते जलवायु जोखिम की ओर ध्यान खींचा है। पिघलते ग्लेशियर, बढ़ती ग्लेशियर झीलें और कमजोर पड़ते प्राकृतिक बांध आने वाले समय में नई आपदाओं की आशंका पैदा कर सकते हैं। हिमालय के सामने अब चुनौती केवल ग्लेशियरों के पिघलने की नहीं, बल्कि तेजी से बदलते पर्यावरण के बीच बाढ़ के खतरे को समय रहते पहचानने और पहाड़ से मैदान तक आबादी को सुरक्षित रखने की भी है।

Tags :

Bharat 19 News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News