- AI मंथन 2.0 में विशेषज्ञों ने बताया स्वास्थ्य सेवाओं में एआई का बढ़ता दायरा, एम्स-आईआईटी दिल्ली-आईआईएससी की तकनीक से ओरल कैंसर की शुरुआती स्क्रीनिंग, पैथोलॉजी और टीबी जांच में भी AI का इस्तेमाल
भारत 19
कानपुर। मुंह की एक तस्वीर अब ओरल कैंसर के संदिग्ध मामलों की शुरुआती पहचान में डॉक्टर की मदद कर सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तस्वीर में होने वाले असामान्य बदलावों का विश्लेषण कर संदिग्ध स्थिति की पहचान करेगा, जिसके आधार पर डॉक्टर आगे की जांच और उपचार तय कर सकेंगे। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित AI Manthan 2.0 में विशेषज्ञों ने बताया कि स्वास्थ्य क्षेत्र में AI की भूमिका केवल कैंसर स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं है। पैथोलॉजी की जांच, टीबी की शुरुआती पहचान, चिकित्सकीय आंकड़ों के विश्लेषण और मरीजों के फॉलो-अप में भी इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
मुंह की तस्वीर से शुरू होगी कैंसर स्क्रीनिंग
एम्स नई दिल्ली की ओरल पैथोलॉजिस्ट डॉ. दीपिका मिश्रा ने बताया कि एम्स ने आईआईटी दिल्ली और आईआईएससी बेंगलुरु के विशेषज्ञों के सहयोग से AI आधारित ओरल कैंसर स्क्रीनिंग तकनीक विकसित की है। इसमें मरीज के मुंह की तस्वीर लेकर सिस्टम उसका विश्लेषण करता है और संदिग्ध बदलावों की पहचान में चिकित्सक की मदद करता है। उन्होंने बताया कि देश में बड़ी संख्या में मरीज ओरल कैंसर की उन्नत अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में शुरुआती स्क्रीनिंग से संदिग्ध मामलों की समय रहते पहचान कर उन्हें आगे की चिकित्सकीय जांच तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है।
एआई बताएगा संदिग्ध स्थिति, फैसला डॉक्टर का
AI तस्वीर के आधार पर किसी बीमारी की अंतिम पुष्टि नहीं करता। संदिग्ध बदलाव मिलने के बाद डॉक्टर जरूरत के अनुसार आगे की जांच और उपचार का निर्णय लेते हैं। डॉ. मिश्रा ने भी स्पष्ट किया कि AI डॉक्टर का विकल्प नहीं, बल्कि चिकित्सकीय निर्णय में सहयोग देने वाला उपकरण है। तकनीक की क्षमता और सटीकता बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में मरीजों से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ओरल कैंसर की पहचान के लिए ऑप्टिकल उपकरण विकसित करने पर भी काम हुआ है।
आरोग्य आरोहण से स्क्रीनिंग से फॉलो-अप तक
डॉ. मिश्रा के मुताबिक ‘आरोग्य आरोहण’ ऐप को स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रखा गया है। इसमें जागरूकता, मरीजों का डेटा, उपचार और फॉलो-अप को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था है। इसका इस्तेमाल नौ से अधिक राज्यों में किया जा रहा है और अब तक 40 हजार से अधिक लोगों को इसके जरिए लाभ या उपचार मिलने की जानकारी दी गई। ओरल कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में तंबाकू सेवन को देखते हुए ‘आरोग्य संकल्प’ ऐप भी विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य तंबाकू छोड़ने की कोशिश कर रहे लोगों को मार्गदर्शन और लगातार सहायता उपलब्ध कराना है।
लार से कैंसर जांच की किट पर भी शोध
ओरल कैंसर की जांच को और आसान बनाने के लिए लार आधारित जांच किट विकसित करने पर भी शोध चल रहा है। आईआईएससी बेंगलुरु और एम्स इसके तकनीकी विकास पर काम कर रहे हैं। तस्वीर आधारित AI स्क्रीनिंग, ऑप्टिकल तकनीक और लार आधारित जांच को आगे बढ़ाने का उद्देश्य ऐसे विकल्प विकसित करना है, जिनसे संदिग्ध मामलों की पहचान ज्यादा सुलभ तरीके से हो सके।
महिलाओं में भी जागरूकता पर जोर
डॉ. मिश्रा ने महिलाओं में ओरल कैंसर को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने नियमित जांच और मुंह में लंबे समय से बने असामान्य बदलावों को नजरअंदाज नहीं करने पर जोर दिया। उनके मुताबिक शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान होने से मरीज को समय पर चिकित्सकीय जांच और उपचार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
पैथोलॉजी में एआई बढ़ाएगा जांच की रफ्तार
AI मंथन 2.0 के स्वास्थ्य सत्र में डॉ. आलोक शर्मा, डॉ. लाल पैथलैब्स, नई दिल्ली ने बताया कि जांचों और चिकित्सकीय आंकड़ों का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जबकि पैथोलॉजिस्ट की संख्या सीमित है। ऐसे में AI डिजिटल पैथोलॉजी, रक्त जांच और माइक्रोबायोलॉजी में जांच प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है। उनके मुताबिक CBC जांच में मशीन लर्निंग के इस्तेमाल से सत्यापन दर 69 से बढ़कर 98 प्रतिशत तक पहुंची है। डिजिटल पैथोलॉजी में AI आधारित कैंसर पहचान की संवेदनशीलता 96.3 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
टीबी की शुरुआती पहचान में भी मददगार
आईआईटी कानपुर के विनायक पाठक ने बताया कि AI स्वास्थ्य सेवाओं को दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में उपयोगी हो सकता है। डिजिटल एक्स-रे और AI स्कोर के जरिए टीबी के संदिग्ध मामलों की शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है। मोबाइल टीबी क्लिनिक में एक्स-रे, AI स्क्रीनिंग और बलगम जांच जैसी सुविधाओं को एक साथ उपलब्ध कराया जा सकता है। छोटे AI मॉडल मोबाइल उपकरणों पर भी चलाए जा सकते हैं, जिससे सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में स्क्रीनिंग की पहुंच बढ़ सकती है।
जनरेटिव एआई में सबसे जरूरी है तथ्य की जांच
डॉक्टर्स एआई एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के डॉ. अमित कुमार डे ने क्लिनिकल प्रैक्टिस में जनरेटिव AI के इस्तेमाल पर सावधानी बरतने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि बड़े भाषा मॉडल अगले शब्द का अनुमान लगाकर जवाब तैयार करते हैं। इसलिए उनकी धाराप्रवाह भाषा को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। डॉक्टर AI का इस्तेमाल सारांश तैयार करने, सामग्री व्यवस्थित करने और प्रारूप बनाने जैसे कामों में कर सकते हैं, लेकिन तथ्यों, दवाओं की खुराक और आंकड़ों का सत्यापन जरूरी है। अंतिम चिकित्सकीय निर्णय और कानूनी जिम्मेदारी डॉक्टर की ही रहेगी।
स्क्रीनिंग से डेटा तक बदल रही स्वास्थ्य व्यवस्था
विशेषज्ञों के मुताबिक AI का सबसे बड़ा उपयोग वहां है जहां बड़ी मात्रा में मेडिकल डेटा का विश्लेषण और शुरुआती स्तर पर संदिग्ध मामलों की पहचान करनी होती है। कैंसर स्क्रीनिंग से लेकर पैथोलॉजी और टीबी जांच तक इसका इस्तेमाल डॉक्टरों के काम को तेज और व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है। हालांकि तकनीक के विस्तार के साथ डेटा की गुणवत्ता, चिकित्सकीय सत्यापन, मरीजों की गोपनीयता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
जल्दी पहचान से बेहतर हो सकते हैं उपचार के नतीजे
ओरल कैंसर के मामले में AI आधारित तस्वीर विश्लेषण, ऑप्टिकल तकनीक और भविष्य में लार आधारित जांच जैसे विकल्प शुरुआती स्क्रीनिंग को आसान बना सकते हैं। वहीं पैथोलॉजी और टीबी जांच में AI बड़ी संख्या में मामलों की प्राथमिक स्क्रीनिंग में मदद कर सकता है। लेकिन इन सभी तकनीकों की भूमिका डॉक्टर तक पहुंचने का रास्ता आसान करने की है, अंतिम निदान करने की नहीं। विशेषज्ञों का जोर यही है कि AI की मदद से संदिग्ध मामलों की पहचान जल्द हो, मरीज समय पर अस्पताल पहुंचे और चिकित्सकीय जांच व उपचार में देरी कम की जा सके।


