- बर्रा का मकान बेचकर उज्जैन में छिपे थे संजय अग्रवाल और राहुल; कुछ दिन पहले साथी मनोज सिंह की गिरफ्तारी से खुली अगली कड़ी, फर्जी दस्तावेजों से हाउस-कार लोन कराकर रकम हड़पने का आरोप
भारत 19
कानपुर। बर्रा में करीब डेढ़ दशक पहले शुरू हुआ लोन ठगी का खेल पुलिस की फाइलों में भले पुराना हो गया था, लेकिन इसके किरदार अब एक-एक कर सामने आ रहे हैं। पुलिस का शिकंजा कसते ही बर्रा का मकान बेचकर उज्जैन जा बसे पिता-पुत्र को आखिरकार 15 साल बाद गिरफ्तार कर लिया गया। बर्रा पुलिस ने 50 हजार के इनामी संजय अग्रवाल उर्फ संजीव राज गोयल और 25 हजार के इनामी राहुल अग्रवाल को उज्जैन के नानाखेड़ा बस स्टैंड से पकड़ा है।
यह गिरफ्तारी कुछ दिन पहले पकड़े गए 50 हजार के इनामी मनोज सिंह से जुड़ी कड़ी को आगे बढ़ाती है। पुलिस के मुताबिक मनोज ने संजय अग्रवाल और उसके बेटे राहुल के साथ मिलकर लोगों को कार लोन दिलाने के नाम पर ठगी की थी। मनोज की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने पुराने नेटवर्क की परतें खंगालीं और तकनीकी जांच के जरिए उज्जैन में छिपे पिता-पुत्र तक पहुंच गई। मनोज के खिलाफ अलग-अलग थानों में 17 मुकदमे दर्ज बताए गए थे।
फर्जी फर्म खड़ी की, बैंक लोन को बनाया ठगी का हथियार
पुलिस के मुताबिक गिरोह ने फर्जी फर्म और एजेंसी बनाकर लोन कराने का जाल बिछाया। लोगों को कार और मकान के लिए बैंक से लोन दिलाने का भरोसा दिया जाता था। इसके बाद फर्जी आरसी और दूसरे दस्तावेजों के सहारे लोन प्रक्रिया पूरी कराई जाती थी। लोन स्वीकृत होने के बाद रकम जिस व्यक्ति के नाम पर जारी होती, उसे उसका वास्तविक लाभ नहीं मिलता था। पुलिस का आरोप है कि रकम को अपने खातों में लेकर हड़प लिया जाता था। यानी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए बैंक से लोन निकलवाने का रास्ता दिखाकर उसी लोन को ठगी का जरिया बना दिया गया। मनोज सिंह की गिरफ्तारी के समय सामने आई पुलिस की जानकारी के अनुसार कार बिक्री के नाम पर बनाई गई फर्म के जरिए लोगों को कार लोन दिलाने का झांसा दिया जाता था। पुलिस ने फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल और लंबे समय तक ठिकाने बदलकर गिरफ्तारी से बचने की बात भी कही थी।
पुलिस पहुंची तो बर्रा छोड़ उज्जैन में बस गए
मामले में सबसे दिलचस्प कड़ी आरोपितों के फरार होने का तरीका है। डीसीपी साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी के मुताबिक पुलिस का शिकंजा बढ़ने लगा तो संजय और राहुल ने बर्रा स्थित अपना मकान बेच दिया और उज्जैन चले गए। इसके बाद दोनों ने वहीं ठिकाना बना लिया। करीब 15 साल तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहने के बाद तकनीकी संसाधनों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों ने उनकी लोकेशन तक पहुंचने में मदद की। बर्रा पुलिस टीम उज्जैन पहुंची और दोनों को नानाखेड़ा बस स्टैंड से दबोच लिया।
एक की फाइल में 24, दूसरे पर 16 मुकदमे
गिरफ्तारी के बाद सामने आया आपराधिक रिकॉर्ड इस मामले को और गंभीर बनाता है। पुलिस के मुताबिक संजय अग्रवाल के खिलाफ 24 मुकदमे, जबकि राहुल अग्रवाल के खिलाफ 16 मुकदमे दर्ज हैं। दोनों के खिलाफ कुल 40 मुकदमों की जानकारी पुलिस जांच में सामने आई है। इनमें बैंक से जुड़े मामले भी हैं और उन लोगों की शिकायतें भी, जिनके नाम पर कथित तौर पर लोन कराया गया था। पुलिस अब पुराने मुकदमों और आरोपितों के नेटवर्क को आपस में जोड़कर जांच आगे बढ़ा रही है।
बैंक के अंदर तक पहुंची जांच की आंच
इस मामले में केवल फर्जी दस्तावेज बनाकर लोन हासिल करने का ही आरोप नहीं है। पुलिस की जांच में बैंक कर्मचारियों की कथित भूमिका भी सामने आने की बात कही गई है। यही इस पुराने फर्जीवाड़े का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी दस्तावेजों के बावजूद लोन कैसे स्वीकृत हुए, बैंक प्रक्रिया में किस स्तर पर मदद मिली और लोन की रकम आरोपितों के खातों तक कैसे पहुंची। अगर जांच में यह कड़ी पुष्ट होती है तो मामला केवल ठगी करने वाले गिरोह तक सीमित नहीं रहेगा।
मनोज की गिरफ्तारी से खुली पिता-पुत्र तक पहुंचने की राह
करीब 15 साल से पुलिस को चकमा दे रहे मनोज सिंह की 25 अगस्त को हुई गिरफ्तारी इस कार्रवाई की तत्काल पिछली कड़ी है। पुलिस ने उसे तकनीकी जांच और फेस रिकग्निशन तकनीक की मदद से पकड़ा था। वह अलग-अलग पहचान और ठिकानों के सहारे लंबे समय तक बचता रहा था। पुलिस के अनुसार मनोज ने कार बिक्री के नाम पर फर्म बनाई थी और संजय अग्रवाल व राहुल के साथ मिलकर लोगों को कार लोन दिलाने का झांसा दिया। मनोज के पकड़े जाने के बाद पुलिस ने उसके संपर्कों और पुराने मामलों की पड़ताल की। इसी जांच ने उज्जैन में रह रहे संजय और राहुल तक पहुंचने में मदद की।
अब पुराने मुकदमों और बैंक रिकॉर्ड की होगी पड़ताल
दोनों आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने अगला काम 15 साल पुराने फर्जीवाड़े का पूरा नेटवर्क जोड़ना है। किन बैंकों से कितने लोन कराए गए, कितने लोगों के नाम इस्तेमाल हुए, कितनी रकम खातों में पहुंची और बैंक के भीतर से किस स्तर पर मदद मिली—इन सवालों के जवाब पुराने दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड की जांच से तलाशे जाएंगे।


