- कभी गांव का निर्विरोध मुखिया चुना गया, फिर बना TPC का कमांडर; झारखंड सरकार ने 25 लाख और NIA ने पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था, वाराणसी में ATS मुठभेड़ में हुई मौत
भारत 19
30 लाख रुपये का इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता आखिर कौन था? उसकी कहानी झारखंड के एक गांव से शुरू होकर प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) के कमांडर और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के वांछित आरोपी तक पहुंची। 20 सितंबर 2026 को वाराणसी के रामनगर में यूपी एटीएस के साथ मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उसके खिलाफ हत्या, अपहरण, रंगदारी, हथियार, विस्फोटक और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े करीब 39 मामले दर्ज थे।
गांव का मुखिया, फिर नक्सली कमांडर
बृजेश गंझू झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र का रहने वाला था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके खिलाफ दर्ज मामलों का सिलसिला 1996 से मिलता है। समय के साथ उसका नाम हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, रंगदारी, धमकी, हथियार और अन्य गंभीर मामलों से जुड़ता गया। लेकिन उसकी कहानी का एक अलग पहलू भी है। वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया चुना गया था। इसके बाद भी उसका नाम उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में सामने आता रहा। यही वह दौर था जब उसकी पहचान गांव के निर्विरोध मुखिया से आगे बढ़कर सुरक्षा एजेंसियों की निगाह में आए एक प्रमुख उग्रवादी के रूप में बनने लगी।
2004 में TPC से जुड़ी नई पहचान
रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 2004 के आसपास बृजेश गंझू ने माओवादी संगठन से अलग होकर एक समानांतर संगठन खड़ा किया, जिसे बाद में तृतीय प्रस्तुति कमेटी यानी TPC के नाम से जाना गया। झारखंड के चतरा, हजारीबाग, रांची, रामगढ़, लातेहार और पलामू समेत कई इलाकों में संगठन की गतिविधियां बताई गईं। TPC और भाकपा माओवादी के बीच इलाके में वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी हुआ। बृजेश को TPC के प्रमुख कमांडरों में गिना गया। पुलिस और जांच एजेंसियों के अनुसार संगठन पर लेवी वसूली और हिंसक घटनाओं में शामिल होने के आरोप लगे।
कोयला कारोबार से जुड़ी लेवी में आया नाम
बृजेश का नाम झारखंड के टंडवा क्षेत्र के अम्रपाली-मगध कोयला प्रोजेक्ट से जुड़े लेवी मामले में भी सामने आया। जांच एजेंसियों के आरोपों के मुताबिक TPC से जुड़े लोग कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और ठेकेदारों से लेवी वसूलते थे। झारखंड हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज मामले के अनुसार, जांच एजेंसी ने कथित लेवी नेटवर्क और उससे जुड़े धन के प्रवाह की जांच की थी। बृजेश गंझू को इस मामले में फरार आरोपियों में शामिल किया गया था। ये आरोप संबंधित आपराधिक मामलों और जांच रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
टेरर फंडिंग केस में NIA तक पहुंचा मामला
टंडवा मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के पास पहुंचा। NIA की जांच में कथित लेवी और उग्रवादी संगठन तक धन पहुंचने के आरोपों की पड़ताल की गई। NIA की मोस्ट-वांटेड सूची में Gopal Singh Bhokta उर्फ Brijesh Ganjhu का नाम दर्ज था। एजेंसी के रिकॉर्ड में वह दो मामलों—RC-06/2018/NIA/DLI और RC-22/2018/NIA/DLI—में वांछित बताया गया था। यहीं से बृजेश का मामला स्थानीय आपराधिक गतिविधियों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय जांच एजेंसी की जांच के दायरे में आ गया।
30 लाख का इनाम कैसे हुआ?
बृजेश गंझू पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इसमें झारखंड सरकार की ओर से 25 लाख रुपये और NIA की ओर से पांच लाख रुपये शामिल थे। लंबे समय तक गिरफ्तारी से बाहर रहने के कारण वह सुरक्षा एजेंसियों की तलाश में रहा। पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों में उसके कई नाम और उपनाम भी सामने आते रहे, जिनमें गोपाल सिंह भोक्ता और बृजेश गंझू प्रमुख हैं।
वाराणसी में कैसे पहुंचा 30 लाख का इनामी?
20 सितंबर की सुबह उसकी तलाश का अंत वाराणसी में हुआ। पुलिस के मुताबिक, एटीएस को सूचना मिली थी कि बृजेश एक साथी के साथ बाइक से जा रहा है। रामनगर थाना क्षेत्र में एटीएस और स्थानीय पुलिस ने उसे रोकने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार, बृजेश ने टीम पर फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी। घायल अवस्था में उसे लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पुलिस के मुताबिक, मुठभेड़ के दौरान एटीएस के डीएसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी गोलियां लगीं। पुलिस ने मौके से हथियार बरामद किए जाने की बात भी कही है।
वाराणसी क्यों आया था बृजेश?
बृजेश झारखंड का रहने वाला था और उसकी गतिविधियों का प्रमुख क्षेत्र भी वहीं रहा। ऐसे में वाराणसी में उसकी मौजूदगी अब जांच का अहम हिस्सा है। वह वाराणसी क्यों आया था? यहां उसका किससे संपर्क था? क्या पूर्वांचल में उसका कोई नेटवर्क था? उसके साथ मौजूद व्यक्ति की भूमिका क्या थी? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आने बाकी हैं। एक गांव के निर्विरोध मुखिया से लेकर 30 लाख रुपये के इनामी TPC कमांडर और NIA के वांछित आरोपी तक बृजेश गंझू का सफर करीब तीन दशक तक फैले मामलों और जांच का हिस्सा रहा। वाराणसी में हुई मुठभेड़ के साथ उसकी कहानी का अंत हुआ, लेकिन उसके कथित नेटवर्क और वाराणसी कनेक्शन की जांच अभी जारी है।


