- कारोबारियों और प्रोफेशनल्स के लिए अहम तारीख; समयसीमा चूकी तो बाद में आयकर रिटर्न में पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनना प्रभावित हो सकता है**
भारत 19
राजीव सक्सेना, नई दिल्ली। कारोबारियों और प्रोफेशनल्स के लिए 31 अगस्त 2026 आयकर रिटर्न दाखिल करने की महत्वपूर्ण समयसीमा है। लेकिन व्यवसाय या पेशे से आय वाले उन करदाताओं के लिए, जो पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनना चाहते हैं, Form 10-IEA भी बेहद अहम है। लागू होने के बावजूद अगर करदाता निर्धारित समय तक यह फॉर्म दाखिल नहीं करता और बाद में विलंबित रिटर्न भरता है तो पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने का विकल्प प्रभावित हो सकता है। यानी जिन कारोबारियों को पुरानी व्यवस्था में मिलने वाली विभिन्न कटौतियों और छूट का लाभ लेना है, उन्हें 31 अगस्त की समयसीमा से पहले Form 10-IEA से जुड़ी प्रक्रिया जरूर पूरी कर लेनी चाहिए।
Form 10-IEA किस करदाता के लिए जरूरी
Form 10-IEA मुख्य रूप से ऐसे व्यक्तिगत करदाताओं के लिए है जिनकी आय व्यवसाय या पेशे से होती है और जो नई टैक्स व्यवस्था से बाहर निकलकर पुरानी व्यवस्था अपनाना चाहते हैं। इस फॉर्म के जरिए करदाता पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने की सूचना देता है। इसलिए ऐसे करदाताओं के लिए ITR दाखिल करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उनके मामले में Form 10-IEA लागू है और इसे निर्धारित तरीके से दाखिल किया गया है या नहीं। हर आयकरदाता के लिए Form 10-IEA जरूरी नहीं है। इसलिए नौकरीपेशा और अन्य श्रेणी के करदाताओं पर यही नियम स्वतः लागू नहीं माना जाना चाहिए।
31 अगस्त की तारीख क्यों अहम
31 अगस्त 2026 तक जिन कारोबारियों और प्रोफेशनल्स को अपना ITR दाखिल करना है, उनके लिए समयसीमा को लेकर अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। यदि कोई पात्र करदाता समय पर ITR दाखिल नहीं कर पाता लेकिन उसने निर्धारित समय में Form 10-IEA दाखिल कर पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनने की सूचना दे दी है तो बाद में विलंबित रिटर्न दाखिल करते समय पुरानी व्यवस्था का विकल्प उपलब्ध रहने की स्थिति बन सकती है। इसके विपरीत, Form 10-IEA की निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए बिना बाद में रिटर्न दाखिल करने पर पुरानी व्यवस्था चुनने में बाधा आ सकती है और करदाता को नई व्यवस्था में रिटर्न दाखिल करना पड़ सकता है।
पुरानी टैक्स व्यवस्था में क्या फायदा
पुरानी टैक्स व्यवस्था में पात्र करदाताओं को विभिन्न कटौतियों और छूट का लाभ मिल सकता है। इनमें निर्धारित निवेश और भुगतान से जुड़ी कई मदें शामिल हैं। पात्र परिस्थितियों में जीवन बीमा, पीपीएफ, स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम और होम लोन के ब्याज जैसी मदों पर उपलब्ध कटौतियां कर योग्य आय को कम कर सकती हैं। इसके विपरीत नई टैक्स व्यवस्था में अधिकांश पारंपरिक कटौतियों और छूट का लाभ उपलब्ध नहीं है। इसलिए जिन कारोबारियों के लिए ये कटौतियां महत्वपूर्ण हैं, उनके लिए टैक्स रिजीम का चुनाव सीधे कर देनदारी पर असर डाल सकता है।
सिर्फ निवेश से पुरानी रिजीम तय नहीं होती
यह समझना भी जरूरी है कि जीवन बीमा, पीपीएफ या स्वास्थ्य बीमा में निवेश करने मात्र से पुरानी टैक्स व्यवस्था का विकल्प अपने आप नहीं मिल जाता। संबंधित निवेश या भुगतान पर कटौती आयकर कानून के तहत पात्र होने पर ही मिलती है। इसी तरह हर कारोबारी के लिए पुरानी व्यवस्था ही फायदेमंद हो, यह भी जरूरी नहीं है। करदाता को दोनों व्यवस्थाओं के तहत अपनी अनुमानित कर देनदारी की तुलना करने के बाद फैसला करना चाहिए।
देर से ITR भरने पर भी शुल्क
Form 10-IEA समय पर दाखिल करने का मतलब यह नहीं है कि ITR देर से भरने पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। यदि रिटर्न निर्धारित तारीख के बाद दाखिल किया जाता है तो विलंबित रिटर्न के नियम लागू होंगे। करदाता की आय और परिस्थितियों के आधार पर विलंब शुल्क और ब्याज की देनदारी बन सकती है। इसलिए Form 10-IEA और ITR की समयसीमा को अलग-अलग अनुपालन के रूप में समझना जरूरी है।
सीए ने नियम पर उठाए सवाल
चार्टर्ड अकाउंटेंट शिवम ओमर का कहना है कि यदि कोई कारोबारी किसी विशेष कारण से समय पर Form 10-IEA जमा नहीं कर पाया तो बाद में उसे यह फॉर्म दाखिल कर पुरानी टैक्स व्यवस्था में रिटर्न भरने का अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक रिटर्न में देरी के लिए आयकर विभाग पहले ही विलंब शुल्क लेता है। ऐसे में केवल तकनीकी समयसीमा के कारण पुरानी व्यवस्था में उपलब्ध कटौतियों और छूट का विकल्प प्रभावित होना करदाता पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। ओमर का कहना है कि ऐसे मामलों को केवल कंप्यूटर आधारित प्रक्रिया के आधार पर देखने के बजाय करदाता की वास्तविक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
किन कारोबारियों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए
खास तौर पर वे कारोबारी और प्रोफेशनल्स सावधान रहें जिनकी आय व्यवसाय या पेशे से है और जिन्होंने वित्तीय वर्ष के दौरान बीमा, पीपीएफ, स्वास्थ्य बीमा, होम लोन या अन्य पात्र मदों में निवेश अथवा भुगतान किया है। ऐसे करदाताओं को पहले यह देखना चाहिए कि पुरानी व्यवस्था में उपलब्ध कटौतियों से उन्हें कितना वास्तविक लाभ मिलेगा। इसके बाद तय करना चाहिए कि वे पुरानी या नई टैक्स व्यवस्था में से किसे चुनना चाहते हैं। अगर पुरानी व्यवस्था चुननी है तो Form 10-IEA की प्रक्रिया को अंतिम समय तक टालना जोखिम भरा हो सकता है।
समयसीमा चूकी तो बढ़ सकता है टैक्स बोझ
कारोबारियों और प्रोफेशनल्स के लिए इस समय सबसे जरूरी बात यही है कि ITR की तैयारी के साथ टैक्स रिजीम और Form 10-IEA की स्थिति भी समय रहते स्पष्ट कर लें। 31 अगस्त की समयसीमा के बाद ITR दाखिल किया जा सकता है, लेकिन लागू मामलों में Form 10-IEA की निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होने से पुरानी टैक्स व्यवस्था का विकल्प प्रभावित हो सकता है। इसलिए जिन करदाताओं के लिए पुरानी व्यवस्था में उपलब्ध कटौतियां महत्वपूर्ण हैं, उन्हें 31 अगस्त से पहले अपने Form 10-IEA की स्थिति जांच लेनी चाहिए और जरूरत होने पर अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट या टैक्स सलाहकार से प्रक्रिया की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

