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CSJMU AI Manthan 2.0: एआई बदलेगा दुनिया, कमान इंसान की

-दो दिन चले मंथन में शिक्षा, खेती, स्वास्थ्य और स्मार्ट शहरों में AI के इस्तेमाल का रोडमैप; आनंदीबेन पटेल बोलीं- उपयोगकर्ता नहीं, रचनाकार बनें, किसान-मरीज-दिव्यांगों के काम आए तकनीक; प्रदेश में सात लाख से अधिक विद्यार्थी पूरा कर चुके एआई पाठ्यक्रम

भारत 19
कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) में दो दिन चले AI Manthan 2.0 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते दायरे और उसके व्यावहारिक इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने मंथन किया। चर्चा में शिक्षा से लेकर खेती, स्वास्थ्य और स्मार्ट शहरों तक एआई के इस्तेमाल के मॉडल सामने आए। समापन सत्र में राज्यपाल एवं कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने कहा कि एआई से डरने के बजाय उसकी कमान इंसान के हाथ में रखनी होगी। विश्वविद्यालयों को केवल तकनीक का इस्तेमाल करने के बजाय स्थानीय जरूरतों के समाधान देने वाले एआई रचनाकार तैयार करने चाहिए।

एआई शिक्षा में जवाब नहीं, सीखने का रास्ता दिखाएगा

BITS पिलानी के प्रो. वी. राम गोपाल राव ने एआई को मनुष्य का विकल्प बनाने के बजाय सहायक के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दिया। उनके मुताबिक व्यक्तिगत शिक्षा, भाषा सहायता, शोध और उत्पादकता में एआई उपयोगी साबित हो सकता है। आईआईटी कानपुर के प्रो. अमय करकरे ने ‘प्रोजेक्ट साथी’ के जरिए विद्यार्थियों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन देने की संभावना बताई। उनका कहना था कि एआई ट्यूटर को हर सवाल का सीधा उत्तर देने के बजाय संकेत और मार्गदर्शन देना चाहिए, ताकि विद्यार्थी स्वयं समाधान तक पहुंचें।

सात लाख विद्यार्थियों ने पूरा किया एआई पाठ्यक्रम

आनंदीबेन पटेल ने बताया कि प्रदेश में सात लाख से अधिक विद्यार्थी एआई का पाठ्यक्रम पूरा कर चुके हैं। उन्होंने एआई को विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के साथ साहित्य, भाषा और अन्य विषयों से जोड़ने की जरूरत बताई। उनका जोर ऐसे मॉडल विकसित करने पर रहा, जिनका सीधा लाभ किसान, मरीज और दिव्यांगों को मिल सके। उन्होंने विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कामकाज में भी एआई के इस्तेमाल और शिक्षकों को इसके लिए प्रशिक्षित करने की जरूरत बताई।

खेती में एआई से बेहतर होंगी फसल की किस्में

आईएआरआई, नई दिल्ली के डॉ. बोड्डुपल्ली मारुति प्रसन्ना ने कृषि अनुसंधान में एआई की भूमिका बताई। जीनोमिक और पर्यावरणीय आंकड़ों, ड्रोन आधारित फेनोटाइपिंग और इमेज प्रोसेसिंग के इस्तेमाल से बेहतर फसल किस्मों के विकास में तेजी लाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, बढ़ती लागत और कीट-रोगों की चुनौतियों के बीच एआई कृषि अनुसंधान को अधिक प्रभावी बना सकता है।

सटीक खेती में जरूरत के हिसाब से सिंचाई

कृषि विशेषज्ञ डॉ. एसयूएस राजू ने सटीक खेती में एआई की उपयोगिता बताई। इसके जरिए किसान को खेत में कब और कितनी सिंचाई, खाद और अन्य इनपुट की जरूरत है, इसका बेहतर आकलन किया जा सकता है। इससे संसाधनों के इस्तेमाल को जरूरत के मुताबिक करने और खेती की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

स्मार्ट शहर पहले पहचान सकेंगे प्रदूषण और बाढ़

आईआईटी कानपुर के प्रो. सचिदानंद त्रिपाठी ने टिकाऊ शहरों के लिए एआई के इस्तेमाल पर चर्चा की। वायु गुणवत्ता, शहरी बाढ़ और सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित प्रणालियां बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं। उन्होंने बताया कि कानपुर में एआई आधारित वायु गुणवत्ता प्रणाली प्रदूषण के हॉटस्पॉट और संभावित स्रोतों की पहचान में मदद कर रही है। भविष्य में ऐसे मॉडल यह अनुमान लगाने में भी सक्षम होंगे कि कहां खतरा बढ़ सकता है और उससे पहले क्या कार्रवाई जरूरी है।

स्वास्थ्य सेवाओं में जांच और मरीज प्रबंधन बदलेगा

केजीएमयू के डॉ. दुर्गेश कुमार द्विवेदी ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई आधारित स्क्रीनिंग, मरीज प्रबंधन, उन्नत इमेज विश्लेषण और वर्चुअल ऑटोप्सी जैसी संभावनाओं की जानकारी दी। मंथन में बीमारी की शुरुआती पहचान और चिकित्सकीय विश्लेषण को तेज करने में एआई की भूमिका पर भी चर्चा हुई।

एआई की रफ्तार के लिए प्रतिभा और ढांचा जरूरी

आईबीएम के विशाल चहल ने एआई के विस्तार में कुशल मानव संसाधन की कमी को बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने उत्तर प्रदेश की बड़ी छात्र आबादी को एआई कौशल के केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावना जताई। उन्होंने विश्वविद्यालयों में केवल प्रयोगशालाओं के बजाय सेंटर ऑफ एक्सीलेंस विकसित करने, स्थानीय प्रतिभा के साथ डेटा, मॉडल, हार्डवेयर और सुरक्षित डिजिटल ढांचा तैयार करने पर जोर दिया। एआई के इस्तेमाल में मानव निर्णय, जवाबदेही, विशेषज्ञता और साइबर सुरक्षा को भी जरूरी बताया।

शोधपत्र से आगे उत्पाद और स्टार्टअप पर जोर

प्रो. राव ने विश्वविद्यालयी शोध को केवल शोधपत्र और पेटेंट तक सीमित न रखने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक शोध को प्रोटोटाइप, उत्पाद और स्टार्टअप में बदलने की दिशा में काम होना चाहिए। उन्होंने मूल्यांकन व्यवस्था में भी अंतिम उत्तर के बजाय विद्यार्थी की तर्क क्षमता, प्रयास और समस्या समाधान की प्रक्रिया को महत्व देने की बात कही।

सीएसजेएमयू में 22 एआई परियोजनाओं पर काम

सीएसजेएमयू के प्रो. आलोक कुमार ने बताया कि विश्वविद्यालय में एआई प्रमोशन सेल बनाया गया है और 15 विद्यार्थियों को एआई प्रशिक्षु के रूप में जोड़ा गया है। ये विद्यार्थी 22 परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिनमें छह पूरी हो चुकी हैं। विश्वविद्यालय में रोबोटिक्स, ड्रोन, सुपरकंप्यूटर, साइबर सुरक्षा और आईओटी से जुड़ी प्रयोगशालाएं भी हैं।

एचबीटीयू में एआई प्रशासन से स्टार्टअप तक

एचबीटीयू की प्रो. वंदना दीक्षित कौशिक ने एआई और मशीन लर्निंग के पाठ्यक्रमों तथा शोध गतिविधियों की जानकारी दी। संस्थान में एआई आधारित प्रशासनिक व्यवस्था, चैटबॉट और स्टार्टअप को बढ़ावा देने पर भी काम हो रहा है।

पुराने शोध और आंकड़े बनेंगे एआई की ताकत

राज्यपाल के ओएसडी डॉ. सुधीर एम. बोबडे ने प्रदेश में एआई नीति और उसके क्रियान्वयन के लिए अलग समूहों की जरूरत बताई। उन्होंने विश्वविद्यालयों में वर्षों से मौजूद शोध, दस्तावेज और आंकड़ों को एआई के प्रशिक्षण में इस्तेमाल करने की बात कही। उनका जोर इस बात पर रहा कि एआई को सहायक के रूप में विकसित किया जाए, निर्णय लेने वाले के रूप में नहीं।

विश्वविद्यालय बनें एआई समाधान के केंद्र

समापन सत्र में आनंदीबेन पटेल ने विश्वविद्यालयों से एआई के इस्तेमाल के साथ उसके विकास पर भी ध्यान देने को कहा। उनका संदेश स्पष्ट था कि प्रदेश को केवल एआई के उपभोक्ता तैयार करने के बजाय ऐसे विद्यार्थी और संस्थान तैयार करने होंगे, जो स्थानीय समस्याओं के लिए उपयोगी तकनीकी समाधान विकसित कर सकें।

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