कानपुर और आसपास के क्षेत्रों में बाजार में उचित दाम न मिलने से 80 फीसदी आलू आज भी कोल्ड स्टोरेज में ही बंद पड़ा है। भाड़े के भारी खर्च, आगामी बुआई के लिए डीएपी खाद के नए नियमों और सिर पर मंडराते कर्ज ने किसानों को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस संकट का समाधान निकाल पाएंगे?
कानपुर । मार्च के महीने में जिन उम्मीदों और पसीने की कमाई से किसानों ने अपना आलू कोल्ड स्टोरेज में रखवाया था, 5 महीने बीत जाने के बाद भी वे उम्मीदें पूरी होती नजर नहीं आ रही हैं। बाजार में सही भाव न होने के कारण कोल्ड स्टोरेज से आलू की निकासी लगभग ठप्प पड़ी है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि कोल्ड स्टोरेज में रखा करीब 80 प्रतिशत आलू अब भी बाहर नहीं निकल पाया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह आलू कब बाहर आएगा, कहां बिकेगा और किसानों को इसका क्या भाव मिलेगा? अगर यह आलू समय रहते नहीं बिका, तो भारी कर्ज में डूबा किसान आने वाले अक्टूबर महीने में अगली कच्ची फसल के लिए आलू की बुआई कैसे करेगा?
किराए और मंदे भाव का गणित: लागत भी निकालना मुश्किल
किसान की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जब व्यापारी 50 से 100 रुपये प्रति बोरा देकर आलू खरीदने की कोशिश कर रहा है, तो किसान को कोल्ड स्टोरेज का भाड़ा ही ₹170 प्रति बोरा अदा करना पड़ रहा है। यानी आलू बेचने पर किसान की जेब में आने के बजाय उल्टा उसे ही भाड़ा देना पड़ रहा है।
अक्टूबर में जब बुआई का समय आएगा और किसान को बीज के लिए खुद आलू निकालना होगा, तब भी उसे कोल्ड स्टोर मालिक को भारी भाड़ा चुकाना पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ, कोल्ड स्टोरेज मालिकों के लिए भी संकट कम नहीं है। उन्होंने बारदाने (बोरे) और एडवांस के रूप में जो पैसा किसानों को दिया था, उसकी वापसी की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।
कोल्ड मालिकों और किसानों का दोहरा नुकसान
पूर्व ब्लॉक प्रमुख और कोल्ड स्टोर मालिक अशोक कटियार तथा मोहित जैन के अनुसार, “शायद ही कोई ऐसा कोल्ड स्टोर मालिक होगा जिसे पिछले साल किसानों द्वारा आलू न छुड़ाने के कारण 20 से 50 लाख रुपये का नुकसान न हुआ हो। यही हाल इस बार भी बनता दिख रहा है।”
यदि किसान किसी तरह थोड़ा बहुत आलू निकाल भी लेता है, तो जुताई, गढ़ाई और खाद का भारी खर्च उसकी कमर तोड़ देता है।
खाद का नया नियम और जेवर गिरवी रखने की नौबत
आलू की खेती में प्रति बीघे 4 से 5 बोरी डीएपी (DAP) या एनपीके (NPK) खाद की आवश्यकता होती है। हालांकि बाजार में खाद की कोई कमी नहीं है, लेकिन सरकार के नए नियमों के तहत किसान को एक बीघे के लिए सिर्फ एक बोरी ही खाद मिल पाएगी। ऐसे में किसान ब्लैक में खाद खरीदने को मजबूर होगा, जिसके लिए पैसा कहां से आएगा?
अधिवक्ता व किसान ध्रुव शुक्ला, प्रधान मनीष दीक्षित और शैलेंद्र दीक्षित का कहना है कि एसी कमरों में बैठे अफसरों और गांवों से निकलकर विधायक-सांसद बने नेताओं को शायद धरातल की सच्चाई का अंदाजा नहीं है। अधिकतर किसान आलू की फसल गाड़ने के लिए अपने घर के जेवर तक गिरवी रखते हैं। अब वे न तो पुराने जेवर छुड़ा पा रहे हैं और न ही नई फसल के लिए पूंजी जुटा पा रहे हैं।
जनप्रतिनिधि का आश्वासन और आगामी राह
आलू बेल्ट बिल्हौर से भाजपा विधायक राहुल बच्चा ने स्वीकार किया कि खाद की अनुपलब्धता और आलू का गिरता भाव इस समय क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा, “किसान जहां भी मिल रहे हैं, यही पीड़ा बता रहे हैं। जल्द ही हम जिलाधिकारी (DM) से मिलकर खाद की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित कराएंगे और आलू के बाजार भाव की समस्या को हाईकमान तक पहुंचाएंगे।”
आलू किसानों की यह बदहाली केवल एक मौसमी संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा आघात है। कल क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन अगर समय रहते जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों और सरकार ने इस संकट पर कड़े व ठोस कदम नहीं उठाए, तो अन्नदाता की यह बेरुखी पूरी व्यवस्था पर भारी पड़ सकती है।


