Hot Topics

ब्राह्मणों को पांच टिकट, नाराजगी पर मरहम लगा रही भाजपा!

शिक्षक-कर्मचारी राजनीति से जुड़े चेहरों को भी तरजीह; 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों और शिक्षक वर्ग के बीच राजनीतिक संपर्क मजबूत करने की कोशिश

भारत 19

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने विधान परिषद की 11 सीटों के लिए प्रत्याशियों के चयन में एक साथ कई समीकरण साधने की कोशिश की है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा पांच ब्राह्मण चेहरों को टिकट दिए जाने की है। पार्टी ने इसके साथ शिक्षक और कर्मचारी संगठनों से जुड़े नेताओं को भी मैदान में उतारा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा एमएलसी चुनाव के जरिए ब्राह्मण समाज के बीच चल रही नाराजगी की चर्चाओं पर मरहम लगाने की कोशिश कर रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ समय से विपक्ष लगातार यह नैरेटिव आगे बढ़ाता रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षत्रिय होने के कारण भाजपा सरकार में ब्राह्मणों को अपेक्षित राजनीतिक महत्व नहीं मिल रहा। भाजपा इस आरोप को कभी स्वीकार नहीं करती, लेकिन पार्टी के भीतर भी ब्राह्मण नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच कथित उपेक्षा को लेकर चर्चाएं सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में एमएलसी चुनाव की सूची में पांच ब्राह्मण चेहरों की मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चा को नया आधार दे दिया है।

पांच ब्राह्मण चेहरों पर भाजपा का भरोसा

भाजपा ने लखनऊ शिक्षक सीट से उमेश द्विवेदी, मेरठ-सहारनपुर शिक्षक सीट से श्रीचंद शर्मा, वाराणसी शिक्षक सीट से प्रमोद मिश्रा, आगरा शिक्षक सीट से हरिकिशोर तिवारी और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से ध्रुव कुमार त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों में इन पांचों को ब्राह्मण चेहरे के रूप में बताया गया है। इनमें उमेश द्विवेदी और श्रीचंद शर्मा पहले से भाजपा के विधान परिषद सदस्य हैं। वहीं प्रमोद मिश्रा, हरिकिशोर तिवारी और ध्रुव कुमार त्रिपाठी की पहचान शिक्षक या कर्मचारी संगठनों से जुड़ी रही है। यानी टिकटों में केवल जातीय प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि संबंधित वर्गों के बीच इन चेहरों का अपना प्रभाव और संपर्क भी दिखाई देता है।

नाराजगी की चर्चा के बीच आया टिकट फैसला

ब्राह्मण समाज में कथित उपेक्षा का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। विपक्ष समय-समय पर इसे उठाता रहा है। भाजपा के भीतर भी ब्राह्मण नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच इस वर्ग को लेकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चर्चा होती रही है। ऐसे में पांच ब्राह्मण चेहरों को एक साथ टिकट मिलना सामान्य टिकट वितरण से अलग राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर इसलिए कि इनमें से ज्यादातर उम्मीदवार शिक्षक या कर्मचारी राजनीति से जुड़े हैं और अपने-अपने वर्ग में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। हालांकि पार्टी की ओर से यह नहीं कहा गया है कि टिकट वितरण का उद्देश्य ब्राह्मण नाराजगी दूर करना है। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, चुनावी उपयोगिता और संगठनात्मक संपर्क भी टिकट के आधार रहे होंगे।

UGC विवाद ने भी बढ़ाई सामान्य वर्ग की चर्चा

इस राजनीतिक पृष्ठभूमि में UGC के 2026 के इक्विटी रेगुलेशन का विवाद भी महत्वपूर्ण है। नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर सामान्य वर्ग से जुड़े संगठनों और याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में 2026 के नियमों पर रोक लगा दी थी। बाद में केंद्र ने अदालत को बताया कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार कर रहा है। इस मुद्दे को लेकर सामान्य वर्ग के संगठनों की ओर से विरोध भी सामने आया। इस विवाद ने आरक्षण, जातीय भेदभाव और सामान्य वर्ग के अधिकारों से जुड़े सवालों को फिर राजनीतिक चर्चा में ला दिया। ऐसे समय में भाजपा की एमएलसी सूची में पांच ब्राह्मण चेहरों को जगह मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।

ब्राह्मणों के साथ शिक्षक-कर्मचारी वर्ग भी

भाजपा की रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू शिक्षक और कर्मचारी राजनीति है। विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों पर मतदाता सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। ऐसे में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान और पेशेवर संगठनों में उसका नेटवर्क महत्वपूर्ण हो जाता है। ध्रुव कुमार त्रिपाठी की पहचान लंबे समय से शिक्षक राजनीति से जुड़ी रही है। हरिकिशोर तिवारी कर्मचारी संगठनों में सक्रिय रहे हैं। प्रमोद मिश्रा भी शिक्षक संगठन से जुड़े रहे हैं। इस तरह भाजपा ने एक ही सूची में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और शिक्षक-कर्मचारी नेटवर्क, दोनों को साधने की कोशिश की है।

एमएलसी चुनाव में व्यक्तिगत नेटवर्क का महत्व

विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ कई बार चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षक संगठनों से जुड़े नेताओं के पास पहले से तैयार सामाजिक और पेशेवर संपर्क का नेटवर्क होता है। इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट से अशोक कुमार राठौर को टिकट दिया जाना भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वह वित्तविहीन शिक्षकों से जुड़े रहे हैं और बाद में भाजपा में शामिल हुए थे। यानी पार्टी ने इस चुनाव में केवल पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग सामाजिक और पेशेवर नेटवर्क वाले चेहरों को भी मैदान में उतारा है।

2027 से पहले संदेश साधने की कोशिश

एमएलसी चुनाव की यह सूची ऐसे समय आई है जब भाजपा 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी है। विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण, शिक्षक, कर्मचारी, युवा, व्यापारी और अन्य पेशेवर वर्गों का राजनीतिक महत्व रहता है। ऐसे में विधान परिषद चुनाव के लिए प्रत्याशियों का चयन पार्टी के लिए इन वर्गों के बीच अपना संपर्क परखने का भी मौका है। पांच ब्राह्मण प्रत्याशियों के जरिए जहां प्रतिनिधित्व का संदेश जाता है, वहीं शिक्षक और कर्मचारी राजनीति से जुड़े चेहरों के जरिए संबंधित वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश दिखाई देती है।

अब देखना होगा मरहम कितना असरदार

विधान परिषद की 11 सीटों में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र हैं। इन सीटों पर मतदान 23 अक्टूबर को और मतगणना 27 अक्टूबर को प्रस्तावित है। चुनाव परिणाम से यह भी पता चलेगा कि उम्मीदवारों की सामाजिक पहचान और व्यक्तिगत नेटवर्क कितने प्रभावी रहे। लेकिन राजनीतिक तौर पर भाजपा की सूची ने इससे पहले ही एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या पांच ब्राह्मण टिकट 2027 से पहले पार्टी और ब्राह्मण समाज के बीच बन रही कथित दूरी को कम करने की दिशा में पहला बड़ा संकेत है? यही सवाल अब एमएलसी चुनाव के साथ-साथ भाजपा की 2027 की सामाजिक रणनीति को भी चर्चा के केंद्र में रखेगा।

Tags :

Bharat 19 News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News