Hot Topics

भाजपा में मेहनत का सबक, नए चेहरों को सीधे टिकट

  • कानपुर में 2027 से पहले संगठन की सक्रियता पर जोर, शंकर लाल लोधी के संदेश के बीच 2017-22 के टिकटों का रिकॉर्ड फिर चर्चा में; कार्यकर्ताओं में संगठनात्मक मेहनत और उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल

भारत 19

राजीव सक्सेना, कानपुर। भाजपा में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच संगठन और टिकट की राजनीति को लेकर कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में एक पुरानी बहस फिर सामने आ गई है। बुधवार को कानपुर उत्तर जिला कार्यालय में क्षेत्रीय प्रभारी और प्रदेश महामंत्री शंकर लाल लोधी ने कार्यकर्ताओं को सक्रियता का संदेश देते हुए कहा कि पार्टी में पद या सदस्यता से ज्यादा महत्वपूर्ण संगठन के लिए जमीन पर काम करना है। उनका संदेश था—जो काम करेगा, उसे काम मिलेगा और जो काम नहीं करेगा, उसे विश्राम दिया जाएगा।

संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने का यह संदेश पार्टी की चुनावी तैयारी के लिहाज से स्पष्ट है। लेकिन बैठक के बाद भाजपा के कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच इसकी दूसरी व्याख्या भी शुरू हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि संगठन में लगातार मेहनत करना राजनीतिक जिम्मेदारी और टिकट पाने की महत्वपूर्ण कसौटी है, तो पिछले चुनावों में ऐसे चेहरों को टिकट मिलने की घटनाओं को कैसे देखा जाए, जो भाजपा में चुनाव से ठीक पहले शामिल हुए या पहली बार राजनीति में आए थे। यही विरोधाभास अब 2027 की टिकट चर्चा के साथ जुड़ गया है।

संगठन में मेहनत को टिकट की कसौटी बताया गया

लोधी ने बुधवार की बैठक में निष्क्रियता को लेकर कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि अब केवल पद या सदस्यता पर्याप्त नहीं होगी और संगठन के लिए जमीन पर काम करने वालों को ही आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। भाजपा के लिए यह संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संगठनात्मक अभियानों पर जोर दिया जा रहा है। क्षेत्रीय भाजपा नेतृत्व की हालिया बैठकों में भी बूथ समितियों और कार्यकर्ताओं की सक्रियता को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। लेकिन पार्टी के भीतर चर्चा यह है कि संगठन में काम करने की कसौटी टिकट वितरण में कितनी निरंतरता से लागू होगी।

राकेश सचान को भाजपा में आते ही मिला टिकट

2022 का भोगनीपुर विधानसभा चुनाव इस बहस का एक प्रमुख उदाहरण है। राकेश सचान कांग्रेस छोड़कर 27 जनवरी 2022 को भाजपा में शामिल हुए और अगले ही दिन भाजपा ने उन्हें भोगनीपुर से प्रत्याशी घोषित कर दिया। उस समय टिकट की घोषणा के बाद भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने प्रदेश सहप्रभारी के सामने विरोध भी किया था। सचान कोई नए राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे। वे पहले सपा और कांग्रेस से विधायक और सांसद रह चुके थे। सचान का मामला ‘नए राजनीतिज्ञ’ से अधिक दूसरे दल से आए स्थापित राजनीतिक चेहरे को तत्काल भाजपा टिकट मिलने का उदाहरण है। कार्यकर्ताओं की मौजूदा चर्चा में यही अंतर महत्वपूर्ण है—एक तरफ वर्षों से संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ताओं से बूथ और मंडल स्तर की सक्रियता का हिसाब मांगा जा रहा है, दूसरी तरफ अतीत में दूसरे दलों से आए स्थापित नेताओं को पार्टी में प्रवेश के तुरंत बाद चुनावी अवसर मिले हैं।

असीम अरुण राजनीति में आए और सीधे चुनाव मैदान में

2022 में दूसरा उदाहरण पूर्व आईपीएस अधिकारी असीम अरुण का है। उन्होंने पुलिस सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और 16 जनवरी 2022 को भाजपा में शामिल हुए। इसके कुछ ही दिनों बाद भाजपा ने उन्हें कन्नौज सदर से विधानसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया। असीम अरुण पहली बार सक्रिय चुनावी राजनीति में आए थे। भाजपा ने उन्हें कन्नौज सदर जैसी सीट से प्रत्याशी बनाया, जहां पार्टी ने लंबे समय से स्थानीय राजनीतिक चेहरों के साथ चुनाव लड़ा था। उस समय भी उनकी उम्मीदवारी को भाजपा का नया प्रयोग बताया गया था। बाद में असीम अरुण ने कन्नौज सदर सीट जीत ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2022 के चुनाव रिकॉर्ड में भी उनका नाम प्रत्याशी के रूप में दर्ज है।

2017 में भी दलबदल कर आए नेताओं को टिकट

यह स्थिति केवल 2022 तक सीमित नहीं रही। 2017 के विधानसभा चुनाव में कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की कई सीटों पर दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं को टिकट दिया गया था। अमर उजाला की चुनावी रिपोर्ट के अनुसार मथुरा पाल, निर्मला संखवार, प्रतिभा शुक्ला, बीके कटियार, भगवती सागर, महेश त्रिवेदी, बृजेश प्रजापति, प्रकाश द्विवेदी, विनय शाक्य, नागेंद्र सिंह और कैलाश राजपूत जैसे नेता बसपा से भाजपा में आए और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। इनमें से कई चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसलिए 2017 का रिकॉर्ड भी यह दिखाता है कि भाजपा ने अलग-अलग चुनावी परिस्थितियों में संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ दूसरे दलों से आए नेताओं को भी टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा।

बिठूर में सांगा के टिकट पर हुआ था विरोध

कानपुर की बिठूर सीट का 2017 का उदाहरण इस बहस को और स्थानीय संदर्भ देता है। अभिजीत सिंह सांगा कांग्रेस छोड़कर जनवरी 2017 में भाजपा में शामिल हुए थे। इसके बाद उनके खिलाफ भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया था। उस समय कार्यकर्ताओं की आपत्ति थी कि वे वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं और बाहर से आए नेता को शामिल कर टिकट देने की तैयारी की जा रही है। बाद में सांगा भाजपा के टिकट पर बिठूर से चुनाव जीते और 2022 में भी सीट बरकरार रखी। उत्तर प्रदेश विधानसभा के रिकॉर्ड में उनकी पहली जीत 2017 में दर्ज है। इस मामले में भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सांगा पहले से राजनीतिक रूप से सक्रिय थे और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर बिठूर से चुनाव लड़ चुके थे। इसलिए उन्हें ‘नए राजनीति में आए व्यक्ति’ के बजाय दूसरे दल से भाजपा में आए राजनीतिक चेहरे के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।

नई क्षेत्रीय कमेटी पर भी कार्यकर्ताओं की नजर

टिकट के साथ संगठन में पदों का बंटवारा भी कार्यकर्ताओं की चर्चा का हिस्सा है। हाल में घोषित कानपुर क्षेत्र की नई कार्यकारिणी में 38 पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। इनमें 10 उपाध्यक्ष, चार महामंत्री, 10 मंत्री और 14 सदस्य शामिल हैं। आदित्य त्रिवेदी, आनंद सिंह, शिव सिंह भारती और राजेश पटेल को क्षेत्रीय महामंत्री तथा नीतू सिंह समेत 10 नेताओं को क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। ऐसे में कार्यकर्ताओं के बीच सवाल सिर्फ टिकट तक सीमित नहीं है। संगठन में पद और चुनावी उम्मीदवार तय करने के लिए सक्रियता, लंबे समय की संगठनात्मक भूमिका, सामाजिक प्रभाव और चुनावी क्षमता में किसे कितना महत्व मिलेगा, यह भी चर्चा का विषय बन गया है।

2027 से पहले संगठन और टिकट के बीच बढ़ी चर्चा

भाजपा कार्यकर्ताओं से संगठन में मेहनत करने की अपेक्षा कर रही है। यह पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक अभियान का हिस्सा है। लेकिन 2017 और 2022 के चुनावी रिकॉर्ड में ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं, जहां दूसरे दलों से आए स्थापित नेताओं या पहली बार चुनावी राजनीति में उतरे चेहरों को भाजपा ने सीधे विधानसभा चुनाव में उतारा। इसलिए बुधवार की बैठक के बाद कानपुर भाजपा में चर्चा का केंद्र केवल “काम करेगा तो काम मिलेगा” वाला संदेश नहीं है। उसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया है कि 2027 में टिकट तय करते समय संगठन में लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं और नए राजनीतिक चेहरों के बीच भाजपा किस तरह संतुलन बनाएगी। यही सवाल आने वाले महीनों में टिकट की दावेदारी तेज होने के साथ और महत्वपूर्ण होने वाला है।

Tags :

Bharat 19 News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News