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यूपी में अब ऑनलाइन होगा जमीन का बंटवारा

  • सह-खातेदार धारा 116 के तहत ऑनलाइन दाखिल कर सकेंगे वाद; नोटिस, उद्घोषणा और लेखपाल की रिपोर्ट भी डिजिटल होगी, जीआईएस से नक्शे पर देख सकेंगे जमीन की स्थिति

भारत 19
लखनऊ। जमीन के बंटवारे के लिए सह-खातेदारों को अब राजस्व कार्यालयों की दौड़-भाग कुछ कम करनी होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व संहिता की धारा 116 के तहत जमीन के विभाजन की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जा रहा है। इसके लिए शुरू किए गए पोर्टल के जरिए सह-खातेदार ऑनलाइन वाद दाखिल कर सकेंगे। इसके बाद नोटिस और उद्घोषणा से लेकर लेखपाल की रिपोर्ट तक प्रक्रिया के कई चरण डिजिटल माध्यम से पूरे होंगे। इससे आवेदक को अपने मामले की प्रगति जानने के लिए बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम होगी।

तीन नए पोर्टल से डिजिटल होंगी राजस्व सेवाएं

राजस्व परिषद ने जमीन बंटवारे के साथ राजस्व सेवाओं से जुड़ी दो अन्य प्रक्रियाओं को भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की पहल की है। इसके तहत धारा 116 पोर्टल, ईडब्ल्यूएस पोर्टल और सरलीकृत खतौनी की सेवाएं शुरू की गई हैं। मकसद आवेदन और अभिलेख संबंधी प्रक्रिया को आसान बनाने के साथ उसकी ऑनलाइन निगरानी की सुविधा देना है।

सह-खातेदार ऑनलाइन दाखिल कर सकेंगे वाद

संयुक्त भूमि में हिस्सेदारी रखने वाला सह-खातेदार अपने हिस्से के विभाजन के लिए धारा 116 के तहत वाद दाखिल कर सकता है। अब इस प्रक्रिया की शुरुआत ऑनलाइन माध्यम से की जा सकेगी। आवेदन के दौरान संबंधित भूमि और सह-खातेदारों से जुड़ी आवश्यक जानकारी दर्ज करनी होगी। इसके बाद प्रकरण राजस्व न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा।

नोटिस और लेखपाल की रिपोर्ट भी डिजिटल

नई व्यवस्था का बदलाव केवल ऑनलाइन आवेदन तक सीमित नहीं है। वाद दाखिल होने के बाद नोटिस और उद्घोषणा की प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से की जाएगी। लेखपाल की रिपोर्ट भी पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी। इससे आवेदक को मामले में हुई कार्रवाई की जानकारी एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिल सकेगी।

जीआईएस से नक्शे पर दिखेगी जमीन

जमीन बंटवारे की प्रक्रिया में जीआईएस आधारित मैपिंग भी महत्वपूर्ण बदलाव है। पोर्टल के जरिए संबंधित भूमि की स्थिति डिजिटल नक्शे पर देखी जा सकेगी। इससे खसरा, खतौनी और नक्शे से जुड़ी जानकारी को एक साथ देखने और भूमि की पहचान करने में मदद मिलेगी।

तहसील की भागदौड़ घटाने पर जोर

भूमि विवाद और बंटवारे से जुड़े मामलों में लोगों को आवेदन से लेकर रिपोर्ट और दस्तावेजों के लिए कई बार राजस्व कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। डिजिटल प्रक्रिया का उद्देश्य इसी भागदौड़ को कम करना है। आवेदन और प्रकरण की प्रगति ऑनलाइन उपलब्ध होने से लोगों को हर छोटी जानकारी के लिए कार्यालय पर निर्भरता कम होगी।

प्रकरण की प्रगति ऑनलाइन देखना होगा आसान

डिजिटल व्यवस्था में आवेदन के बाद मामला किस स्तर पर है, इसकी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने पर जोर है। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिल सकती है। खासकर उन मामलों में यह उपयोगी होगा, जहां आवेदक को लंबे समय तक यह पता नहीं चल पाता कि उसका प्रकरण किस अधिकारी या स्तर पर लंबित है।

सरलीकृत खतौनी में रिकॉर्ड होगा स्पष्ट

नई डिजिटल पहल में सरलीकृत खतौनी को भी शामिल किया गया है। इसमें भूमि रिकॉर्ड को ज्यादा व्यवस्थित और स्पष्ट तरीके से उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। जमीन का क्षेत्रफल छह दशमलव स्थानों तक प्रदर्शित करने तथा पुराने आदेशों और बंधक संबंधी जानकारी को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का प्रावधान भी बताया गया है।

ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र की प्रक्रिया भी ऑनलाइन

तीसरे पोर्टल के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र से जुड़ी प्रक्रिया भी ऑनलाइन होगी। आवेदन की जांच में लेखपाल और तहसीलदार की रिपोर्ट डिजिटल माध्यम से भेजने तथा प्रकरण की प्रगति की निगरानी की सुविधा दी गई है। यानी नई पहल सिर्फ भूमि रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्व विभाग की नागरिक सेवाओं के दायरे को भी डिजिटल बना रही है।

कानूनी बंटवारा ऑनलाइन आवेदन से अलग

यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है कि ऑनलाइन आवेदन का मतलब पूरा जमीन बंटवारा घर बैठे हो जाना नहीं है। ऑनलाइन माध्यम से वाद दाखिल और प्रक्रिया से जुड़े चरण डिजिटल होंगे, लेकिन भूमि का वास्तविक विभाजन संबंधित राजस्व कानून और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ही होगा। सह-खातेदारों के बीच हिस्सेदारी या रिकॉर्ड को लेकर विवाद होने पर उसका निस्तारण भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होगा।

अब आवेदन से कार्रवाई तक डिजिटल रिकॉर्ड

इस बदलाव का सबसे बड़ा असर यह होगा कि जमीन बंटवारे से जुड़े मामलों में आवेदन, नोटिस, लेखपाल की रिपोर्ट और प्रकरण की प्रगति डिजिटल रिकॉर्ड का हिस्सा बनेंगे। इससे कागजी प्रक्रिया कम करने के साथ यह पता लगाना आसान होगा कि मामला किस स्तर पर है। हालांकि व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होगी, यह पोर्टल पर रिकॉर्ड अपडेट होने की गति और तहसील स्तर पर इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

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