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तावड़े के “नायबों” के लिए चुनौती होगी यूपी की अबूझ सियासत

  • चार सह-प्रभारियों में तीन पहली बार यूपी की चुनावी जिम्मेदारी में, जगदीश पटेल को 2024 वाराणसी का अनुभव

भारत 19

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए भाजपा ने प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े के साथ चार सह-प्रभारियों की टीम बनाई है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से 23 सितंबर को घोषित नई संगठनात्मक व्यवस्था में जगदीश पटेल, मेधा कुलकर्णी, प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा को यूपी का सह-प्रभारी बनाया गया है। इनमें जगदीश पटेल को 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी में चुनावी प्रबंधन का प्रत्यक्ष अनुभव है, जबकि मेधा कुलकर्णी, प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा के लिए यूपी में यह पहली प्रदेश स्तरीय चुनावी जिम्मेदारी है।

403 विधानसभा क्षेत्रों वाले उत्तर प्रदेश में इन चारों नेताओं के सामने अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक समीकरणों और स्थानीय संगठन की कार्यशैली को समझने की चुनौती होगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर ब्रज, अवध, बुंदेलखंड, काशी और पूर्वांचल तक सामाजिक समीकरणों के साथ स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी और संगठन की स्थिति भी चुनावी रणनीति को प्रभावित करते हैं।

चारों सह-प्रभारियों का अलग-अलग अनुभव

भाजपा ने यूपी के लिए ऐसी टीम बनाई है, जिसकी राजनीतिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि अलग-अलग राज्यों से आती है। गुजरात के जगदीश पटेल को वाराणसी का चुनावी अनुभव है, महाराष्ट्र की मेधा कुलकर्णी का आधार शहरी राजनीति, शिक्षा और महिला संगठन से जुड़ा रहा है। झारखंड के प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा के पास झारखंड के अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल में संगठनात्मक व चुनावी काम का अनुभव है। ऐसे में तावड़े के साथ इनकी भूमिका सिर्फ संगठनात्मक समन्वय तक सीमित नहीं होगी। अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक स्थिति को समझना, संगठन की तैयारियों का फीडबैक लेना और चुनावी गतिविधियों को प्रदेश स्तर पर समन्वित करना इनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

वाराणसी के अनुभव के साथ जगदीश पटेल

गुजरात के जगदीश पटेल इस टीम में ऐसे नेता हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश में 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव मिला है। वह वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान से जुड़ी कोर टीम का हिस्सा रहे थे। पटेल अमराईवाड़ी से विधायक रह चुके हैं और गुजरात भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वाराणसी में चुनावी प्रबंधन से जुड़े उनके अनुभव की वजह से उन्हें उत्तर प्रदेश की चुनावी मशीनरी और स्थानीय संगठनात्मक कामकाज का परिचय बाकी तीन सह-प्रभारियों की तुलना में पहले से है। यूपी की जिम्मेदारी मिलने से पहले भी पटेल का संगठनात्मक अनुभव गुजरात के अलग-अलग क्षेत्रों में रहा है। ऐसे में उनके सामने अपने पुराने अनुभव को प्रदेश के दूसरे हिस्सों की परिस्थितियों से जोड़ने की जिम्मेदारी होगी।

मेधा कुलकर्णी के पास शहरी राजनीति का अनुभव

महाराष्ट्र से आने वाली डॉ. मेधा कुलकर्णी राज्यसभा सदस्य हैं। वह पुणे के कोथरूड से भाजपा विधायक रह चुकी हैं और पुणे नगर निगम में पार्षद भी रही हैं। 2024 में वह महाराष्ट्र से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुईं। कुलकर्णी का राजनीतिक अनुभव शहरी संगठन, शिक्षा और महिला संगठन से भी जुड़ा रहा है। वह भाजपा महिला मोर्चा में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका अनुभव रहा है। उत्तर प्रदेश में उन्हें पहली बार इस स्तर की चुनावी जिम्मेदारी मिली है। ऐसे में महाराष्ट्र की शहरी राजनीति और संगठनात्मक अनुभव को यूपी के अलग-अलग क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों से जोड़ना उनके सामने महत्वपूर्ण काम होगा।

प्रदीप वर्मा के पास कई राज्यों का चुनावी अनुभव

झारखंड से राज्यसभा सदस्य डॉ. प्रदीप वर्मा भाजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं। झारखंड भाजपा में वह प्रदेश उपाध्यक्ष और महामंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। संगठन में सक्रिय भूमिका के चलते उन्हें झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों में भी चुनावी जिम्मेदारियां मिलती रही हैं। उनका अनुभव झारखंड के साथ बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावी क्षेत्रों से भी जुड़ा रहा है। ऐसे में अलग-अलग राज्यों में संगठन और चुनावी गतिविधियों के समन्वय का अनुभव उनके साथ है। हालांकि उत्तर प्रदेश में यह उनकी पहली प्रदेश स्तरीय चुनावी जिम्मेदारी है। देश के सबसे बड़े विधानसभा वाले राज्य में क्षेत्रवार सामाजिक समीकरण, स्थानीय संगठन और विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां उनके लिए नया कार्यक्षेत्र होंगी।

अनंत ओझा के पास जमीनी संगठन का अनुभव

झारखंड के पूर्व विधायक अनंत ओझा भी तावड़े की टीम में जमीनी संगठन के अनुभव के साथ आए हैं। वह राजमहल विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके हैं। उनका राजनीतिक सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा है और उन्हें बिहार तथा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिल चुकी हैं। ओझा का अनुभव मुख्य रूप से कार्यकर्ताओं के साथ सीधे काम करने, संगठन को सक्रिय करने और चुनावी क्षेत्रों में पार्टी की गतिविधियों के संचालन से जुड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश में उन्हें पहली बार प्रदेश स्तरीय चुनावी जिम्मेदारी मिली है। ऐसे में झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के संगठनात्मक अनुभव को उत्तर प्रदेश की अलग सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना उनके सामने महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

यूपी में क्षेत्र बदलते ही बदलते हैं सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर ब्रज, अवध, बुंदेलखंड, काशी और पूर्वांचल तक सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों में अंतर है। एक ही सामाजिक समूह की राजनीतिक भूमिका भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है। इसके साथ स्थानीय प्रत्याशी, संगठन की स्थिति, क्षेत्रीय मुद्दे और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल भी चुनावी रणनीति को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि यूपी में पहली बार इस स्तर की जिम्मेदारी संभाल रहे तीन सह-प्रभारियों के लिए शुरुआती दौर में प्रदेश की जमीनी राजनीति को समझना अहम होगा। क्षेत्रवार दौरे और स्थानीय संगठन के साथ लगातार संवाद उनके बाहरी चुनावी अनुभव को यूपी की स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ने में भूमिका निभा सकते हैं।

तावड़े के साथ संगठन और चुनावी तैयारी पर नजर

तावड़े के साथ चारों सह-प्रभारियों की टीम की जिम्मेदारी प्रदेश संगठन के साथ समन्वय, चुनावी तैयारियों की निगरानी और अलग-अलग क्षेत्रों की राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी जुटाने से जुड़ी होगी। इन गतिविधियों से मिलने वाला फीडबैक केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाना भी संगठनात्मक व्यवस्था का हिस्सा रहेगा। भाजपा की यह नई टीम ऐसे समय सक्रिय हुई है, जब 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश में संगठनात्मक तैयारियां तेज हो रही हैं। पार्टी ने हाल में प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिलों के लिए भी प्रभारी नियुक्त किए हैं, जिससे बूथ और जिला स्तर तक संगठनात्मक निगरानी की प्रक्रिया को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है।

बाहरी अनुभव को यूपी की जमीन से जोड़ना चुनौती

तावड़े के चारों सह-प्रभारियों की पृष्ठभूमि अलग-अलग राज्यों की है। जगदीश पटेल के पास गुजरात संगठन और वाराणसी का अनुभव है, मेधा कुलकर्णी महाराष्ट्र की शहरी राजनीति और महिला संगठन से आती हैं, प्रदीप वर्मा के पास झारखंड के साथ दूसरे राज्यों में चुनावी समन्वय का अनुभव है और अनंत ओझा के पास जमीनी संगठन का अनुभव है। अब चुनौती इन अलग-अलग अनुभवों को उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ने की है। 2027 के चुनावी मैदान में संगठन, क्षेत्रीय मुद्दों और सामाजिक समीकरणों की जानकारी के आधार पर तैयार होने वाला फीडबैक तावड़े की टीम के काम का अहम हिस्सा रहेगा।

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