- एक ही चेहरे पर दांव पड़ रहा भारी? कानपुर में दूसरी लाइन के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ रहा असंतोष – कानपुर की सीसामऊ, आर्यनगर और छावनी विधानसभा सीटों पर हार के बाद भी नहीं बदला प्रत्याशी
भारत19 न्यूज | राजीव सक्सेना, कानपुर। भारतीय जनता पार्टी लंबे समय तक अपनी मजबूत संगठनात्मक संरचना और कार्यकर्ता आधारित राजनीति के लिए जानी जाती रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता की तैयारी के बीच पार्टी के भीतर एक ऐसा मुद्दा चर्चा में है, जो भविष्य में चुनावी चुनौती बन सकता है। यह मुद्दा है—हारी हुई विधानसभा सीटों पर वर्षों तक एक ही चेहरे पर भरोसा बनाए रखना और दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे न आने देना।
कानपुर इसका बड़ा उदाहरण बनकर सामने आ रहा है। यहां भाजपा को मजबूत संगठन वाला जिला माना जाता है, लेकिन सीसामऊ, आर्यनगर और छावनी जैसी विधानसभा सीटें पिछले दो चुनावों से पार्टी की पहुंच से बाहर हैं। इन सीटों पर हार के बावजूद नेतृत्व में बड़ा बदलाव न होने से संगठन के भीतर असंतोष बढ़ने की चर्चा है।
हार के बाद भी वही नेतृत्व
भाजपा की कार्यशैली में यह परंपरा रही है कि चुनाव हारने वाले प्रत्याशी को भी अगले चुनाव तक उसी विधानसभा क्षेत्र का प्रमुख चेहरा माना जाता है। संगठनात्मक कार्यक्रमों से लेकर मंडल और जिला स्तर की बैठकों तक, वही नेता क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मंडल अध्यक्षों और स्थानीय संगठन की संरचना भी अक्सर उन्हीं नेताओं के प्रभाव में तैयार होती है।
नतीजा यह होता है कि क्षेत्र में सक्रिय दूसरे कार्यकर्ताओं और संभावित नए नेतृत्व के लिए आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित रह जाती है। कई कार्यकर्ता मानते हैं कि यदि कोई नया चेहरा सक्रिय होकर संगठनात्मक कार्यक्रम करना भी चाहता है तो उसे पहले पुराने नेतृत्व की सहमति लेनी पड़ती है।
2022 में सामने आया संगठनात्मक असंतुलन
सीसामऊ और आर्यनगर इसका सबसे चर्चित उदाहरण रहे। 2017 में सीसामऊ से सुरेश अवस्थी और आर्यनगर से सलिल विश्नोई चुनाव लड़े थे। अगले चुनाव में पार्टी ने दोनों नेताओं की सीटें बदल दीं। पार्टी के भीतर चर्चा रही कि दोनों नेताओं के प्रभाव में बनी मंडल इकाइयों का बड़ा हिस्सा अपने-अपने पुराने नेता के साथ नई विधानसभा में सक्रिय हो गया। इससे स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक समन्वय प्रभावित हुआ और चुनावी अभियान भी अपेक्षित मजबूती नहीं पकड़ सका। 2024 के सीसामऊ उपचुनाव में भी पार्टी ने फिर सुरेश अवस्थी को मैदान में उतारा, लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं गया।
1996 के बाद नहीं जीत सकी सीसामऊ
सीसामऊ विधानसभा भाजपा के लिए सबसे कठिन सीटों में शामिल रही है। पार्टी यहां 1996 के बाद विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकी। इसके बावजूद संगठनात्मक नेतृत्व में बड़े बदलाव नहीं हुए। ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल लगातार उठ रहा है कि यदि परिणाम नहीं बदल रहे तो रणनीति और नेतृत्व में बदलाव क्यों नहीं हो रहा।
छावनी में भी वही स्थिति
छावनी विधानसभा क्षेत्र में भी पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा को सफलता नहीं मिली। यहां भी लगातार एक ही नेतृत्व के इर्द-गिर्द संगठन संचालित होने की चर्चा है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि भविष्य में प्रत्याशी बदला भी जाता है तो नई टीम को निचले स्तर पर अपेक्षित सहयोग मिलने में कठिनाई हो सकती है, क्योंकि संगठन का बड़ा हिस्सा पुराने नेतृत्व से जुड़ा हुआ है।
दूसरी लाइन की नाराजगी बढ़ रही
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, हारी हुई सीटों पर सक्रिय कई कार्यकर्ता और नेता लंबे समय से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका मानना है कि लगातार हार के बावजूद नए चेहरों को मौका नहीं मिलने से संगठन की दूसरी पंक्ति का मनोबल प्रभावित हो रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच यह सवाल भाजपा के सामने महत्वपूर्ण हो सकता है कि क्या पार्टी अपनी कठिन सीटों पर नई रणनीति और नए नेतृत्व के साथ उतरेगी या फिर पुराने फार्मूले पर ही भरोसा बनाए रखेगी।


