- राम मंदिर की रसोई के सभी नमूने खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप; करीब दो महीने पहले लिए गए थे नमूने, एफएसएसएआई के ‘भोग प्रमाणन’ की प्रक्रिया आगे बढ़ी
भारत 19/ अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर में रामलला को चढ़ाए जाने वाले भोग प्रसाद की गुणवत्ता जांच में संतोषजनक पाई गई है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की जांच में मंदिर की रसोई के सभी नमूने निर्धारित मानकों के अनुरूप मिले हैं। इसके बाद अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को भोग प्रमाणपत्र दिए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। रिपोर्ट के मुताबिक, एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रजित पुन्हानी प्रमाणपत्र सौंप सकते हैं।
दो महीने पहले लिए गए थे नमूने
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, राम मंदिर की रसोई के भंडार गृह से करीब दो महीने पहले नमूने लिए गए थे। प्रयोगशाला जांच में इनके निर्धारित मानकों पर खरे उतरने की जानकारी सामने आई है। यह प्रक्रिया धार्मिक स्थलों पर प्रसाद और भोजन तैयार करने, रखने तथा श्रद्धालुओं को वितरित करने के दौरान खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जाती है।
सीता रसोई में तैयार होता है रामलला का भोग
रामजन्मभूमि परिसर स्थित सीता रसोई में रामलला के लिए प्रतिदिन भोग तैयार किया जाता है। विशेष अवसरों पर 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। एकादशी और कुछ विशेष तिथियों पर फलाहार की व्यवस्था रहती है। भोग अर्पित किए जाने के बाद प्रसाद मंदिर ट्रस्ट के कर्मचारियों, पुजारियों और श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।
क्या है एफएसएसएआई का भोग प्रमाणन?
एफएसएसएआई की ‘ब्लिसफुल हाइजीन ऑफ ऑफरिंग टू गॉड’ (BHOG) पहल का उद्देश्य धार्मिक स्थलों पर प्रसाद और भोजन की तैयारी व वितरण में स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा के मानकों को बढ़ावा देना है। इसके तहत रसोई की साफ-सफाई, खाद्य सामग्री और पानी के सुरक्षित इस्तेमाल, भंडारण तथा भोजन संभालने की प्रक्रियाओं की जांच की जाती है। खाद्य पदार्थ तैयार करने वाले कर्मचारियों की स्वच्छता और प्रशिक्षण पर भी ध्यान दिया जाता है।
राम मंदिर को प्रमाणपत्र जारी होने के बाद यह खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता के मानकों के पालन की दिशा में एक औपचारिक मान्यता होगी। हालांकि, नमूनों की जांच में सफल होना और प्रमाणपत्र का औपचारिक रूप से जारी होना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए प्रमाणपत्र जारी होने की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही इसे अंतिम उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना उचित होगा।


