कानपुर। बकरीद नजदीक आते ही पशु बाजारों और घरों में पाले जा रहे खास बकरों की चर्चा तेज हो जाती है। इस बार कानपुर के बांसमंडी इलाके में रहने वाले कपड़ा कारोबारी रईस आलम के दो कश्मीरी बकरे लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। वजह सिर्फ इनकी ऊंची कीमत या खूबसूरत कद-काठी नहीं, बल्कि उनकी अनोखी खान-पान की आदतें हैं।
ये दोनों कश्मीरी नस्ल के बकरे साधारण बकरों की तरह सिर्फ हरा चारा या भूसा नहीं खाते, बल्कि चिकन बिरयानी, काजू, बादाम और यहां तक कि कोल्ड ड्रिंक भी बड़े चाव से पीते हैं। बकरीद पर इनकी कुर्बानी की तैयारी चल रही है, लेकिन उससे पहले इन्हें देखने के लिए लोगों का तांता लगा हुआ है। रईस आलम के बेटे अरहम बताते हैं कि उन्हें कश्मीरी नस्ल के बकरे बेहद पसंद थे। सोशल मीडिया और वीडियो में इन्हें देखने के बाद उन्होंने वर्ष 2024 में कश्मीर से दो छोटे बकरे मंगवाए थे।
इन बकरों का नाम तुरगुत और बंमशी रखा गया। जब इन्हें कानपुर लाया गया तब ये काफी छोटे थे। परिवार ने बच्चों की तरह उनकी देखभाल शुरू की और धीरे-धीरे दोनों घर का हिस्सा बन गए। इन बकरों की सबसे बड़ी खासियत उनका खान-पान है। आमतौर पर बकरे शाकाहारी भोजन करते हैं, लेकिन कश्मीरी नस्ल के इन बकरों को चिकन बेहद पसंद है। रईस आलम के अनुसार दोनों बकरे रोजाना लगभग 250 ग्राम चिकन या चिकन बिरयानी खाते हैं। इसके अलावा उन्हें काजू, बादाम, कोल्ड ड्रिंक भी उनकी पसंदीदा चीजों में शामिल है। इनके भोजन में सामान्य चारा, भूसा और हरी पत्तियां भी शामिल रहती हैं ताकि उनका संतुलित आहार बना रहे।
कानपुर की गर्मी से बचाने के लिए किए गए खास इंतजाम
कश्मीर के ठंडे मौसम में पले-बढ़े इन बकरों को कानपुर की भीषण गर्मी में रखना आसान नहीं था। परिवार ने इसके लिए विशेष व्यवस्था की। अलग कमरा तैयार कराया गया। उन्हें एयर कंडीशनर वाले कमरे में रखा जाता है ताकि वे गर्मी से परेशान न हों। उनके अनुसार शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती इन्हें कानपुर के मौसम के अनुरूप ढालने की थी, लेकिन लगातार देखभाल और उचित वातावरण मिलने से दोनों बकरे पूरी तरह स्वस्थ हैं।
रोजाना शैंपू और कंडिशनर से होती है देखभाल
कश्मीरी नस्ल के इन बकरों के लंबे और घने बाल उनकी खूबसूरती का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। इन्हें साफ और चमकदार बनाए रखने के लिए रोजाना विशेष देखभाल की जाती है। परिवार के सदस्य बताते हैं कि दोनों बकरों को नियमित रूप से नहलाया जाता है। नहलाने के दौरान शैंपू, कंडिशनर और सीरम का इस्तेमाल किया जाता है ताकि उनके बाल स्वस्थ और आकर्षक बने रहें। इसी वजह से दोनों बकरे आसपास के लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। अरहम का कहना है कि बकरीद केवल एक त्योहार नहीं बल्कि त्याग और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि कुर्बानी उसी चीज की दी जाती है जिससे इंसान को सबसे ज्यादा मोहब्बत हो और जिसकी उसने पूरी जिम्मेदारी के साथ परवरिश की हो। दो साल तक इन बकरों की देखभाल करने के बाद इस बार बकरीद पर उनकी कुर्बानी दी जाएगी। परिवार इसे धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर मानता है।
कानपुर के बांसमंडी इलाके में पाले गए कश्मीरी नस्ल के तुरगुत और बंमशी अपनी अनोखी जीवनशैली और खान-पान की वजह से चर्चा में हैं। चिकन बिरयानी, काजू-बादाम और विशेष देखभाल पाने वाले ये बकरे बकरीद से पहले लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। दो वर्षों तक बच्चों की तरह पाले गए इन बकरों की कुर्बानी इस बार बकरीद पर दी जाएगी, जो परिवार के लिए भावनात्मक और धार्मिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।



