- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द कर पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था; रकम डीएम मेधा रूपम समेत जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने को कहा था
भारत 19
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की NSA हिरासत के मामले में नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति की हिरासत रद्द करते हुए पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया था। अदालत ने यह रकम डीएम मेधा रूपम और मामले में जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया था। अब हाईकोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का रास्ता खुल गया है।
हाईकोर्ट ने NSA हिरासत को माना था गलत
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए 2 सितंबर को NSA के तहत उनकी हिरासत रद्द कर दी थी। विस्तृत आदेश में अदालत ने हिरासत के आधार को “मनमाना और अस्पष्ट” बताते हुए कहा था कि इसे पर्याप्त सामग्री और उचित विचार के बिना लागू किया गया। अदालत के मुताबिक NSA जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल केवल अनुमान, राय या आशंकाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। हिरासत के आधार के समर्थन में ठोस सामग्री होना जरूरी है।
पांच लाख मुआवजे की वसूली ने बढ़ाया मामला
हाईकोर्ट ने आकृति को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि यह राशि डीएम मेधा रूपम के वेतन और हिरासत की कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों से वसूली जाए, जिसमें संबंधित थाने के एसएचओ तक की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई थी। अदालत ने डीएम और पुलिस अधिकारियों के प्रति अपनी नाराजगी को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का भी निर्देश दिया था। यही आदेश अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का प्रमुख हिस्सा है।
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए थे सवाल
हाईकोर्ट ने सिर्फ NSA हिरासत पर सवाल नहीं उठाया था, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों के काम करने के तरीके पर भी गंभीर टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि अधिकारियों को नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा करते हुए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। पीठ ने चेताया था कि अधिकारियों और पुलिस की शक्ति का मनमाना इस्तेमाल उत्तर प्रदेश को “Orwellian Dystopia” की ओर ले जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा था कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए।
श्रमिक प्रदर्शन के बाद आकृति पर लगा था NSA
आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई को उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत का आदेश जारी किया। आकृति ने इस हिरासत को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि राज्य की ओर से पेश सामग्री में ऐसा ठोस आधार नहीं दिखाया गया जिससे यह साबित हो कि आकृति ने हिंसा, आगजनी या सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए लोगों को उकसाया था।
NSA को सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं माना
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक अहम कानूनी सिद्धांत भी दोहराया कि NSA जैसी निवारक हिरासत सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं हो सकती। अदालत के मुताबिक केवल संभावित कानून-व्यवस्था की आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति को इतने कठोर कानून के तहत लगातार हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी मांगों के लिए सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होने के अधिकार को भी संविधान में मिले अधिकारों के संदर्भ में देखा था।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ चुनौती का संकेत पहले ही
सुप्रीम कोर्ट में 9 सितंबर को हुई एक अलग सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संकेत दिया था कि आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने वाले हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी जाएगी। उस समय यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि चुनौती किस पक्ष की ओर से दाखिल होगी। अब गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किए जाने की पुष्टि हुई है।
सुप्रीम कोर्ट में अब इन सवालों पर नजर
अब शीर्ष अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि क्या आकृति की NSA हिरासत के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद था और क्या हाईकोर्ट ने हिरासत रद्द करने तथा मुआवजे की वसूली का आदेश सही कानूनी आधार पर दिया। मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तक तय की थी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई सिर्फ आकृति की हिरासत तक सीमित न रहकर NSA के इस्तेमाल, प्रशासनिक विवेक और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी असर डाल सकती है।
NSA रद्द होने के बावजूद रिहाई अलग मामला
हाईकोर्ट द्वारा NSA हिरासत रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं था कि आकृति सभी मामलों से स्वत: मुक्त हो गईं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उनके खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े अन्य आपराधिक मामले भी हैं और उन मामलों में उनकी न्यायिक हिरासत की स्थिति अलग है।


