- सज्जाद नोमानी और महमूद मदनी के बाद अब खालिद रशीद फिरंगी महली को लेकर विवाद; यूपी में मुस्लिम नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भूमिका पर बहस तेज
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व यानी ‘मुस्लिम कयादत’ को लेकर बहस तेज हो गई है। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की प्रदेश में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के बीच कुछ प्रमुख उलेमा की टिप्पणियों को लेकर पार्टी समर्थकों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ताजा विवाद लखनऊ के इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और सुन्नी धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली को लेकर है। इससे पहले सज्जाद नोमानी और महमूद मदनी को लेकर भी ओवैसी समर्थकों की ओर से आपत्तियां सामने आ चुकी हैं।
ताजा विवाद की पृष्ठभूमि: 24 सितंबर को खालिद रशीद फिरंगी महली ने यूपी चुनाव से पहले धार्मिक आधार पर बयानबाजी से बचने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुसलमान राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और यहां मुस्लिम सांसद तथा विधायक मौजूद हैं। उनके मुताबिक ऐसे में यह कहना उचित नहीं है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व नहीं है। उन्होंने राजनीतिक दलों से विकास और दूसरे मुद्दों पर चुनाव लड़ने की बात भी कही। इसके बाद एआईएमआईएम से जुड़े नेता मुफ्ती मोहम्मद ओसामा नदवी की ओर से प्रतिक्रिया आई। उन्होंने कहा कि पार्टी उलेमा का सम्मान करती है, लेकिन ओवैसी की राजनीति पर सवाल उठाने वाले राजनीतिक या ‘सरकारी’ मौलानाओं की आलोचना भी की जाएगी।
मुस्लिम कयादत की बहस का केंद्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व
विवाद का एक अहम पहलू धार्मिक नेतृत्व और चुनावी राजनीतिक नेतृत्व के बीच भूमिका का अंतर है। उलेमा और मुस्लिम धार्मिक-सामाजिक संगठन लंबे समय से धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानून, मस्जिदों, मदरसों और समुदाय से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखते रहे हैं। दूसरी ओर एआईएमआईएम चुनावी राजनीति के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने और अपनी पार्टी को एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। यही अंतर कई मौकों पर सार्वजनिक मतभेद का आधार बनता दिखाई देता है। जब कोई धर्मगुरु किसी चुनावी दल या नेता की रणनीति पर टिप्पणी करता है तो उसके जवाब में राजनीतिक समर्थकों की प्रतिक्रिया भी सामने आती है। मौजूदा विवाद को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
सज्जाद नोमानी को लेकर पहले भी हुआ विवाद
सज्जाद नोमानी का नाम भी इस बहस में पहले सामने आ चुका है। जून 2026 में उनके एक बयान को लेकर विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने भारत में हिंदुओं की बहुसंख्यक स्थिति पर टिप्पणी की थी। उस बयान पर विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आईं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान भी नोमानी की ओर से कुछ उम्मीदवारों के समर्थन की अपील को लेकर एआईएमआईएम समर्थकों की आपत्ति की खबरें सामने आई थीं। उस समय भी सवाल मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक समर्थन और अलग-अलग राजनीतिक विकल्पों के बीच तालमेल को लेकर उठा था।
महमूद मदनी की भूमिका भी अलग राजनीतिक रास्ते पर
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी भी मुस्लिम राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व की बहस में महत्वपूर्ण नाम हैं। हालांकि उनकी भूमिका को केवल ओवैसी के विरोध तक सीमित करना सही नहीं होगा। 23 सितंबर 2026 को जमीयत की कार्यसमिति की बैठक में मदनी की अध्यक्षता में धार्मिक स्वतंत्रता, मस्जिदों, मदरसों और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संगठन की रणनीति तय की गई। मदनी की सार्वजनिक भूमिका का दायरा व्यापक सामाजिक और संवैधानिक मुद्दों तक फैला हुआ है। ओवैसी की चुनावी राजनीति और जमीयत की सामाजिक-संगठनात्मक भूमिका अलग-अलग राजनीतिक-सामाजिक रास्तों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
यूपी में ओवैसी का राजनीतिक अभियान तेज
मौजूदा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब एआईएमआईएम यूपी में अपना चुनावी अभियान तेज कर रही है। ओवैसी ने 20 सितंबर को कानपुर में जनसभा की थी और पार्टी की ओर से आगे श्रावस्ती तथा आजमगढ़ में भी कार्यक्रमों की घोषणा की गई है। जून से ओवैसी उत्तर प्रदेश में कई सार्वजनिक सभाएं कर चुके हैं और पार्टी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ा रही है। कानपुर की सभा में ओवैसी ने ये भी कहा था कि एआईएमआईएम कानपुर में विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार उतारेगी। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी यूपी में केवल सीमित राजनीतिक उपस्थिति तक नहीं रहना चाहती, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में अपना संगठन और चुनावी आधार बढ़ाने पर जोर दे रही है।
फिरंगी महली की अपील का राजनीतिक संदर्भ
खालिद रशीद फिरंगी महली की हालिया टिप्पणी को इसी चुनावी माहौल में देखा जा रहा है। उनका जोर धार्मिक आधार पर बयानबाजी से बचने और विकास जैसे मुद्दों पर चुनावी बहस केंद्रित करने पर रहा। उन्होंने यह भी कहा कि यूपी में मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व मौजूद है और समुदाय राजनीतिक रूप से जागरूक है। दूसरी ओर एआईएमआईएम की राजनीति का प्रमुख मुद्दा राजनीतिक प्रतिनिधित्व है। पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन के विस्तार के साथ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में चुनावी सक्रियता बढ़ा रही है। इसलिए किसी उलेमा की ओर से मुस्लिम नेतृत्व की स्थिति पर टिप्पणी होने पर उसे एआईएमआईएम समर्थक राजनीतिक नजरिए से अलग तरह से देखा जा रहा है।
विवाद में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम
पूरी बहस में सोशल मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है। नेताओं और उलेमा के बयानों के छोटे वीडियो क्लिप तेजी से प्रसारित होते हैं और उनके आधार पर समर्थक अपनी प्रतिक्रियाएं देते हैं। ऐसे में किसी बयान के पूरे संदर्भ और वक्ता की वास्तविक स्थिति को समझे बिना निकाले गए निष्कर्ष विवाद को और बढ़ा सकते हैं। मौजूदा विवाद में अलग-अलग पक्षों के मूल बयान, उनके संदर्भ और राजनीतिक भूमिका को अलग-अलग देखना जरूरी है। ओवैसी समर्थकों की आलोचना को पूरे मुस्लिम समाज या सभी उलेमा की राय मानना भी सही नहीं होगा।
2027 से पहले मुस्लिम नेतृत्व पर बहस तेज
यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व का सवाल आगे भी महत्वपूर्ण बना रह सकता है। एक तरफ एआईएमआईएम स्वतंत्र चुनावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात कर रही है, वहीं जमीयत जैसे संगठन और प्रमुख उलेमा सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक मुद्दों पर अपनी भूमिका निभा रहे हैं। मौजूदा घटनाक्रम से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मुस्लिम नेतृत्व को लेकर एक ही तरह की राजनीतिक-सामाजिक राय नहीं है। ओवैसी की चुनावी सक्रियता, उलेमा की अलग-अलग राजनीतिक टिप्पणियां और मुस्लिम संगठनों की सामाजिक भूमिका, इन तीनों के बीच अंतर ही इस नई बहस की प्रमुख वजह बन रहा है।


