-आदित्य त्रिवेदी और नीतू सिंह को अहम जिम्मेदारी मिलने से पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी, 2027 के लिए ओबीसी को सबसे ज्यादा हिस्सेदारी देकर साधा जातीय समीकरण
भारत 19
कानपुर। भाजपा की कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्रीय कमेटी की घोषणा के साथ ही संगठन के भीतर चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। गुरुवार देर रात घोषित नई कमेटी में करीब पूरी टीम बदल दी गई है। लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच नए चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर नाराजगी है। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के निजी सचिव रहे आदित्य त्रिवेदी को सीधे क्षेत्रीय महामंत्री और नीतू सिंह को क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा है। दूसरी ओर, नई टीम में पिछड़ा वर्ग को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व देकर भाजपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपने सामाजिक समीकरण का भी संकेत दिया है। अभी 38 पदाधिकारियों की कमेटी है, जबकि अंतिम टीम 45 सदस्यीय होगी। कोषाध्यक्ष, मीडिया प्रभारी, सह प्रभारी, कार्यालय मंत्री, कार्यालय सह मंत्री, सोशल मीडिया संयोजक और आईटी संयोजक के पदों पर घोषणा बाकी है। नई कमेटी में केवल पवन प्रताप सिंह, आनंद सिंह और अशोक राजपूत को ही दोबारा जिम्मेदारी मिली है।
आदित्य त्रिवेदी की नियुक्ति पर खुलकर विरोध
पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के निजी सचिव रहे आदित्य त्रिवेदी को क्षेत्रीय महामंत्री बनाए जाने पर पार्टी के भीतर नाराजगी सामने आई है। दक्षिण के पूर्व जिलाध्यक्ष रामदेव शुक्ला ने सोशल मीडिया पर संगठन के फैसले की घोर निंदा की है। उन्होंने आदित्य त्रिवेदी पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं। ये आरोप रामदेव शुक्ला के हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि आदित्य त्रिवेदी इससे पहले मंडल या जिला कमेटी में किसी प्रमुख पद पर नहीं रहे। इसके बावजूद उन्हें सीधे क्षेत्रीय संगठन में महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि आदित्य त्रिवेदी को किदवई नगर या गोविंद नगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने का आश्वासन दिया गया है। इसी वजह से संगठन में उनकी नियुक्ति को भविष्य की चुनावी राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
नीतू सिंह को जिम्मेदारी मिलने पर भी सवाल
क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बनाई गईं नीतू सिंह को लेकर भी संगठन में सवाल उठ रहे हैं। पार्टी नेताओं के मुताबिक, वह इससे पहले मंडल या जिला संगठन में किसी प्रमुख पद पर नहीं रहीं। नेताओं का दावा है कि पार्टी के कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता भी सीमित रही और वह उस दौर में अधिक सक्रिय हुई थीं, जब वह महापौर या सांसद के टिकट की दावेदार थीं। नीतू सिंह को क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर खुशी जताई, जबकि पार्टी के कई नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि संगठन में उनका योगदान क्या रहा है। पार्टी नेताओं के बीच यह चर्चा भी है कि प्रांत प्रचारक श्रीराम ने उन्हें संगठन में जिम्मेदारी दिलाने में भूमिका निभाई है, ताकि भविष्य में आर्यनगर विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी के दौरान उनके पास क्षेत्रीय उपाध्यक्ष का संगठनात्मक आधार हो। यह पार्टी नेताओं के बीच चल रही चर्चा है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पचौरी परिवार में नीतू संगठनात्मक रूप से आगे
नीतू सिंह पूर्व सांसद और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सत्यदेव पचौरी की बेटी हैं। पचौरी परिवार के कई सदस्य भाजपा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उनके भाई अनूप पचौरी और बहनोई संजीव पाठक भी संगठन में अपनी राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश करते रहे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सत्यदेव पचौरी अपने बेटे अनूप को क्षेत्रीय कमेटी में जगह दिलाने के प्रयास में थे, जबकि संजीव पाठक ने प्रदेश के एक बड़े पदाधिकारी के साथ अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई थी। इसके बावजूद नई क्षेत्रीय कमेटी में नीतू सिंह को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल गई। नीतू सिंह इससे पहले महापौर और सांसद पद की दावेदारी को लेकर चर्चा में रही हैं। नई जिम्मेदारी के बाद वह संगठनात्मक पद के लिहाज से भाई और बहनोई से आगे निकलती दिखाई दे रही हैं।
सिर्फ तीन पुराने पदाधिकारियों को दोबारा जगह
नई कमेटी में झांसी के अशोक राजपूत पहले भी क्षेत्रीय उपाध्यक्ष थे और अब भी इसी पद पर हैं। कानपुर ग्रामीण के पवन प्रताप सिंह पहले क्षेत्रीय मंत्री थे, अब उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। कन्नौज के आनंद सिंह पहले क्षेत्रीय उपाध्यक्ष थे, जिन्हें इस बार महामंत्री की जिम्मेदारी मिली है। वहीं नई टीम में कई ऐसे चेहरे भी शामिल किए गए हैं, जिनकी पिछली संगठनात्मक भूमिका को लेकर पुराने क्षेत्रीय पदाधिकारियों के बीच परिचय का अभाव बताया जा रहा है। उपाध्यक्ष बनाई गईं अर्चना त्रिपाठी, मंत्री बनाए गए आनंद पटेल, विनोद कुशवाहा और धीरेन्द्र वर्मा को लेकर ऐसे सवाल पार्टी के भीतर चर्चा में हैं कि वे पहले संगठन में किस भूमिका में रहे हैं।
हालांकि नई टीम में कई अनुभवी नेताओं को भी जिम्मेदारी मिली है। उपाध्यक्ष पद पर कन्नौज के पूर्व जिलाध्यक्ष नरेंद्र राजपूत, औरैया के पूर्व जिलाध्यक्ष भुवन प्रकाश गुप्ता, बांदा के पूर्व जिला महामंत्री अखिलेश नाथ दीक्षित और चित्रकूट के आशीष कोल शामिल हैं। कन्नौज के अमित समाधिया युवा मोर्चा में रहे हैं, जबकि हमीरपुर के अरविंद मुखिया राठ के ब्लाक प्रमुख हैं। महामंत्री पद पर औरैया के पूर्व जिला महामंत्री शिव सिंह भारती और बांदा के राजेश पटेल को जगह मिली है। मंत्रियों में कानपुर के वीरेंद्र तिवारी, इटावा के पूर्व जिला महामंत्री प्रशांत राव चौबे, झांसी के मनीष तिवारी, युवा मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष सरदार मनजीत सिंह, शिवेन्दर सिंह शैली, रमेश कुशवाहा और औरैया की रीता कठेरिया समेत कई ऐसे चेहरे हैं, जिनका अलग-अलग स्तर पर संगठन में अनुभव रहा है।
ओबीसी सबसे आगे, ब्राह्मणों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व
नई क्षेत्रीय कमेटी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इसका सामाजिक और जातीय संतुलन है। 38 सदस्यीय कमेटी में 14 ओबीसी, 10 ब्राह्मण, चार क्षत्रिय, पांच अनुसूचित जाति, एक अनुसूचित जनजाति, दो अल्पसंख्यक और एक कायस्थ को जगह मिली है। पार्टी ने कमेटी में 22 जातियों को प्रतिनिधित्व देने का दावा किया है। क्षेत्रीय अध्यक्ष रामकिशोर साहू और क्षेत्रीय प्रभारी शंकर लाल लोधी दोनों पिछड़ा वर्ग से हैं। वहीं 10 ब्राह्मणों को जगह देकर भाजपा ने इस वर्ग को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। वैश्य समाज, जो लंबे समय से भाजपा के प्रमुख सामाजिक आधार में रहा है, को कमेटी में केवल एक स्थान मिला है।
सपा के गढ़ में भाजपा का ओबीसी दांव
कमेटी का जातीय संतुलन 2027 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में इटावा और कन्नौज जैसे जिले हैं, जहां समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार है। इटावा सपा मुखिया अखिलेश यादव का पैतृक जिला है, जबकि कन्नौज में भी सपा की मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है। लोकसभा चुनाव के आंकड़े भाजपा की चुनौती को और स्पष्ट करते हैं। 2019 में भाजपा ने इस क्षेत्र की सभी 10 लोकसभा सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में छह सीटें उसके हाथ से निकल गईं। ऐसे में नई क्षेत्रीय कमेटी में गैर-यादव पिछड़ा वर्ग को सबसे ज्यादा हिस्सेदारी देना भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। ब्राह्मणों को भी 10 स्थान देकर पार्टी ने इस वर्ग को साधने की कोशिश की है। यानी कमेटी के गठन में संगठनात्मक बदलाव के साथ-साथ 2027 के लिए वोटों के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई देती है।
नई टीम के सामने संगठन को साथ रखने की चुनौती
नई क्षेत्रीय कमेटी भाजपा के लिए दोहरी चुनौती लेकर आई है। एक ओर पार्टी ने 2027 के लिए जातीय और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर नई टीम तैयार की है, वहीं दूसरी ओर कुछ नियुक्तियों ने संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच सवाल और नाराजगी पैदा कर दी है। खासकर आदित्य त्रिवेदी और नीतू सिंह की नियुक्तियों को लेकर उठ रहे सवाल इस बात का संकेत हैं कि नई टीम को सिर्फ पदों का बंटवारा भर नहीं माना जा रहा। पार्टी नेतृत्व के सामने नई टीम को चुनावी लक्ष्य के अनुरूप सक्रिय करने के साथ पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी को भी संभालने की चुनौती है।


