- सपा के 75 सीटों के संभावित फॉर्मूले की चर्चा, कांग्रेस 200 सीटों पर दावेदारी कर रही; 2027 चुनाव से पहले गठबंधन की पहली बड़ी परीक्षा**
भारत 19
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक समाजवादी पार्टी कांग्रेस को करीब 75 विधानसभा सीटें देने के फॉर्मूले पर विचार कर रही है, जबकि कांग्रेस की प्रदेश इकाई करीब 200 सीटों पर दावेदारी करती रही है। दोनों संभावित आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर अब गठबंधन की राह में सबसे अहम चुनौती बनता दिख रहा है। हालांकि, दोनों दलों की ओर से अभी किसी अंतिम सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
सपा का फोकस संख्या नहीं, जिताऊ सीटों पर
सपा की रणनीति में सीटों की संख्या के बजाय चुनावी जीत की संभावना को प्राथमिकता दिए जाने की चर्चा है। पार्टी उन विधानसभा सीटों पर अपना दावा बनाए रखना चाहती है जहां उसका संगठन मजबूत है और स्थानीय सामाजिक समीकरण भाजपा के खिलाफ उसके पक्ष में जाता है। सपा के भीतर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि गठबंधन में ज्यादा सीटें देना अपने आप में बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं है। इसलिए कांग्रेस को ऐसी सीटें देने पर जोर हो सकता है जहां उसका संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय वोट आधार गठबंधन को वास्तविक चुनावी लाभ पहुंचा सके। हालांकि 75 सीटों का आंकड़ा अभी संभावित फॉर्मूला है, अंतिम फैसला नहीं।
कांग्रेस की 200 सीटों पर दावेदारी
कांग्रेस की प्रदेश इकाई उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। पार्टी की संभावित दावेदारी का आधार उसका संगठन, स्थानीय प्रभाव और 2024 लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन का प्रदर्शन हो सकता है। कांग्रेस ने 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटें जीतीं। पार्टी इस प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने के तर्क के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव का गणित अलग होता है। इसलिए 2024 का सीट फॉर्मूला 2027 में उसी रूप में लागू होगा, यह अभी तय नहीं है।
पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक कांग्रेस की नजर
कांग्रेस की संभावित दावेदारी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ पूर्वांचल की सीटें भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। नोएडा, गाजियाबाद, हापुड़, बुलंदशहर, मथुरा और आगरा जैसे क्षेत्रों में पार्टी अपनी राजनीतिक मौजूदगी के आधार पर सीटों पर दावा कर सकती है। पूर्वांचल में वाराणसी और आसपास की विधानसभा सीटों को लेकर भी कांग्रेस की रुचि की चर्चा है। रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी कैंट और सेवापुरी जैसी सीटों के नाम संभावित दावेदारी में बताए जा रहे हैं। हालांकि इन सीटों पर कांग्रेस का दावा अंतिम है, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता। वास्तविक तस्वीर सीट बंटवारे की औपचारिक बातचीत के बाद ही साफ होगी।
2017 का अनुभव सपा के लिए बड़ा सबक
सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे के मौजूदा गणित में 2017 का विधानसभा चुनाव भी महत्वपूर्ण संदर्भ है। उस चुनाव में दोनों दलों ने गठबंधन किया था। कांग्रेस ने 100 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे सिर्फ सात सीटों पर जीत मिली। सपा इस बार ऐसे फॉर्मूले से बचना चाहती है जिसमें अधिक सीटें देने के बावजूद गठबंधन को अपेक्षित चुनावी फायदा न मिले। इसलिए सीटों की संख्या के बजाय प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की जमीनी ताकत और जीत की संभावना को महत्व दिए जाने की संभावना है।
PDA रणनीति भी बदल सकती है सीटों का गणित
सपा की PDA रणनीति (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) भी 2027 के सीट बंटवारे को प्रभावित कर सकती है। पार्टी इस सामाजिक समीकरण को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चयन और क्षेत्रीय रणनीति के साथ जोड़ने की तैयारी कर सकती है। ऐसे में सपा ज्यादा सीटें अपने पास रखना चाहेगी, ताकि सामाजिक समीकरण के अनुरूप उम्मीदवार उतारने की उसकी रणनीति प्रभावित न हो। यही वजह है कि कांग्रेस की बड़ी सीट दावेदारी और सपा की सीमित सीटों वाले संभावित फॉर्मूले के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है।
2024 का साथ, 2027 में सीटों की परीक्षा
2024 लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन भाजपा के खिलाफ प्रभावी साबित हुआ था। दोनों दलों ने मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया और विपक्षी गठबंधन को मजबूत स्थिति मिली। हालांकि विधानसभा चुनाव का मुकाबला अलग होगा। 403 सीटों पर उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन और जातीय-सामाजिक समीकरण कहीं ज्यादा निर्णायक होंगे। इसलिए 2024 की सफलता को 2027 के लिए दोहराने के लिए दोनों दलों को सीटों का ऐसा बंटवारा करना होगा जिसमें दोनों की संगठनात्मक ताकत का अधिकतम इस्तेमाल हो सके।
अखिलेश-राहुल की बातचीत से निकलेगा रास्ता
फिलहाल 75 बनाम 200 का आंकड़ा अंतिम सीट बंटवारा नहीं, बल्कि दोनों दलों की संभावित स्थिति और दावेदारी के बीच अंतर को दिखाता है। वास्तविक समझौता सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत के बाद ही सामने आएगा। इस बातचीत में सिर्फ सीटों की संख्या नहीं, बल्कि क्षेत्रवार हिस्सेदारी, उम्मीदवार की जीतने की क्षमता, 2024 का प्रदर्शन और स्थानीय संगठन की ताकत** जैसे मुद्दे भी अहम रहेंगे।


