KANPUR/ कानपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था, जांच प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले आईटीबीपी (ITBP) के एक जवान को अपनी मां के इलाज के दौरान कथित लापरवाही के बाद उनका हाथ कट जाने पर इंसाफ के लिए भटकना पड़ा। मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट जवान और उसके साथी शनिवार को पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। करीब 50 से अधिक आईटीबीपी जवानों और अधिकारियों की मौजूदगी से पुलिस कमिश्नर कार्यालय परिसर में सुरक्षा बढ़ानी पड़ी और पूरा क्षेत्र कुछ समय के लिए छावनी जैसा दिखाई दिया। जवानों ने जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष कार्रवाई और दोबारा जांच की मांग की।
क्या है पूरा मामला?
महाराजपुर स्थित 32वीं बटालियन में तैनात आईटीबीपी कांस्टेबल विकास सिंह की मां निर्मला देवी को 13 मई को सांस लेने में परेशानी होने पर टाटमिल स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि उपचार के दौरान अस्पताल की लापरवाही से उनके हाथ में गंभीर संक्रमण फैल गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों को 17 मई को उनका हाथ काटना पड़ा। परिवार का आरोप है कि यदि समय रहते सही इलाज मिलता तो हाथ काटने की नौबत नहीं आती।
मामले ने तब सुर्खियां बटोरीं जब 20 मई को विकास सिंह अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचे और न्याय की गुहार लगाई। इस घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया और प्रशासन ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए।
जांच रिपोर्ट पर उठे सवाल
पुलिस कमिश्नर द्वारा मामले की जांच के लिए रिपोर्ट मांगी गई थी। स्वास्थ्य विभाग की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में हाथ काटे जाने की संभावित वजह “धमनी में खून का थक्का (Arterial Embolism)” बताई गई। हालांकि रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह स्थिति कैसे बनी और उपचार के दौरान क्या-क्या चिकित्सकीय कदम उठाए गए। यही बिंदु पीड़ित परिवार और आईटीबीपी अधिकारियों की नाराजगी का कारण बना।
ITBP अधिकारियों ने जताई नाराजगी
शनिवार को आईटीबीपी के कमांडेंट गौरव प्रसाद, लाइजनिंग अधिकारी अर्पित और 50 से अधिक जवान पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचे। अधिकारियों ने आरोप लगाया कि जांच रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को स्पष्ट नहीं किया गया और अस्पताल प्रबंधन तथा संबंधित चिकित्सकों की भूमिका पर पर्याप्त सवाल नहीं उठाए गए। सूत्रों के अनुसार आईटीबीपी अधिकारियों ने जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए।
“घेरने” की बात को बताया गलत
मामले के दौरान कुछ मीडिया रिपोर्टों में पुलिस कमिश्नर कार्यालय घेरने की बात सामने आ रही थी। हालांकि पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचे आईटीबीपी अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि “घेरने” वाली बात तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है और मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना था कि उनका उद्देश्य केवल निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
पुलिस प्रशासन ने क्या कहा?
अपर पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) डॉ. विपिन ताडा ने बताया कि पीड़ित पक्ष जांच रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं से असंतुष्ट था। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों से बातचीत के बाद आपत्तियों से संबंधित प्रार्थना पत्र पुनः मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय भेज दिया गया है।
डॉ. विपिन ताडा के अनुसार आपत्तियों का पुनः परीक्षण कराया जाएगा, चिकित्सकीय विशेषज्ञ मामले के सभी पहलुओं की समीक्षा करेंगे, जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामला पूरी तरह मेडिकल नेग्लिजेंस से जुड़ा है, इसलिए चिकित्सकीय पहलुओं की जांच विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा ही की जा सकती है।
स्वास्थ्य विभाग पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण के बाद स्वास्थ्य विभाग की जांच प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है। परिजनों और आईटीबीपी अधिकारियों का आरोप है कि रिपोर्ट संभावनाओं पर आधारित है और कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर नहीं देती। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में विस्तृत मेडिकल ऑडिट और स्वतंत्र जांच से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, निजी अस्पतालों की जवाबदेही और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है। जब देश की सुरक्षा में तैनात जवान को अपनी मां के लिए न्याय मांगने हेतु प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
कानपुर का यह मामला मेडिकल लापरवाही के आरोपों और जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़ी बहस छेड़ रहा है। आईटीबीपी जवान विकास सिंह और उनके साथियों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई की जाए। अब सभी की निगाहें दोबारा होने वाली जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो यह मामला प्रदेश के चर्चित मेडिकल नेग्लिजेंस मामलों में शामिल हो सकता है।



