- एआई मंथन-2.0 में शिक्षा, कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र-विशिष्ट इस्तेमाल सामने आए; परीक्षा में रटने की जगह तर्क-कौशल, खेत में फसल रोग की पहचान से लेकर स्वास्थ्य में शुरुआती जांच तक एआई के इस्तेमाल पर जोर, 2031 तक पांच लाख युवाओं को एआई दक्ष बनाने का लक्ष्य
भारत 19
कानपुर। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब प्रयोगशालाओं और तकनीकी संस्थानों तक सीमित रहने वाली तकनीक नहीं रह गई है। उत्तर प्रदेश इसे पढ़ाई, खेती, स्वास्थ्य और शासन के रोजमर्रा के कामकाज से जोड़ने की तैयारी में है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में हुए एआई मंथन-2.0 में विशेषज्ञों ने इसके ऐसे इस्तेमाल सामने रखे, जो आने वाले वर्षों में लोगों के काम करने और फैसले लेने का तरीका बदल सकते हैं। कक्षा में रटने की जगह तर्क और कौशल आधारित मूल्यांकन, खेत में फसल की बीमारी की पहचान और मौसम आधारित सलाह तथा अस्पतालों में रोग की शुरुआती पहचान जैसे प्रयोग इसी बदलाव की दिशा दिखाते हैं।
कक्षा में बदलेगा पढ़ने और परीक्षा का तरीका
एआई के दौर में विद्यार्थियों को केवल जानकारी याद कराने वाली शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक परीक्षा में यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि विद्यार्थी सही-गलत में अंतर कर सकता है या नहीं, अपने निष्कर्ष के पीछे तर्क दे सकता है या नहीं और किसी समाधान का बचाव कर सकता है या नहीं। यानी याददाश्त और अंकों के बजाय तर्क, विवेक, आलोचनात्मक सोच और व्यावहारिक कौशल को ज्यादा महत्व देना होगा। आईआईटी मंडी के डॉ. आदित्य निगम ने भी कहा कि एआई के दौर में ज्ञान आसानी से उपलब्ध है, इसलिए चार वर्ष की बीटेक डिग्री पूरे करियर के लिए पर्याप्त नहीं होगी। विद्यार्थियों को लगातार नए कौशल सीखने होंगे। शिक्षक, विद्यार्थी और एआई के बीच सहयोग के साथ उद्योग से जुड़ी परियोजनाओं और हैकाथॉन जैसे व्यावहारिक तरीकों को भी महत्व देने की जरूरत होगी।

खेत में बीमारी बताएगा एआई, फैसला किसान करेगा
कृषि में एआई का इस्तेमाल अब सीधे खेत तक पहुंचने की दिशा में है। विशेषज्ञों ने फसल रोग की पहचान, फसल क्षति का आकलन, मौसम की जानकारी, सटीक खेती और जीन चयन में इसके इस्तेमाल की संभावनाएं बताईं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कृषि तकनीक को किसान-केंद्रित बनाने और मौसम, फसल निगरानी, बीज व कीटनाशकों की शुद्धता तथा फसल क्षति आकलन जैसी सुविधाओं को एक मंच पर उपलब्ध कराने पर जोर दिया। आईआईटी रोपड़ के डॉ. मुकेश कुमार सैनी ने स्वदेशी कृषि इंटेलिजेंस मंच का उदाहरण देते हुए बताया कि उसका कंप्यूटर विजन मॉडल 20 प्रमुख फसलों की पहचान तीन सेकंड में 99.8 प्रतिशत सटीकता से कर सकता है। ‘संकेत’ ऐप फसल की अवस्था, मौसम और क्षेत्र के आधार पर संभावित कीटों का अनुमान लगाने में मदद करता है।

किसान तक स्थानीय भाषा में पहुंचेगी सलाह
कृषि क्षेत्र में एआई की उपयोगिता केवल बीमारी पहचानने तक सीमित नहीं रहेगी। आईसीएआर के ‘किसान सारथी’ से 105 संस्थान और 4,819 वैज्ञानिक जुड़े हैं। कॉल सेंटर, एप और स्थानीय भाषाओं में सलाह के जरिए वैज्ञानिक जानकारी किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। एआई की मदद से सूखा और कीट प्रतिरोधी जीन की पहचान तथा फसल प्रजनन चक्र को छोटा करने पर भी काम हो रहा है। सेंसर, इंटरनेट आधारित उपकरण और ड्रोन के इस्तेमाल से संरक्षित खेती को ज्यादा प्रभावी बनाने की संभावनाएं भी विशेषज्ञों ने बताईं। अहम बात यह कि एआई किसान का विकल्प नहीं होगा; अंतिम फैसला किसान का ही रहेगा।
इलाज में डॉक्टर की मदद करेगा एआई
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई को डॉक्टर का विकल्प बनाने के बजाय निर्णय में सहायक तकनीक के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर है। मेडिकल इमेजिंग, कैंसर की शुरुआती पहचान और क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट में एआई की भूमिका बढ़ सकती है। फेडरेटेड लर्निंग और एजेंटिक एआई जैसी तकनीकों के जरिए मरीजों के डेटा की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के वर्कफ्लो को बेहतर करने की संभावनाएं भी सामने आईं।
स्थानीय जरूरतों के मुताबिक तैयार होगा एआई
एआई का अगला विस्तार केवल अंग्रेजी और बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय जरूरतों और भाषाओं के अनुरूप करने पर भी जोर है। आईआईटी खड़गपुर के प्रो. पार्थ प्रतिम चक्रवर्ती ने स्थानीय भाषाओं में हाइपर-लोकल कंटेंट, ‘कृषि मित्र’ और एआई ट्यूटर जैसी पहलों को महत्वपूर्ण बताया। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों तक उनकी जरूरत के मुताबिक एआई आधारित सेवाएं पहुंचाने की संभावना बढ़ेगी।
यूपी के 75 जिलों में बनेगा एआई इकोसिस्टम
एआई मंथन-2.0 में तकनीक के इस्तेमाल के साथ प्रदेश का बड़ा रोडमैप भी सामने आया। यूपी एआई मिशन के तहत अगले पांच वर्षों के लिए 2,000 करोड़ रुपये का प्रस्तावित फंड रखा गया है। 2031 तक प्रदेश के सभी 75 जिलों में एआई प्रतिभा, डेटा और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने का लक्ष्य है। इसके साथ पांच लाख युवाओं को एआई में दक्ष, 200 से अधिक हैंड्स-ऑन एआई लैब और 20 से ज्यादा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस विकसित करने की योजना है। करीब 56 लाख विद्यार्थी समर्थ रजिस्ट्री से जुड़े हैं। 39 राज्य विश्वविद्यालय और 96 से अधिक महाविद्यालय भी इससे जुड़े बताए गए हैं। ऐसे डिजिटल आधार को एआई आधारित उच्च शिक्षा व्यवस्था के अगले चरण के लिए उपयोगी आधार के रूप में देखा जा रहा है।
एआई के साथ बढ़ेंगी डेटा सुरक्षा की चुनौतियां
एआई जितना ज्यादा रोजमर्रा की व्यवस्थाओं में आएगा, उसके साथ जोखिम भी बढ़ेंगे। विशेषज्ञों ने साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, तकनीक के दुरुपयोग और एआई में मौजूद पूर्वाग्रह को बड़ी चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया। खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित डिजिटल ढांचे और जिम्मेदार उपयोग की व्यवस्था जरूरी होगी। सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों ने भी चेताया कि एआई को केवल तकनीकी उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। उसमें दिखाई देने वाले पूर्वाग्रह समाज में मौजूद धारणाओं को भी प्रतिबिंबित कर सकते हैं। इसलिए तकनीकी दक्षता के साथ सामाजिक समझ और आलोचनात्मक सोच भी जरूरी होगी।
मकसद तकनीक अपनाना नहीं, व्यवस्था बदलना
एआई मंथन-2.0 से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि एआई को केवल नई तकनीक के रूप में अपनाने के बजाय उसे वास्तविक समस्याओं का समाधान बनाने की दिशा में ले जाने की तैयारी है। शिक्षा में विद्यार्थी क्या और कैसे सीखेंगे, खेत में किसान को कौन-सी सलाह मिलेगी, अस्पताल में रोग की पहचान और निर्णय कैसे बेहतर होंगे और सरकारी सेवाएं कितनी स्थानीय व व्यक्तिगत बन सकेंगी—इन सभी क्षेत्रों में एआई की भूमिका बढ़ाने की दिशा दिखाई दे रही है।


